आमने सामने हुए भाजपा शिवसेना

uddhavशिवसेना के लिए निश्चित रूप से यह बहुत कटु अनुभव रहा होगा। इसलिए नहीं कि भाजपा के साथ उनका 25 सालों का गठबंधन टूट गया बल्कि इसलिए पहली बार शिवसेना ने अपने राजनीतिक स्वभाव के विपरीत जाकर अड़ने की बजाय झुकने की नीति अपनाई थी। महाराष्ट्र के मिशन 150 की तैयारियों के साथ ही शिवसेना ने बहुत पहले संकेत दे दिया था कि वह पिछली बार के मुकाबले इस बार बीजेपी के सामने अपना कद और छोटा करेगी और उसकी तरफ से आखिरी दावा 150 सीट का ही रहेगा। उसके हिस्से की बाकी 19 सीटें चाहें तो बाकी सहयोगी दलों में बंट जाएं या फिर चाहे बीजेपी खुद रख ले। करीब करीब हफ्ते भर की मशक्कत के बाद भी बीजेपी खुश नहीं हुई। न सीट पर, न सीएम पर। उल्टे झुकती शिवसेना को बीजेपी ने चक्रव्यूह में फंसाकर गिराने का काम किया। आखिरी मसौदा जिस पर सहमति बनी थी उसमें यह संदेश दिया गया कि शिवसेना के अड़ियल रुख के कारण छोटे सहयोगी दलों को पर्याप्त सीटें नहीं मिल पा रही हैं। आखिरकार अपनी ही मांगी गयी 130 सीट पा लेने के बाद भी बीजेपी ने महायुति से मुक्ति पाने का ऐलान कर दिया। उसे अलग होना था। वह अलग हो गई।

यही शिवसेना के लिए सबसे तगड़ा झटका है। अगर यह महायुति इस जोड़ तोड़ के बिना हफ्ते भर पहले खत्म हो गयी होती तो शायद शिवसेना को न तो यह झटका लगता और न ही इतना कड़वा अनुभव मिलता लेकिन सारी बातचीत और जोड़तोड़ की प्रक्रिया में शिवसेना की तरफ से नरमी के ही संकेत दिये गये। सीटों के बंटवारे के फार्मूले तैयार करने से लेकर बातचीत के दरवाजे खोलने तक। आखिरी सफल बातचीत के बाद शायद शिवसेना के रणनीतिकार इतने आश्वस्त हो गये थे कि गुरूवार की सुबह सामना के संपादकीय में पत्रकारों को सारा दोष देते हुए हालात को बेहतर भी बता दिया गया था। लेकिन सुबह की संपादकीय शाम तक भी कायम न रह पायी। बीजेपी के राज्य नेताओं ने एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेस करके मुंबई में गठबंधन टूटने का ऐलान भी कर दिया और सारा दोष शिवसेना के माथे भी मढ़ दिया। निश्चित रूप से यह शिवसेना के लिए दूसरा बड़ा झटका रहा होगा कि जिस गठबंधन को बचाने के झुकते जा रहे थे आखिरकार उस गठबंधन के टूटने का आरोप भी उन्हीं पर लग गया।

शिवसेना की राजनीति में पहली बार झुकने का प्रयोग हुआ और उसका उन्हें बहुत गलत परिणाम मिला। आमतौर पर बाल ठाकरे की राजनीति में झुकने या फिर समझौता कर लेने जैसे संस्कार नहीं रहे हैं। महाराष्ट्र में बाल ठाकरे ने जिस शिवसेना की नींव डाली थी उसमें ‘झुकने’ की बजाय ‘झुकाने’ की परंपरा का पालन किया जाता था। फिर इसके लिए चाहे तो धमकी चमकी का इस्तेमाल करना पड़े या फिर कूटनीति का। लेकिन इस बार ऐसा नहीं किया गया। शिवसेना में यह बाल ठाकरे का अभाव ही है कि उनकी राजनीति में पहली बार सत्ता केन्द्रित चिंतन हुआ। और इस सत्ता केन्द्रित चिंतन के मूल में उद्धव ठाकरे को बतौर मुख्यमंत्री रखा गया। पूरे महाराष्ट्र में ‘उठा महाराष्ट्र’ का नारा दिया गया जिसमें उठा का मतलब उद्धव ठाकरे है। बीजेपी को यही बात नागवार गुजरी। लोकसभा चुनाव में मिली भारी सफलता के बाद बीजेपी महाराष्ट्र में शिवसेना की सहयोगी होने के बजाय शिवसेना को सहयोगी बनाना चाहती थी। सीटों के साथ साथ शिवसेना और बीजेपी के बीच हुई सारी बातचीत का निचोड़ सिर्फ दो है। बीजेपी लगातार यही जोर देती रही कि जो दल सबसे ज्यादा सीटें लेकर आयेगा मुख्यमंत्री उसी दल का होगा। जबकि शिवसेना की तरफ से तर्क दिया जाता रहा कि जैसे हमने केन्द्र में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में मदद की वैसे ही बीजेपी को महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे को बतौर मुख्यमंत्री स्वीकार कर लेना चाहिए।

बीजेपी को यह स्वीकार न था। बीजेपी के भीतर पहले से ही केन्द्र में नरेन्द्र और राज्य में देवेन्द्र का नारा चल चुका था। 43 साल की उम्र में महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष बने देवेन्द्र फड़नवीस नागपुर की पृष्ठभूमि से आते हैं। 23 साल की उम्र में वे नागपुर के मेयर रह चुके हैं और 1999 से नागपुर से ही विधायक हैं। राजनीति में प्रमोद महाजन की देन कहे जानेवाले देवेन्द्र फड़नवीस बीजेपी के भीतर जोखिम उठानेवाले नेता के बतौर जाने जाते हैं। यहां विरोधाभाष है कि देवेन्द्र फणनवीस शिवसेना से अलगाव चाहते थे या नहीं। लेकिन बतौर प्रदेश अध्यक्ष और अब संभावित मुख्यमंत्री के दावेदार देवेन्द्र फणनवीस ही सबसे अधिक फायदे में रहेंगे अगर बीजेपी शिवसेना के बिना प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन कर लेती है तो। लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में फणनवीस के विरोधी नितिन गड़करी तो कभी शिवसेना के साथ गठबंधन नहीं चाहते थे। वे मुख्यमंत्री होने के लिए ऐसा कर रहे थे या फिर निजी कारणों की वजह से लेकिन वे युति विरोधी ही रहे। जहां तक प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का सवाल है तो दोनों इस राय से इत्तेफाक रखते हैं कि पूरे देश में बीजेपी का अपना अलग और स्वतंत्र अस्तित्व होना चाहिए। यही कारण है कि संघ की अनिच्छा के बावजूद ‘स्वाभिमान’ से समझौता नहीं किया गया और पच्चीस साल के गठबंधन से खुद को मुक्त कर लिया गया।

अब भले ही बीजेपी के नेता एकनाथ खड़से यह कह रहे हों कि चुनाव के बाद शिवसेना से दोबारा रिश्ता कायम हो सकता है लेकिन कम से कम चुनाव के दौरान दोनों दल आमने सामने रहेंगे। एकनाथ खड़से भले ही खिलाफ होकर चुनाव न लड़ने की बात कह रहे हों लेकिन खिलाफत को रोक पाना मुश्किल होगा। संभावना तो यह है कि इस अलगाव के बाद जमीनी तौर पर शिवसेना और बीजेपी एक दूसरे के खिलाफ ही चुनाव लड़ेंगे। कौन कितनी सीट जीतेगा उसके बाद क्या फार्मूला निकलेगा यह तो चुनाव नतीजे आने के बाद की बात होगी लेकिन अब शिवसेना और भाजपा का सारा जोर एक दूसरे के खिलाफ ही लगेगा। भले ही सार्वजनिक बयानबाजी से नेता लोग अपने आपको बचाकर रखें लेकिन जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता एक दूसरे से अपने आपको भिड़ने से बचा पायेंगे यह कह पाना मुश्किल है। हिन्दुत्व की राजनीति, छत्रपति शिवाजी का राज, हिन्दू हृदय सम्राट, दोनों के बीच बहुत कुछ साझा है और जब इस ‘साझी विरासत’ पर दोनों तरफ से दावा किया जाएगा तब दोनों की संभावित भिड़ंत से भला कौन रोक पायेगा? बहुत दिनों तक अगल बगल रहनेवाले जब आमने सामने खड़े होते हैं तो प्यार भरी बातें नहीं कर पाते हैं। बीजेपी और शिवसेना जरूर नियति के इस सत्य को जानते समझते होंगे।
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