
पौराणिक काल से लेकर आज तक न जाने कितनी बार नारी के दैहिक आकर्षण के वशीभूत होकर पुरुष के भीतर रहने वाला उन्मादए नारी के तन-मन पर गहरे घाव देता रहा है। पूर्व की घटनाओं से सीख लेने की बजाय, यह उन्माद दिन प्रति-दिन प्रबल होता जा रहा है। यह सही है कि विधाता ने नारी को भले ही दैहिक आकर्षण से सम्पन्न किया हो किंतु पुरुष को यह अधिकार नहीं कि वह उन्मादी और अविवेकी होकर अपराधी और अत्याचारी बन जाए किंतु इस स्थिति के दूसरे पहलू भी हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
वैश्वीकरण के इस युग में खुले समाज की रचना को मानव स्वतंत्रता का प्रमुख आधार बताया जा रहा है। आज के युग में किसी को भी किसी भी प्रकार की बंदिश स्वीकार नहीं है। इण्टरनेट पर परोसी जाने वाली पोर्न सामग्री से लेकर व्हाटसैप, फेसबुक आदि सोशियल मीडिया तक पर अश्लीता छाई हुई है। किशोर वय लड़के-लड़कियां अपनी आयु से पहले परिपक्व हो रहे हैं। टीवी, स्ट्रीट होर्डिंग्स, मैगजीन्स और समाचार पत्रों में छपने वाले विज्ञापनों में नारी के दैहिक आकर्षण को बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाया जा रहा है। टेलिविजन पर ऐसे विज्ञापन तथा धारावाहिक दिखाए जा रहे हैं जो युवा-मन में मनोवैज्ञानिक एवं यौन विषयक स्थाई विकृतियां उत्पन्न कर रहे हैं।
आज भारतीय समाज का मनोविज्ञान खाओ-पिओ मौज करो का बन गया है। धर्म-अध्यात्म, दर्शन, नीति की बात करते ही कुछ लोग एवं संगठन काट खाने को दौड़ पड़ते हैं कि आप किसी पर अपने विचार नहीं थोप सकते। आप लोगों की सोच पर ताले नहीं लगा सकते। आप किसी के कपड़ों की ऊंचाई तय नहीं कर सकते। आप लोगों का खान-पान तय नहीं कर सकते। ऐसे लोगों को यह कैसे समझाया जाए कि आप हर नारी की सुरक्षा के लिए एक-दो या चार पुलिस वाले भी नहीं लगा सकते। नारी तभी सुरक्षित होगी जब पुरुष के भीतर के उन्माद को नियंत्रित करने का वातावरण बनाया जाएगा और वैसी ही परिस्थितियां उत्पन्न की जाएंगी। यह कार्य घरों से ही आरम्भ हो सकता है। अध्यात्मिक व्यक्तियों की जीवनियों के प्रचार-प्रसार से समाज में उच्च वैचारिकता, चारित्रिक दृढ़ता और संयम उत्पन्न होना संभव है। स्त्री और पुरुष दोनों को ही इस समस्या का समाधान निकालना है न कि केवल पुरुष को। जेल, एफआईआर और कोर्ट-कचहरी में इस समस्या का समाधान न के बराबर है।
– डॉ. मोहनलाल गुप्ता
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