क्या आध्यात्मिकता ईगो पर प्रभावी नियन्त्रण रखने में मददगार होती है ?

डा. जे.के. गर्ग
ईगो दो मनुष्यों के बीच की मित्रता के बीच सबसे बड़ी दीवार बन जाती है, किसी भी बात का तिल का ताड़ और राई का पहाड बनाने में ईगो की सबसे बड़ी भूमिका होती हैं | जब परिवार में ईगो टकराता है तो परिवार का विघटन होता है |

ईगो से ही हम अपने अच्छे मित्रों को खो देते हैं, पारस्परिक सम्बंध बिगड़ जाते हैं,मन की शांती भी भंग हो जाती है एवं जीवन तनावयुक्त बन जाता है | क्रोध तब आता है जब आदमी के ईगो को चोट लगती है |अच्छा होगा आदमी अपनी जिन्दगी के घर से ईगो को अटाले की तरह बाहर फैकं दे ताकि वो खुद एक नेक दिल और अच्छा इन्सान बन सकें |

डा. जे.के.गर्ग
परमहंस रामकृष्ण कहा करते थे कि आध्यात्मिकता के सतत प्रयास से हम अपने अपरिपक्व ईगो को परिपक्व ईगो में परिवर्तित कर सकते हैं और इन्सान के भीतर परिपक्व ईगो के प्रादुभाव के साथ ही मैं-मैं, मेरा-मेरा के माया जाल से मुक्ति मिल जाती है |

क्या इन्सान अपने आप को मैं-मैं-मैं और मेरा-मेरा के माया जाल से मुक्त कर सकता है ?

अपने आप को मैं-मैं एवं मेरा-मेरा के माया जाल से मुक्त करना बहुत आसान तो नहीं है किन्तु ऐसा करना असंभव भी नहीं है | आत्मानुभव या स्वज्ञान के द्वारा हम अपने आप को मैं-मैं एवं मेरा-मेरा के माया जाल से मुक्त करा कर इस बात की अनुभूती कर सकते हैं कि मैं मात्र पंच महाभूतों से निर्मित शरीर नहीं हूँ किन्तु इससे अलग अविनाशी, अजर अमर शांतिमय, निर्मल पवित्र आत्मा हूँ | परमपिता परमात्मा का अंश हूँ | जो भी हो रहा है वह परमात्मा के द्वारा ही किया जा रहा है, में तो मात्र एक माध्यम हूँ | मैडिटेशन के निरंतर अभ्यास से हमें इस तथ्य का ज्ञान हो जाता है कि में शरीर नहीं हूँ किन्तु पवित्र आत्मा हूँ , आत्मज्ञान अर्जन के बाद हमारा विलासिता, एश्वर्य,मान-सम्मान तथा मोह माया से मोहभंग हो जाता है, और जैसे ही हमारा सम्मान-अपमान से मोहभंग हो जाता है उसी क्षण से हमें मैं—मैं-मैं एवं मेरे-मेरे के माया जाल से मुक्ति मिलना शुरू हो जाता है |

परमहंस रामकृष्ण ने ईगो के दो रूप बताये थे, यथा—

1. परिपक्व ईगो और 2. अपरिपक्व ईगो

परिपक्व ईगो—– में परमपिता परमात्मा का पुत्र हूँ, में यह शरीर नहीं हूँ किन्तु परम पवित्र निर्मल आत्मा हूँ एवं में परमपिता परमात्मा का सेवक हूँ—यह परिपक्व ईगो का सूचक है |

अपरिपक्व ईगो—- में सुन्दर हूँ, में शक्तिशाली हूँ, मेरे जैसा कोई नहीं है, में सर्वश्रेष्ठ हूँ, में धनवान हूँ , मेरे पास सुख सुविधा के सारे साधन हैं,सारी सुख सुविधायें मैनें अपने बुद्धी-सामर्थ्य-चतुराई एवं योग्यता से प्राप्त की है(———यह अपरिपक्व ईगो का सूचक है | अपरिपक्व ईगो इन्सान को सदेव सांसारिकता , भोग-विलास, और मैं-मैं, मेरा-मेरा से जोड़े रखता है |( आजकल के अधिकांक्ष राजनेता हमेशा मैं-मैं-मैं और मेरी उपलब्धी का राग अलापते रहतें हैं) |

परमहंस रामकृष्ण कहा करते थे कि आध्यात्मिकता के सतत प्रयास से हम अपने अपरिपक्व ईगो को परिपक्व ईगो में परिवर्तित कर सकते हैं और इन्सान के भीतर परिपक्व ईगो के प्रादुभाव के साथ ही मैं-मैं, मेरा-मेरा के माया जाल से मुक्ति मिल जाती है |

याद रक्खें कि इन्सान की बीती हुई जवानी कभी भी लौट कर वापस नहीं आती है और इसी प्रकार इन्सान का बुढापा कभी लौट कर नहीं जाता है | यह शरीर नाशवान है, पंच महाभूतों से बना है और एक दिन इन्हीं पंच महाभूतों यानी मिट्टी में मिल जाना है तो फिर इस नाशवान शरीर के लिये कैसा ईगो ? गोरा रगं हो तो गुमान न हो और काला रंग हो तो कोई हीनता न हो | अटल सत्य तो यही है कि श्मशान मे जलने वाले हर स्त्री-पुरुष की राख का एक ही रंग होता है चाहे वो अमीर हो या गरीब या उनकी चमड़ी काली रही हो या गोरी |

अत: अपने ईगो-अंहकार का त्याग कर विनम्र बनें, जिससे आप किसी के दिल से नहीं उतरें वरन उनके दिल में अपनी जगह बनायें | सबको स्नेह दें सभी का सम्मान करें |

जो परमात्मा के सामने झुकता है वह सबको अच्छा लगता है, किन्तु जो सबके सामने झुकता है वह परमात्मा को भी अच्छा लगता है एवं परमात्मा का लाडला-दुलारा बनता है | अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिये निर्णय आप ही को करना है ?

ईगो को नियंत्रित करने के कारगार उपाय

निम्नलिखित तथ्यों पर अपने अंहकार को एक तरफ रख कर मनन करें, ऐसा करने से आप जीवन की सच्चाईयों को पहचान कर आशातीत सफलताएँ प्राप्त कर सकगें |

नारायण मूर्ती एवं नन्दन नीलकेनी के बिना भी इनफ़ोसिस कंपनी सुचारू रूप से कार्य कर रही है, इंग्लिश भाषा में कावत है” No one is indispensable “ इस सच्चाई को आपको स्वीकार करना होगा कि आपके कार्यालय में अन्य सहकर्मी भी बुद्धीमान एवं चतुर है, हाँ यह हो सकता है की उनकी बुद्धीमता का स्तर आप के जितना नहीं हो |
आप इस गलतफहमी में नहीं रहें कि आपके उच्च अधिकारी या ग्राहकों आवश्यक सूचना/जानकारी सिर्फ आप ही दे सकते हैं, वें इनकी जानकारी आपके अन्य सहकर्मीयों या आपके अधिनस्थ कर्मचारियों से भी प्राप्त कर सकते हैं |

आपको दिए हुए कार्य के निष्पादन हेतु अगर आप अपने अधिनस्थ सहकर्मीयो की मदद लेते हैं तो यह आपकी कमजोरी की जगह आपकी सहजता ही कहलायेगी और इससे अन्य सहकर्मीयोंके दिल में आपकी इज्जत ही बढ़ेगी | जीवन में सदेव दूसरों को सम्मान दें किन्तु सम्मान पाने का प्रयास मत कीजिये |

अपने ईगो को अपने से दूर रक्खें | यह कहना बंद करें कि आपने इतना अधिक काम किया है, इसकी जगह अपने सहकर्मीयों/अधीनस्थ कर्मचारियों को प्रोत्साहित करें,टीम भावना से काम करें,काम की सफलता का श्रेय खुद को देने के बजाय अपनी पुरी टीम को दें | अपने सहकर्मीयों को जिम्मेदारी दे, उनके मार्गदर्शक और सलाहकार बने, उन्हें भी आपके मार्ग निर्देशन में सीखने का अवसर दें |

आप अपने परिवारजन के साथ उनके मुसीबत के समय साथ रहें, उनकी मदद करें,उनको सहयोग दें,जरूरी सलाह दें | आपने जीवन में कितना काम किया है उसे लोग समय के साथ शायद भूल भी जाये , किन्तु आपके द्वारा परिवार,समाज, आसपास के लोगों से किया गया अच्छा व्यहार, सामंजस्य प्रवर्ती और पारस्परिक मधुर सम्बन्धों की यादें उनके मानस पटल पर सदेव अंकित रहेगी|

याद रक्खें कि जो अंहकार के पत्थर बन गये थे उन्होनें अंत में हमेशा ही ठोकरें ही खायी है दूसरी तरफ दुनिया ने उसी की पूजा की है जिनके भीतर नम्रता एवं सदाशयता रही है |

ईगो दो मनुष्यों के बीच की मित्रता के बीच सबसे बड़ी दीवार बन जाती है, किसी भी बात का तिल का ताड़ और राई का पहाड बनाने में ईगो की सबसे बड़ी भूमिका होती हैं | जब परिवार में ईगो टकराता है तो परिवार का विघटन होता है |

ईगो से ही हम अपने अच्छे मित्रों को खो देते हैं, पारस्परिक सम्बंध बिगड़ जाते हैं,मन की शांती भी भंग हो जाती है एवं जीवन तनावयुक्त बन जाता है | क्रोध तब आता है जब आदमी के ईगो को चोट लगती है |अच्छा होगा आदमी अपनी जिन्दगी के घर से ईगो को अटाले की तरह बाहर फैकं दे ताकि वो खुद एक नेक दिल और अच्छा इन्सान बन सकें |

सन्दर्भ— विभिन्न संतों-महापुरुषों के उद्धभोंदन

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