सारे जग से न्यारा है, मेरा प्यारा हिन्दुस्तान

रामायण की चौपाई ,
और आयत ले कुरान की ।
यारों मैंने लिख डाली,
गज़ल ये हिन्दुस्तान की ।।
लेकिन हर मजहब की स्याही, कलम भरी इमान की ।
यारों मैंने लिख डाली,
गजल ये हिन्दुस्तान की ।।
एक शब्द सुनहरा हिंदी का ,
एक उर्दू का अल्फाज़ लिखा ।
मैंने अपनी भारत माँ का,
सुन्दर सा इतिहास लिखा ।
बैठ कर मंदिर की पेढी पर, मस्जिद का एहसास लिखा,
अमृतसर के स्वर्ण कलश से, मुरली का महारास लिखा ।
शंख बजाकर गाई आरती,
सरगम सुनी अज़ान की ।
यारों मैंने लिख डाली,गजल ये हिन्दुस्तान की ।।
वाहेगुरु के ग्रंथों के संग,
पैगम्बर के पंथ लिखे ।
श्याम, सूर, रैदास, कबीरा, रसखान से सूफ़ी संत लिखे ।
पच्चीस दिसम्बर के पन्नों से, माँ मरियम का प्यार लिखा ।
ख्वाज़ा के दरबार संग मैंने, श्रीमद् भागवत ज्ञान लिखा ।
दीप जलाकर दीवाली के,
रात लिखी रमजान की ।
यारों मैंने लिख डाली ,गजल ये हिन्दुस्तान की ।।
नतमस्तक हो अमर ज्योति पर, शहीदों का सम्मान लिखा ।
सुखदेव, भगतसिंह, राजगुरु और, बिस्मिल का बलिदान लिखा ।
जलियाँवाला की मिट्टी से,
मेरे देश का स्वाभिमान लिखा ।
लाल किले पर लहराता,
ये झण्डा हिन्दुस्तान लिखा,
जन -गण-मन की कलम चलाई,
राष्ट्र गीत के गान की ।
यारों मैंने लिख डाली गजल ये हिन्दुस्तान की ।।
ऊँच-ऊँचेँ गढ परकोटे,
येआन बान और शान की ।
ब्रजभूमि की देख मोहब्बत,
प्यारे राधे-श्याम की ।
राणा प्रताप की हल्दीघाटी,
चेतक के गुणगान की ।
जौहर जलती ज्वाला लिख दी,
पद्मिनी के मान की
झाँसी वाली रानी जैसी,
बेटी देश महान की ।
यारों मैंने लिख डाली,
एक गज़ल ये हिन्दुस्तान की ।
…गज़ल ये हिन्दुस्तान की ।।

प्रस्तुति सौजन्य
*बी एल सामरा नीलम*
पूर्व प्रबन्ध
सम्पादक कल्पतरू हिन्दी साप्ताहिक एवं मगरे की आवाज पाक्षिक पत्र

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