राजनैतिक रियासतों के कब्जे में यूपी की सियासत

उत्तर प्रदेश की रियासत और सियासत राम से ही शुरू होती है और इसका अंत भी राम पर ही होता है. फ़र्क अगर आया है तो बस इतना ही कि तब पिता के कहने पर एक बेटे ने चौदह बरस का वनवास काटा था. अब एक पुत्र अपने पिता का राजनीतिक वनवास चाह रहा है. बात रियासत और सियासत की करें तो दोनों में जो समानता नज़र आती है वह है राजतंत्र. इस सब के बीच से लोकतंत्र कहीं गायब ही हो चला है. प्रजा है जिसे तब भी दो जून की रोटी सुकून से चाहिए थी अब भी वह सत्ता से यही उम्मीद करती है. देश में राजनैतिक रियासतें सियासत पर कैसे कब्ज़ा जमा रही है. इसकी ताज़ा तासीर हाल ही में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण में देखने को मिली है. देश में लोकतंत्र की शुरुआत से ही परिवारवाद के आरोपों से घिरने वाली कांग्रेस ही नहीं बल्कि यहाँ चुनावी रण में उतरे तमाम दलों ने इसे अपना पैरामीटर मान लिया है.

kamlesh Keshoteकमलेश केशोट
नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश की राजनीति को जानने के लिए रामायण से बेहतर कोई विकल्प हो ही नहीं सकता. इसमें वे तमाम पात्र हैं वहां की मौजूदा राजनीति से तल्ल्लुक रखते हैं. दशरथ से लेकर केवट तक तमाम भूमिकाएं वर्तमान राजनीतिक परिपेक्ष्य में मौजूद हैं. सबसे अहम बात यहाँ यह जुड़ जाती है कि रामायण में पुत्र मोह और सत्ता पाने के लिए संग्राम हुआ था. उत्तर प्रदेश के राजनैतिक दायरे में संतान का मोह अभी भी देखा जा रहा है. इस मोह के मायाजाल में अब यूपी की सियासत में परिवारवाद हावी होता नज़र आ रहा है. मसलन कोई भी दल हो. हर कोई नेता अपने बेटे बहू और रिश्तेदारों की राजनीति चमकाने में लगा है. यह आलम उत्तर प्रदेश भर का नहीं है. देश के मौजूदा राजनैतिक हालात में परिवारवाद ने एक सिस्टम का रूप ले लिया है. जिसके जरिए नेता अपने परिजनों को सियासत में बतौर उत्तराधिकारी राजनीतिक विरासत सौंपना चाह रहे हैं. राजनैतिक दलों में इस सिस्टम की जड़ें इस कदर मजबूत हो गई हैं कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके आगे बेबस नज़र आ रहे हैं. चाहे कॉर्पोरेट जगत हो या फ़िल्मी दुनियां की चमक धमक. अपने बच्चों को बागडोर सौपनें की परंपरा सब जगह रही है. सेना में इस परंपरा को गौरव माना जाता है. लेकिन राजनीतिक पटल तक आते आते यही परंपरा विकृत रूप ले लेती है. दरअसल भारतीय राजनीति में परिवारवाद की परंपरा आज़ादी के बाद से शुरू हुई थी. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से शुरू हुआ परिवारवाद पीढ़ी दर पीढ़ी होता हुआ राहुल गाँधी तक आ टिका है. इसी परिवार की मेनका गाँधी और वरुण गाँधी भी राजनीति में सक्रीय हैं. वहीँ अपने भाई का राजनीतिक कैरियर सँवारने के लिए खुद प्रियंका गाँधी भी बेताब हैं. कयास हैं कि वे अपने भाई के लिए स्टार प्रचारक के तौर पर चुनाव मैदान में उतर सकती हैं. भले ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का बहुत वर्चस्व नहीं रहा हो. लेकिन इस प्रदेश की जनता ने इस परिवार की नैया पार लगाने में हमेशा केवट की भूमिका अदा की है. बीजेपी में संघ परिवार का कोई सानी नहीं रहा है. परिवारवाद की इस परंपरा ने दिल्ली से बाहर निकलकर देश के कई प्रमुख राज्यों में अपनी जड़ें जमा ली है. कई राजनेताओं के परिवारों ने घरानों का रूप ले लिया है. उम्र के पिछड़ते दौर में अपनों का सियासी राजतिलक कर राजनैतिक वंश बढ़ाने में जुटे हैं. उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी में भीतर चल रहे सियासी संग्राम को पूरा देश देख रहा है. पार्टी के जनक मुलायम सिंह यादव ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उन्हें अपने राजनैतिक कैरियर में यह दिन भी देखना पड़ेगा. मुलायम ने अपने बेटे अखिलेश को सूबे का मुखिया क्या बना दिया. परिवार के अन्य लोगों को यह बात खटक गई, लिहाज़ा सपा में घमासान मच गया. अखिलेश को तो राजनीति विरासत में मिली. लेकिन उनकी असल सियासी पारी पत्नी डिम्पल यादव के साथ ही शुरू हुई. टीपू कहकर बुलाए जाने वाले अखिलेश पेशे से इंजिनियर बनना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने इन्वायरमेंटल इंजीनियरिंग में दक्षता ली. पच्चीस की उम्र में उनकी मुलाकात डिम्पल रावत से हुई. दोनों में प्यार पनपा और पिता की नाराज़गी के बावजूद 1999 में अखिलेश ने डिम्पल से शादी कर ली. मुलायम के अखिलेश को लेकर अपने सपने थे. लेकिन जल्द ही बहू डिम्पल ने परिवार में अपनी गहरी जगह बना ली और वे सियासत में अखिलेश का हाथ बटानें लगीं. यहीं से अखिलेश के सियासी कैरियर ने उड़ान भरी. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 2000 में पहली बार वे कन्नौज से एमपी बनें. इसके बाद अखिलेश ने 2009 के लोकसभा चुनाव में डिम्पल के सहयोग से कन्नौज और फिरोजाबाद से चुनाव लड़ा. वे दोनों सीटों से चुनाव जीते. बाद में उन्होंने फिरोजाबाद सीट छोड़कर वहां से पत्नी डिम्पल को चुनाव लड़ाया. उपचुनाव में डिम्पल कांग्रेस के राज बब्बर से चुनाव हार गई. इसके बाद 2012 में अखिलेश जब मुख्यमंत्री बने तो कन्नौज सीट से डिम्पल को उम्मीदवार बनाया गया और वे निर्विरोध जीत गई. इसके साथ ही डिम्पल अखिलेश के साथ सियासी कदम मिलाकर चलने लगी. उनकी लोकप्रियता प्रदेश में इस कदर है कि अखिलेश समर्थक तमाम युवा डिम्पल को भाभी कहकर बुलाते हैं. असल में अखिलेश की लोकप्रियता को उनका ही परिवार पचा नहीं पा रहा है. उनके चाचा शिवपाल यादव अपने बेटे आदित्य यादव को राजनीति में सक्रिय करना चाह रहे हैं. लेकिन सफल नहीं हो पा रहे हैं. वहीँ एक अन्य चाचा प्रोफेसर रामगोपाल यादव अपने बेटे अक्षय यादव को सांसद बनाने में कामियाब हो गए हैं.

ऐसा नहीं है कि परिवारवाद केवल सपा में ही है. बहुजन समाजवादी पार्टी की मुखिया मायावती ने अपनी राजनीतिक पारी कांशीराम के साथ शुरू की. देश की पहली दलित मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती के परिवार में अभी कोई भी राजनीति में सक्रिय नहीं हैं. लेकिन उनके छोटे भाई आनंद कुमार को लेकर काफी चर्चाएँ हैं. कयास है कि आनंद मायावती की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाएंगे. मायावती भले ही अपने परिवार को राजनीति से दूर रखें. लेकिन बसपा में ऐसे कई नेता हैं. जिन्होंने अपनों को राजनीतिक विरासत सौपी है.पार्टी के पूर्व सांसद कादिर राणा अपनी पत्नी को टिकट दिलवाने में सफल रहे हैं. राणा के विधायक भाई भी इस बार चुनाव मैदान में हैं. पार्टी के बड़े नेता माने जाने वाले रामवीर उपाध्याय के भाई और पत्नी दोनों राजनीति में सक्रीय हैं. बसपा सरकार में रामवीर मंत्री थे. तब उनके भाई एमएलसी और पत्नी सीमा सांसद थीं. वहीँ बसपा का मुस्लिम चेहरा माने जाने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी के परिवार के तीन लोग राजनीति में सक्रीय हैं. दबंग नेता अंसारी के परिवार को तीन सीटों पर टिकट दिए गए हैं.

राष्ट्रीय लोकदल के संस्थापक अजीत सिंह को ही ले लीजिए. ये भी परिवारवाद का कम उदहारण नहीं हैं. अमेरिका में पंद्रह साल तक नौकरी करने के बाद राजनीति में सक्रीय हुए पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे अजीत सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रभाव रखते हैं. अजीत ने राज्यसभा सांसद के रूप में राजनीतिक पारी शुरू की थी. वे कई बार लोकसभा सदस्य और केंद्र में मंत्री रह चुके हैं. लेकिन राजनीति में अभी उनका समय बहुत अच्छा नहीं चल रहा. वे अपने बेटे जयंत के साथ पार्टी की राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं. जयंत 2009 में मथुरा से लोकसभा सांसद थे और अभी पार्टी के महासचिव हैं. वे अभी पार्टी का प्रमुख चेहरा हैं. अजीत अन्य दलों से गठबंधन के जरिए अपने बेटे जयंत की राजनीति चमकाने की जुगत में हैं.

उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर भी परिवारवाद को हवा देने में पीछे नहीं हैं. उनकी बेटी जूही बब्बर कई चुनावी सभाओं में उनके साथ सक्रीय दिखीं हैं. फिल्म तारिका जूही को देखने के लिए सभा में भरी भीड़ जमा होती हैं. जूही अपने पिता की लाडली और हाज़िर जवाब हैं. खबर है कि 1989 से राजनीति में सक्रीय हुए राज बब्बर अपनी बेटी जूही और दामाद अनूप सोनी को आम सभाओं में लाने की तैयारी में हैं. इसके संघ परिवार से ताल्लुक रखने वाली बीजेपी ने भी परिवारवाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. पीएम मोदी के कड़े ऐतराज के बावजूद पार्टी की जारी सूचियों में नेताओं के रिश्तेदारों को जमकर टिकट दिए गए हैं. देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को नोएडा से टिकट दिया गया है. पंकज 2001 से भाजपा के सक्रीय सदस्य हैं और 2007 में वे उत्तर प्रदेश भाजपा युवा मोर्चा का अध्यक्ष बन गए. विधानसभा चुनाव 2007 में वाराणसी के चिरईगांव से टिकट की घोषणा के बावजूद उनने पिता की सलाह पर चुनाव लड़ना उचित नहीं समझा. वे ग्रामीण इलाकों में पार्टी के लिए सक्रीय रहे. इसी तरह यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह अपने बेटे और पोते की राजनीति चमकाने में सफल रहे हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेता स्वामी प्रसाद मोर्य अपने बेटे का राजतिलक करने का प्रयास कर रहे हैं. बीजेपी में ऐसे और भी कई सीटों के उदाहरण मौजूद हैं. जहाँ परिवारवाद हावी रहा है.

ऐसे में देश की सियासत में जिस तरीके से परिवारवाद घुल रहा है. उससे लोकतंत्र के चेहरे पर धुंध सी छा गई है. जहाँ से देखे तो एक धुंधला सा चेहरा नज़र आता है जो आम आदमी हैं. एक आम मतदाता जिसका राजनीति से वोट देने के सिवा कोई सरोकार नहीं रह गया है. सियासत में रियासत के घुल रहे ज़हर के बीच स्वच्छंद लोकतंत्र की उम्मीद कहाँ की जा सकती है ?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और इंस्टिट्यूट फॉर गवर्नेंस पॉलिसीज और पॉलिटिक्स, नई दिल्ली में सीनियर रिसर्चर हैं)

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