विष्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत इस समय लोकतंत्र के कर्णधारों के चुनाव में व्यस्त हैं। चुनाव लगभग समापन के कगार पर है तो रिजल्ट भी आने ही वाले हैं। चुनावी मोर्चे के मध्य नेताओं के मुंह से दागे जा रहे बयानों से सूमचा लोकतंत्र स्तब्ध है। कुछ प्रेम के इजहार में खोयें हैं तो कुछ सत्ता के गलियारें में ताक रहे हैं। भोर हो चुकी है सुबह का सूरज निकलने ही वाला है। बस कुछ ही समय में लहर-कहर, शहर-गांव, जाति-पाति, ऊँच-नीच, भाषा-सम्प्रदाय और अनेकों वाद-विवाद के मध्य समीकरण का गणित हल होकर साॅल्यूशन आपके समक्ष होगा और नतीजों के आधार पर सरकार बनेगी और शासन की पटरी पर लोकतंत्र चलने लगेगा।
पिछले 6 दशक से अधिक समय से हमारा लोकतंत्र चल ही रहा है। एक सिस्टम जों अंग्रेज बना गये थे, एक परिपाटी जिसकी कल्पना रुसो ने की थी, एक परिभाषा जिसको अब्राहम लिंकन ने दिया था। कुछ उसी तर्ज़ पर हम चलते जा रहे हैं कोई अगर लंगड़ा है तो उसे घिसटते हुए चल रहे हैं भले ही वह अशक्त हो और चोटें खाकर-खाकर लहूलुहान हो रहे। देश के नीति नियंता हकीकत से दूर आभाषी योजनायें लाते रहें और उन योजनाओं में घोटालें और बंदरबाट भी होते रहें। असहाय गरीब हमेशा ही शासन, प्रशासन और न्याय से दूर रहा। देश में व्याप्त झोपड़पट्टें बढ़ते रहे, अंग्रेजी की समझ से दूर लोगों पर जबरदस्ती अंग्रेजी थोपे जाते रहेे, पढ़े-लिखे बेरोजगारों, अहसहायों और गरीबों के लिए ठंडी-गर्मी के मायने ठिठुरन और लू ही रहंे। एक तरफ जहां सरकारी तंत्र और लोकतंत्र के कर्णधार लोकतंत्र के रक्त पर जीवित रहे तो दूसरी तरफ लोकतंत्र अपना खून दे देकर अधमरा होता रहा।
भारत में भोर के तारे के अदृश्य होते-होते देश के तमाम चैराहों पर लेटे अवैध बांग्लादेशी समेत असहाय भारतीय अपना बोरिया बिस्तर समेटते हैं और सूरज की पहली किरण के साथ अपने मेहनत को नीलाम करने के लिए उन्हीं चैराहों के इर्द-गिर्द अपनी बोली लगाते दिखते हैं। एक तरफ गरीब को दो जून की रोटी नसीब नहीं तो दूसरी ओर देश में अनेकों ऐसी योजनायें हैं जिनकी जरूरत भारत के लिए तो नहीं ही हैं लेकिन उन योजनाओं से लोकतंत्र के रक्त रिस रहे हैं। आज देश कर्ज तले कराह रहा हैं और देश की जनता भी। मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में रोटी, कपड़ा और मकान आते हैं लेकिन मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा न कर पाने वाले हमारे बहुधा कर्णधार सिर्फ और सिर्फ सत्ता के लिए राजनीति करते आ रहे हैं।
लेकिन इसबार के लोकसभा चुनाव इनमें से अधिकांश मुद्दों को समाहित किये हुए हैं। अंग्रेजी पटरी पर चलायमान लोकतंत्र के पहियों से देशी आवाजें आ रही हैं। भोर और सुर्योदय के मध्य एक अजीब सी ध्वनी गुंजायमान है जो अपनी ध्वनि से आभाष कराने में लगी हैं कि इसबार बैलगाड़ी को मर्सीडीज से नहीं खिंचा जाने वाला, इसबार गमले में रखे विदेशी मिट्टी में फसल नहीं उगानी, इसबार भारत की आबोहवा के हिसाब से नीतियां और योजनायें बनेंगी। आभाषित ध्वनी आभाषी ही होती हैं लेकिन आभाष ही वह बीज है जो आगे अंकुरित होकर पेड़ बनेगा और फलेगा। देश के गरीब, निराश्रित, बेरोजगार, न्याय और अधिकारों से वंचित सर्वहारा वर्ग लोकतंत्र के भोर में तारों को निहार रहा है और उसे विश्वास हैं कि उन्हीं तारों में किसी एक का प्रकाश पृथ्वी पर मौजूद भारत पर भी आयेगा और अंधेरे में क्रान्ति का सूत्रपात कर इसको हरेगा।
आशा ही जीवन हैं बिना आशा के जीवन बेमतलब, बेरंग और नीरस हो जाता है। देश के भूखे गरीब, फाइव स्टार होटलों में हजारों रुपए वाले थाल को और निराश्रित लोग बहुमंजिली ईमारतों को निहार कर असंतोष में संतोष का समागम कर रहे हैं। सत्ता में बैठे लोगों की संपत्तियां हजारों गुणा बढ़ रही हैं तो गरीब अपने टूटे हुए थाल को देख सहमा हुआ है। देश में अंग्रेजी में सनी न्याय व्यवस्था, हजारों की संख्या में कानून सम्मत लाइसेंसें और स्वयं अंग्रेजी सर्वहारा की समझ के परे हैं। एक तरफ गरीबों के अबोध बच्चें फटेहाल चाय की दूकानों पर गालियां खाकर इसके अभ्यस्त हो चुके हैं तो दूसरी ओर कुछ लोग अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चों का एडमिशन कराने के एवज में लाखों फूंकने के लिए कतार में खड़े है।
लोकतंत्र के कर्णधार और सरकारी लोग सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से फासला बनायें हुये हैं क्योकि ये लोग जानते हैं कि सरकारी व्यवस्था दोयम दर्जे से बढ़कर कुछ नहीं। बात अगर यहीं तक रहती तो भी ठीक था लेकिन अब हमारे लोकतंत्र में बने हुये समान भी दोयम दर्जे के हो चले हैं। हमारे इंजीनियर, वैज्ञानिक, पूंजीपति और यहां की सिस्टम भी वैश्विक प्रतिद्वंद्विता में फिसड्डी हो चला है। साबून, तेल से लेकर मोबाईल, लैपटाॅप, कपड़े, दवायें, कल्चर सब के सब हम विदेशियों के ही प्रयोग कर रहे हैं। चाहे वह जीरो तकनीकी का हो अथवा हाई टेक्नोलाॅजी का। क्योंकि हमने अपने दिमाग को ट्रांसलेशन में खपा रखा हैं और ट्रांसलेशन से ना कोई आविष्कार होता है और न ही तकनीकी का विकास। आवश्यकता आविष्कार की जननी है लेकिन हमने अपने आवश्यकताओं के लिए आविष्कार की जगह विदेशियों की भाषा, भूषा, आचार, विचार, व्यवस्था, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान सब उठा लायें जोकि थोड़े देर के लिए तो सुविधाजनक था लेकिन बाद में वह गले की हड्डी बन गया। अब न तो उसे उगले बन रहा है और न ही निगले। अंग्रेजी जानने वालों का प्रतिशत 2011 की जनसंख्या के मुताबिक मात्र 1.34 प्रतिशत है लेकिन हम अपने समूचे पौध को 1.34 प्रतिशत में ठूसने में लगे हैं। यह सत्य है जिस प्रकार आपके माता-पिता का स्थान दूसरा कोई नहीं ले सकता उसी प्रकार देशी मिट्टी, भाषा, विचार का स्थान भी।
लेखक विकास कुमार गुप्ता पीन्यूज डाट इन के सम्पादक हैं इनसे 9451135000, 9451135555 पर सम्पर्क किया जा सकता हैं।