कुंभनगरी बनी धर्म और सियासत का अखाड़ा

संजय सक्सेना,लखनऊ
उत्तर प्रदेश में धर्मनगरी प्रयागराज में आस्था का ‘मेला’ कुंभ चल रहा है। यहां साधू-संतो के रूप में आस्था का जमावड़ा हैं तो ऐसे महात्माओं की भी कमी नहीं है जो धर्म का मान रखते हुए सियासत के द्वारा भी समाज को मजबूती प्रदान कराने का दिव्य सपना पाले रहते हैं। ऐसे महापुरूषों ने कुंभ में एक नई तरह की हलचल पैदा कर रखी है। भक्ति और सियासत के गठजोड़ के चलते कुंभ धर्म के साथ-साथ सियासी संकेत भी दे रहा है। कुंभ में जुटे साधू संत राजनेताओं को बता रहे हैं कि देश के लिये क्या जरूरी है। खासकर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुददा सबसे अधिक सुर्खियां बटोर रहा है। इसको लेकर 31 जरवरी को धर्म संसद भी होने जा रही है,जिसमें मंदिर निर्माण की संभावित तिथि भी रखी जा सकती है।

संजय सक्सेना
बात कुंभ से सियासी संकेत निकलने की कि जाए तो 29 जनवरी को योगी सरकार ने अपनी कैबिनेट कुंभनगरी में बुलाकर यह जता दिया है कि वह इस मौके को भुनाने में पीछे नहीं रहना चाहती है। योगी ने एक मीडिया समूह के कार्यक्रम में 24 घंटे की भीतर राम मंदिर निर्माण कहने की बात कहकर वैसे भी हलचल पैदाकर रखी है।योगी के मंत्री बैठक तो करेंगे ही इसके अलावा संगम में डूबकी लगाने के साथ-साथ अक्षयवट और सरस्वती कूप का भी दर्शन करेंगे। इस कैबिनेट बैठक में जनहित के साथ आस्था, धर्म, संस्कृति से जुड़ें प्रस्ताव भी पास किए जा सकते हैं। इससे पूर्व योगी सरकार अकबर के किले में स्थित अक्षयवट को जनता के लिये खोलने का निर्णय लेकर भी सियासी हलचल पैदा कर चुकी थी।
बात पूर्व सीएम अखिलेश की कि जाए तो उन्होंने प्रयागराज कुंभ में संगम तट पर त्रिवेणी में डुबकी लगाने के साथ ही सियासी तीर छोड़ते हुए केंद्र सरकार से उत्तर प्रदेश सरकार के लिए किला दान में मांग लिया। इस दौरान उन्होंने कहा कि सम्राट हर्षवर्धन ने कुंभ की परंपरा को आगे बढ़ाया। हजारों वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है। हर्षवर्धन यहां आते थे, सब दान करके चले जाते थे। अब केंद्र सरकार किला प्रदेश सरकार को दान करे क्योंकि अक्षयवट देखने का मौका मिल रहा है, गंगा-यमुना भी सामने हैं लेकिन सरस्वती नहीं दिखाई देतीं, वह किले में कैद हैं। भाजपा ने सरस्वती को ढूंढने का वादा किया था।
एकतरफ योगी सरकार कुंभ को यादगार बनाना चाह रही है तो दूसरी तरफ बीजेपी समेत तमाम दलों के नेता भी आस्था और सियासत की डोर में बंधे खिंचे चले आ रहे हैं। राष्ट्रपति के अलावा राज्यपाल राम नाइक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, कैबिनेट मंत्री उमा भारती, स्मृति ईरानी, पूर्व सेनाध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री वीके ंिसंह सहित तमाम नेता भी यहां अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। मोदी कैबिनेट की साध्वी निरंजन ज्योति को तो कुंभ में महामडलेश्वर बना दिया गया। योगी सरकार के भी कई मंत्री कुंभ स्नान कर चुके हैं। बात गैर बीजेपी नेताओं की कि जाए तो इसमें भी कई नाम शामिल हैं,लेकिन प्रमुख रूप से पूर्व सीएम अखिलेश यादव का कुंभ में आना प्रमुख घटना रही। अब राहुल-प्रियंका के आने की बारी है।
लब्बोलुआब यह है कि भारतीय जनता पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और यूपी के सीएम योगी ने कोई काम भले अच्छा किया हो,लेकिन यह क्या कम है कि मोदी के चलते तमाम दलों के दिग्गज नेता तुष्टिकरण की सियासत को छोड़ मंदिर-मंदिर चक्कर लगाने लगे हैं। गंगा में डुबकी लगा रहे हैं। केदारनाथ से लेकर कैलाश मानसरोवर तक न केवल जा रहे हैं,बल्कि इसका खूब प्रचार-प्रसार भी कर रहे हैं। कुंभ में भी ऐसे नेता देखे जा रहे हैं। चार फरवरी को राहुल-प्रियंका कुंभ नहाने आ रही हैं तो इससे पहले ही समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी प्रयागराज कुंभ में डुबकी लगाने पहुंच गए। गत दिवस संगम तट पर त्रिवेणी में डुबकी लगाने के दौरान उनके साथ अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि भी मौजूद थे। आस्था का आलम यह है कि कांगे्रस की नवनियुक्त महासचिव प्रियंका वाड्रा भी पदभार संभालने से पूर्व संगम में डुबकी लगाने मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज आ रही हैं। ऐसा लगता है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के खुद को जनेऊधारी हिंदू बताने के बाद अब उनकी बहन प्रियंका गांधी भी सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर हैं। सक्रिय राजनीति में उतरने के बाद वह मौनी अमावस्या (चार फरवरी) या पांच फरवरी को कुंभ में स्नान करने के बाद पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव का पद भार ग्रहण करेंगी। उनको पूर्वी उत्तर प्रदेश का चार्ज दिया गया है। कुंभ में तमाम साधू-संतो की मौजूदगी के बीच तमाम नेता भी यहां के चक्कर लगा रहे हैं तो मीडिया का भी जमावड़ा यहां देखा जा सकता है।
प्रियंका गांधी वाड्रा चार फरवरी को कांग्रेस अध्यक्ष अपने भाई राहुल गांधी के साथ प्रयागराज में चल रहे कुंभ मेला में संगम में डुबकी लगाएंगी। चार फरवरी को कुंभ का दूसरा शाही स्नान है। इसी दिन मौनी अमावस्या भी है। इसके बाद प्रियंका गांधी लखनऊ में राहुल के साथ एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करेंगी। अगर किसी कारणवश राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा चार फरवरी को संगम में स्नान नहीं कर पाते हैं तो वह दस फरवरी को पवित्र डुबकी लगाएंगे। 10 फरवरी का मुहुर्त भी खास है। इस दिन बसंत पंचमी है और तीसरा शाही स्नान है। माना जा रहा है कि यह शायद पहली बार है जब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी- दोनों संगम में स्नान करेंगे।
प्रियंका गांधी की इस योजना के कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। इसे भाजपा के दक्षिणपंथी विचारधारा का कांग्रेस को जवाब बताया जा रहा है। 2017 में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान कई मंदिरों में पूजा अर्चना की थी। यह कांग्रेस की सॉफ्ट हिंदुत्व की नीति के तहत किया गया था। राहुल गांधी के इस कदम की भाजपा ने आलोचना की थी और कहा था कि राहुल को मंदिर तभी याद आते हैं जब चुनाव आता है।
राहुल गांधी का भाजपा पर मंदिर को लेकर हमला कर्नाटक चुनाव के अलावा हाल ही में हुए राजस्थान, एमपी व छत्तीसगढ़ में भी जारी रहा था। इसके बीच में भाजपा की सभी आलोचनाओं का जवाब देते हुए राहुल गांधी ने कहा था कि वह भाजपा के लोगों से बेहतर हिन्दू धर्म को समझते हैं। राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने खुद को जनेउधारी हिंदू बताया था। राजस्थान के एक मंदिर में पूजा करते हुए राहुल ने अपना गोत्र दत्तात्रेय और ब्राह्मण बताया था। इससे पहले वर्ष 2001 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कुंभ मेले में पहुंची थीं और स्नान किया था। प्रियंका का प्रयागराज आना इस लिये भी महत्व रखता है क्योंकि इस क्षेत्र में वाराणसी, गोरखपुर, प्रयागराज, चंदौली व गाजीपुर जैसे भाजपा के मजबूत गढ़ हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में इनमें से ज्यादातर सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की थी। पीएम मोदी वाराणसी से सांसद हैं तो रेल राज्य मंत्री मनोज राय,मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इसी क्षेत्र से आते हैं।
वैसे, इस बात को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि अखिलेश,राहुल और प्रियंका प्रयाराज पहुंचकर भाजपा के हिन्दुत्व की छलांग पर भी बे्रक लगा देना चाहती है।

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