-अमितेश कुमार ओझा- काउंटर पर शोर मचने से अनायास ही बैंक में मौजूद हर किसी का ध्यान उस ओर चला गया। कंप्यूटर के सामने बैठा क्लर्क आपे से बाहर हो रहा था।… आप लोगों को और कोई काम है कि नहीं। रोज चले आते हैं पासबुक अपटूडेट कराने, जबकि कितनी बार बता चुका हूं कि आपके एकाउंट में पैसे जमा नहीं है। जाइए जब आपके एकाउंट में राशि जमा हो जाए , तभी अाइएगा। क्लर्क लगातार बड़बड़ाता जा रहा था।
कौतूहल से देख रहे किसी भी व्यक्ति की समझ में कुछ नहीं आया।
क्लर्क की डपट से हक्का – बक्का वृद्ध थके कदमों से वापस लौटने लगा। उसके लिए एक – एक कदम चलना मुश्किल हो रहा था। उसे निहार रहे लोगों को उससे सहानुभूति तो थी, लेकिन किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर बैंक का क्लर्क किस बात से नाराज होकर उस पर बरस पड़ा।
किसी तरह घर पहुंचने पर वृद्ध की पत्नी ने पूछा… क्या हुआ , मुन्ना ने आज एकाउंट में पैसा जमा कराया।निराश स्वर में बूढ़े ने जवाब दिया… नहीं। क्लर्क की डांट – डपट को याद कर उसकी आंखों से आंसू बह निकले।
घबराई पत्नी बोली…अरे आप रो क्यों रहे हैं। हो सकता है मुन्ना भूल गया हो, या फिर कोई जरूरी काम आ गया हो, जिससे पैसे भेज पाना उसके लिए संभव न हो। आज फोन पर बात कर लीजिए तो कुछ पता भी चले।
लेकिन वृद्ध अनमने भाव से सब कुछ सुनता रहा।
दरअसल समस्या ही कुछ एेसी थी।
इस दंपति का इकलौता इंजीनियर बेटा दूर शहर जा बसा था। पहले हर महीने की पहली तारीख को वेतन मिलते ही वह मां- बाप के गुजर – बसर लायक पैसे उनके एकाउंट में जमा करा देता था।
रकम निकासी के फौरन बाद मोबाइल पर फोन कर वह आश्वस्त होता कि पैसे मिले या नहीं।
घर आने पर वह माता – पिता से कहता… पापा आपने कितनी तकलीफें सह कर मुझे पढ़ाया- लिखाया। मेहनत – मजदूरी के साथ ही अापने रिश्तेदारों और गांव वालों के तानों की परवाह न करते हुए अपने हिस्से की सारी जमीन बेच दी। इसलिए कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हो सकूं। क्या मैं आप लोगों के लिए इतना भी नहीं कर सकता। बेटे के मुंह से एेसी बातें सुन कर पति – पत्नी गदगद हो जाते।
उन्होंने कुछ महीने पहले अपने बेटे की शादी धूमधाम से की। जिसके कुछ दिन बाद ही बेटा बहू को लेकर शहर चला गया। लेकिन समस्या इसके बाद शुरू हुई। गुजर – बसर लायक पैसों के बैंक में जमा कराने की तारीख पहली की बजाय लगातार बढ़ने लगी। अपनी आदत के विपरीत उनका बेटा रकम जमा कराने के बाद अब पहले जैसा गर्मजोशी से फोन कर माता – पिता से नहीं पूछता कि पैसे मिले या नहीं। इतने पैसों में काम चल जाएगा , या और जमा कराऊं।
लेकिन इस महीने तो हद ही हो गई। महीना खत्म होने को आया। लेकिन वृद्ध के एकाउंट में पैसे जमा नहीं हुए तो नहीं हुए। रोज इस उम्मीद में कि शायद आज बेटे ने रकम जमा करा दी हो, लाचार पिता बैंक जाता था। इसी से क्षुब्ध होकर क्लर्क आज उस पर बरस पड़ा था।
जिसे याद कर स्वाभिमानी वृद्ध की आंखों से आंसू रह – रह कर छलक उठते थे। वृद्ध की पत्नी भी बिल्कुल किंकतर्व्यविमूढ़ होकर शून्य की ओर लगातार निहार रही थी।
जीवन संध्या की दहलीज पर उनके सारे सपने चूर हो चुके थे, और अतीत की जगह बेहद डरावना भविष्य सामने खड़ा मानो चुनौतियां पेश कर रहा था….।
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लेखक बी.काम प्रथम वर्ष के छात्र हैं
पता – अमितेश कुमार ओझा
भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 (नया) खड़गपुर ( प शिचम बंगाल) पिन ः721301 जिला प शिचम मेदिनीपुर संपर्कः 08906908995