मोदी ने हिन्दू राष्ट्र और धर्मांतरण पर क्यों साधी चुप्पी ?

modi 15 aug-आमिर अंसारी- जिस दिन से मोदी सरकार हुकूमत में आयी है उसी दिन से मुल्क में नफरत अंगेज़ नारों ने सेक्यूलर सोच पर प्रहार करना शुरू कर दिए हैं हुकूमत में आते ही मंत्रीमंडल की शपथ लेने के घंटे भर के अंदर ही अंदर दो केंद्रीय मंत्रियों ने ऐसे दो अलग-अलग जुमले बोले जिससे मुल्क के पढ़े लिखे तबके ने अंदाजा लगा लिया था कि जब आगाज़ ही इतना नफरत अंगेज़ है तो फिर इसका अंजाम भी क्या होगा ? चूंकि इस सरकार के गठन के पहले ही दिन नफरत परस्त ज़हनियत का आगाज़ ग्रह राज्य मंत्री ने कश्मीर में नाफ़िज़ धारा ३७० के मुताल्लिक़ अपने मुँह को खोलकर कर दिया था ! और इसी दिन केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ने यह कहते हुए अपनी ज़बान को जुंबिश दी कि मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं हैं !

बस इसी दिन से जो साम्प्रदायिकता की हवाएं मुल्क में चली हैं तो आज तक थमने का नाम ही नहीं ले रही हैं ! यह अलग बात है कि चुनाव प्रचार के समय भला नरेंद्र मोदी यह नारा दे रहे हों कि सबका साथ सबका विकास लेकिन साथ में यह भी चल रहा था कि आगरा में आयोजित सभा में मुज़फ्फर नगर दंगों के आरोपी को सम्मानित किया जा रहा था ! अगर मोदी एक तरफ यह नारा देकर खुद को धार्मिक दीवारों को तोड़ते हुए प्रदर्शित कर रहे थे कि शिवालयों से पहले शौचालयों का निर्माण होना चाहिए तो वही वह गुजरात दंगों में मारे गए मज़लूमों को कुत्ते के पिल्लै की संज्ञा देने से भी नहीं चूक रहे थे !

तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय ग्रह मंत्री राजनाथ सिंह जिन्हें चुनाव प्रचार के समय भाजपा अध्यक्ष के रूप में कम बल्कि नरेंद्र मोदी के प्रवक्ता के रूप में राजनैतिक समीक्षक ज़्यादा देख रहे थे ! वह तो चुनाव से पहले गुजरात दंगों पर शीश  झुका कर माफी मांगने तक को तैयार दिखाई देते थे ! लेकिन सत्ता में आते ही उन्होंने भी मुज़फ्फरनगर दंगे के एक आरोपी को केंद्र की सबसे महत्त्वपूर्ण जेड श्रेणी सुरक्षा प्रदान करके इस आरोपी के सीने पर तमगा लगाने का काम किया है !

यह तमाम घटनाएं इतनी तेज़ी से घटित हो रही थी कि मुल्क के एक बड़े दूरअंदेश तबके को यह चिंता सताने लगी थी कि मुल्क को यह लोग किस दिशा में लेकर जा रहे हैं ! अभी मुल्क का सेक्यूलर तथा धर्मनिरपेक्ष समाज कुछ समझ पाता उससे पहले ही ऐसी नफरत अंगेज़ सदायें पूरे मुल्क में गूंजने लगीं जिसने समाज  के हर तबके को प्रभावित करना शुरू कर दिया कभी लव जिहाद के नाम पर योगी आदित्य नाथ ने अपने ज़हर आलूदा जुमलों से पूरे मुल्क का माहौल ज़हरीला करना शुरू किया तो जैसे इस बात की होड़ भाजपा नेताओं में चल पडी कि जो सबसे ज़्यादा ज़हरीली भाषा बोलेगा वही मीडिया और पार्टी का नायक कह लाएगा ! तो फिर भाजपा के दुसरे नेता साक्षी महराज ने मदरसों को अपनी नफरत का निशाना बनाना शुरू कर दिया और यहाँ तक कह डाला कि मदरसे आतंकवाद का अड्डा होते हैं यह अलग बात है कि सपा सांसद चौधरी मुनव्वर सलीम के एक सवाल के जवाब में स्वयं मोदी सरकार यह क़ुबूलती है कि तमाम तरह की खुफिया जांचों के उपरांत मुल्क के किसी भी मदरसे को आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त नहीं पाया गया !

जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है कि नफरत अंगेज़ जुमलों को बोलने की जो होड़ भाजपा नेताओं में लगी उसमे केंद्र में बैठी  भाजपा सरकार की एक मंत्री यानी साध्वी निरंजना ज्योति इतनी आगे बड़ जाती हैं कि वह दिल्ली की सड़कों पर आकर रामज़ादे और हरामज़ादे जैसे आपत्तिजनक जुमलों का इस्तेमाल करना शुरू कर देती हैं !

आमिर अंसारी
आमिर अंसारी

इस पूरे घटनाक्रम की सबसे अहम बात तो यह है कि इसे मात्र संयोग समझा जाये या फिर भाजपा की एक सोची समझी रणनीत का हिस्सा ,चूंकि उपरोक्त तीनो लोग इस समय सदन में उप्र से चुन कर आये हैं इन तीनों का राजनैतिक मर्कज़ भी उप्र है और इन तीनो के द्वरा बोले गए जुमलों के पश्चात मुल्क में जो बहस हिन्दू राष्ट्र या धर्मांतरण की चल रही है उसका केंद्र बिन्दु भी उप्र ही बना हुआ है इसका साफ़ मतलब निकलता है  कि उप्र के भाजपा नेताओं के बेलगाम जुमले  यह साबित कर रहे हैं कि उप्र विधानसभा के चुनाव भला दूर हों लेकिन भाजपा ने अपनी सियासी बिसात बिछाना शुरू कर दी है ! जिसके चलते इनके बचाओ में प्रधानमंत्री स्वयं आगे आकर उच्चसदन यानी राज्यसभा को सम्बोधित करते हुए आश्वासन देते हैं कि  भविष्य अब ऐसा नहीं होगा !

लेकिन प्रधानमंत्री के आश्वासन के पश्चात फिर उप्र के आगरा में धर्मांतरण की एक नौटंकी आयोजित की जाती है जिसकी हक़ीक़त बैचैन हो कर २४ घंटों का भी इंतज़ार न करते हुए सबके सामने खुलकर आ जाती है !इसीलिए मैंने अपनी बात की शुरुवात में कहा है कि जिस प्रकार मुज़फ्फर नगर दंगों की साम्प्रदायिक लपटों ने पूरे उप्र को अपने आगोश में ले लिया था और उप्र की इस साम्प्रदायिक आग में दहकती धरती से मोदी ने सत्ता की खिचड़ी बनाई थी अब उसी तरह का माहौल देश में बनाया जा रहा है ताकि अबकी बार इन साम्प्रदायिकता के शोलों की तपिश में उप्र विधान सभा पर कब्ज़ा कर उस राजयसभा रूपी लगाम को खत्म किया जा सके जो बार-बार भाजपा सरकार के बहकते हुए कदमों को रोकने की जुर्रत कर रही है !

संभवतः इन नफरत अंगेज़ शोलों को बिलकुल नए अंदाज़ में उछालते हुए संसद परिसर में खड़ा होकर उप्र से भाजपा का एक सांसद देश के प्रथम आतंकी यानी नाथूराम गोडसे का महिमा मंडन करता है जिससे गांधी के देश का गांधीवादी बैचैन हो उठता है जिसके चलते लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानी संसद में जब धर्मांतरण के मुद्दे पर और बापू के अपमान पर वक्तव्य देने के लिए विपक्ष एक सुर हो कर प्रधानमंत्री की मांग करता है तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का गौरव कहे जाने वाले भारत देश का प्रधानमंत्री उच्चसदन में नहीं आते और जब आते हैं तो अपनी उस ज़ुबान को नहीं खोलते जिस ज़बान से निकले हुए जुमलों ने भारतीय राजनीत के उस तिलस्म को तोड़ा था जिसके चलते हिन्दुस्तान में ३० बरस बाद एक दल की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी !

प्रधानमंत्री की इस चुप्पी ने और सत्ताधारी दल के नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री की मौजूदगी में सदन के भीतर अपनाये गए आक्रामक रुख ने मुल्क के सामने कई अनसुलझे सवाल खड़े कर दिए ! और साथ ही इस घटना को देख कर मुझ जैसे कम अक़्ल के ज़हन में अचानक डॉ लोहिया का वह जुमला कौंधने लगा जो उन्होंने १७ अगस्त १९६३ को प्रधानमंत्री नेहरू के संदर्भ में बोला था लोहिया ने संसद में खड़े होकर कहा था कि “प्रधानमंत्री नौकर है सदन मालिक है ,मालिक के साथ नौकर को ज़रा अच्छी तरह बात करना चाहिए ” लेकिन लोहिया के इन बोलों की कीमत वो लोग क्या समझेंगे जो संसद में खड़े होकर बापू के हत्यारे का महिमा मंडन कर रहे हो !

लेकिन सवाल फिर वही है कि क्यों प्रधानमंत्री जी खामोश हैं ? क्या प्रधानमंत्री की बात स्वयं उनके मंत्री,सांसद और सहयोगी संगठनों के लोग नहीं सुन रहे हैं ? या फिर यह लोग अपनी राजनैतिक महत्त्वआकांक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लगाये गए विकास के नारे को साम्प्रदायिकता की आग में जला कर नरेंद्र मोदी की उस लोकप्रियता को भस्म करना चाहते हैं जो देश के नए मतदाताओं यानी उन लगभग १५ करोड़ नौजवानों के दिलों में मौजूद थी जिन्होंने मोदी के विकास के नारे पर लब्बेक कह दिया था !

क्या वजह है कि मोदी अपने ड्रीम प्रोजेक्ट यानी स्वच्छ भारत की शुरूवात गांधी जयंती के दिन गांधी जी को खिराज-ए-अक़ीदत के रूप में पेश करते हैं तथा आस्ट्रेलिया दौरे के समय वहां गांधी जी कि प्रतिमा के अनावरण समरोह में कहते हैं कि २ अक्टूबर को महात्मा गांधी के रूप में एक व्यक्ति ने नहीं बल्कि एक सिद्धांत ने जन्म लिया था !लेकिन इसी सिद्धांत यानी बापू के क़ातिल का संसद परिसर में मोदी जी के सांसद महिमा मंडन करते है और मोदी जी खामोश रहते हैं ! वह हिन्दू महासभा जिस पर मोदी जी के अड़ियल लीडर सरदार वल्ल्भ भाई पटेल ने भारत के प्रथम गृहमंत्री के रूप में प्रतिबंध लगाया था और आज मोदी जी इनकी ज़बान पर रोक तक नहीं लगा पा रहे हैं ! हिन्दू महासभा का राष्ट्रिय अध्यक्ष कौशिक पूरे देश के सामने टीवी चैनल पर बोलता है कि नाथूराम गोडसे राष्ट्र भक्त था और हर हत्या के पीछे एक कारण होता है गोडसे ने जो हत्या की है उसके कारणों पर भी चर्चा होनी चाहिए हिन्दू महासभा का राष्ट्रिय अध्यक्ष यहीं नहीं रुके उन्होंने संविधान को ही पुरखों की एक गलती क़रार दे डाला इतना ही नहीं इन महाशय ने तो बापू के लिए इतने आपत्तिजनक जुमले बोले हैं कि मेरे जैसे कमज़ोर व्यक्ति के हाथ उन जुमलों को लिखने तक में काँप रहे हैं ! मेरी नम आँखें,गम और गुस्से से लबरेज़ ज़हन-ओ-दिल और मेरा ज़मीर मुझे उन निहायत घटिया जुमलों को लिखने की इजाज़त नहीं देता !

लेकिन मोदी जी आपकी खामोशी मुल्क के ही १२० करोड़ नहीं बल्कि दुनिया भर के करोड़ों बापू के भक्तों के सामने एक सवाल बन कर खड़ी हो गयी है ! ५६ इंच के सीने की बात करने वाले प्रधानमंत्री की खामोशी किसके दबाव में हैं ? मुल्क जाने को बेताब है क्यूंकी अगर प्रधानमंत्री की खामोशी बहुत देर तक नहीं टूटी तो इन तमाम घटनाओं के संदर्भ में यह खामोशी प्रधानमंत्री की मौन सहमती के रूप में इतिहास के काले अध्याय के शक्ल में दर्ज कर ली जाएगी ! और आने वाली नस्लें इससे क्या सबक लेंगी यह चिंता का विषय है !

मैं गम,गुस्से और बापू के प्रेम में डूबी हुई इस क़लम को इस सवाल के साथ विराम देना चाहता हूँ कि लालकिले की प्राचीर से देश को सम्बोधित करते वक़्त मोदी जी आपने कहा था कि अगले १० बरस तक जात-पात और धर्म-नस्ल को एक तरफ रख कर राष्ट्र निर्माण के लिए सब एक हो जाओ ! तब सवाल यह उठता है कि बापू के हत्यारे गोडसे की संसद परिसर में मूर्ती लगाने की मांग करने वाले और हिन्दू राष्ट्र तथा धर्मांतरण की बहस से मुल्क की आब-ओ-हवा को गर्माने की कोशिश करने वाले राष्ट्र निर्माण का कार्य कर रहे हैं या मुल्क को कमज़ोर करने का …?

स्टेचू ऑफ़ यूनिटी यानी एकता की प्रतिमा के रूप में विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा लगाने का सपना देखने वाले मोदी जी क्या नफरत के अलमबरदार गोडसे की मूर्ती को लगाने की बात करने वालों पर लगाम कस  पाएंगे ? या फिर देश भर में रन फॉर यूनिटी यानी एकता के लिए देश को दौड़ लगवाने वाले मोदी जी हिन्दू राष्ट्र का नारा लगाने वालों पर अपने अड़ियल नेता सरदार पटेल की तरह प्रतिबंध लगाने की हिम्मत कर पाएंगे ऐसा प्रतीत तो नहीं होता लेकिन नामुमकिन जैसा कोई शब्द भारतीय शब्दकोष में है भी नहीं , मेरे बापू ने अपने संघर्ष से इस नामुमकिन शब्द को भारतीय शब्द कोष से मिटाते हुए अपने अहिंसक आंदोलन से उस अंग्रेज़ को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था जिसकी हुकूमत में सूरज अस्त नहीं होता था !

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