अज्ञान से सामान्य एवं आध्यात्मिक, दोनो जीवन में नुकसान होता है। इसलिए साधना की राह का चयन करते ही गुरु से सारे कायदे और बारीकियां भी समझ लेनी चाहिए। अन्यथा बाद में परेशानी होती है। इसे कुछ उदाहरणों से समझो –
1. कोई साधक गुरु के ठिकाने पर साधना कर रहा था। अचानक ही उसे बहुत गर्मी का अनुभव हुआ। अंदर पंखा-ए.सी. चल रहा था ; फिर भ ीवह गर्मी से घबरा कर बाहर चला गया। हुआ यह कि उस की कुएडलिनी शक्ति में हलचल होने लगी थी। यह बहुत अच्छी बात थी। उसे ऐसा ज्ञान नहीं था। यदि वह वहीं बैठा रहता तो उस दिन उस की कुण्डलिनी सक्रिय हो जाती जिस के लिए लोग आजीवन प्रतीक्षा करते हैं। इस तरह अज्ञान वश उस ने खुद का ही नुकसान किया।
2. एक अन्य साधक की कुएडलिनी जागी हुई थी। एक दिन उसने जोर मारा। अनाहत चक्र तक ऊपर उठ गई। उसे अपनी पीठ में धड़कन महसूस होने लगीं फिर पीठ आग की तरह जलने लगी। ताप सहन नहीं हो रहा था। उस के दीक्षा गुरु पर्दा कर चुके थे। वह दूसरे के पास गया। उन्होंने कुण्डलिनी को वापस नीचे धकेल दिया। किसी तीसरे ज्ञानी ने उसे सारी बात समझाई। तब उसे ज्ञात हुआ कि नासमझी में उसका ही नुकसान हुआ है।
3. साधना के दौरान कभी कभी कान सुन्न हो जाते हैं। अंदर नाद बजने लगता है। तब आरम्भ में सीटी जैसी गूंज होती है। उस साधक ने समझा कि कान खराब हो गए हैं। वह भी किसी साधु के पास गया। उस ने कान खोल दिए। नाद बंद हो गया। एक बुजुर्ग ने उसे सारी बात समझाई। तब वह बहुत पछताया। गुंज कान तो स्वतः ही ठीक हो जाते हैं।
4. कोई साधक अच्छी रूहानी अवस्था में था। वह कहीं बाहर गया। साधकों के बीच में बातचीत के दौरान अपनी सच्चाई बता दी। उन लोगों में एक तांत्रिक भी था। उस ने उक्त साधक को गले ल्राया और उस की रूहानी ताकत छीन ली। जब उस का ध्यान लगना ठहर गया तो उस ने किसी से बात की । तब नुकसान का खुलासा हुआ।
5. इसलिए जरूरी है कि गुरु से पहले ही सारी बात समझ ली जाए – नाम का शुद्ध उच्चारण, बैठने का ढंग ; पाँव सुन्न नहीं पड़ें, साधना की राह पर होने वाले अनुभव, शरीर में होने वाले परिवर्तन, ध्यानाचस्था में दिखने वाले सुंदर व डरावने दृश्य आदि। अच्छे साधक के लिए जरूरी है कि अपनी अनुभूतियां यथासम्भव नहीं बताए, हर किसी के घर भोजन नहीं करे, तांत्रिकों से दूर रहे, किसी अन्य साधक के गले नहीं लगे, भण्डारे में कम से कम खाए, तन-मन में होते रहने वाले परिवर्तन किसी अन्य को नहीं बताए ; अपने गुरु से ही मौन प्रार्थना करता रहे। गुरु तो रहबर होता है – देहांत के बाद भी अपने शिष्यों पर नजर रखता है।