हिंदुस्तान ..हिंदुस्तान है

रासबिहारी गौड
हिंदुस्तान ..हिंदुस्तान है…। हिंदुस्तान को हिंदुस्तान बनाने में किसी एक धर्म, जाति या समुदाय का ही योगदान नहीं है..।
इस नाम का शाब्दिक आयात फारसी से हुआ है….इस नाम का आचरणमय चरित्र वैदिक संस्कृति से जुड़ा हुआ है.. *इस नाम की समग्रता धर्म -जाति के विशाल वैविध्य में निहित है..।* कोई ये कहे कि किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़े ही है (स्व. राहत इंदौरी से क्षमा सहित) ..या ये हमारे ही बाप का हिंदुस्तान है ..दोनों अतिरेक हिंदुस्तान के फ्रेम में फिट नहीं बैठते…।
हिंदुस्तान को पौरणिक सन्दर्भो में खोजना भले ही आत्मिक सुख प्रदान करता हो .. लेकिन प्रमाणिक इतिहास की गलियों में जब-जब देश अतिवादी सत्ता के अधीन रहा..या जब धर्म को आधार बनाकर आभासी गौरव के गीत गाये गए ..तब- तब हिन्द की अटूट शक्ति खंडित हुई..।
हिंदुस्तान को जानने के लिए एक बार इतिहास की गलियों में हल्की सी फेरी लगाकर देखते है-
वैदिक सभ्यता (यह सभ्यता सरस्वती नदी के तटीय क्षेत्र जिसमें आधुनिक भारत के पंजाब और हरियाणा आते हैं) का कार्यकाल 2000 ई सा पूर्व से 600 ई. सा. पूर्व तक मानते हैं, यही सब वेदों का रचनाकाल भी रहा, शासक और व्यवस्था को लेकर उस समय लिखे गए साहित्य को आधार मान लिया गया है..।
ईसा पूर्व 7वीं और 6वीं शताब्दी में जैन और बौद्ध धर्म लोकप्रिय हुए…। 6 वीं ईसा पूर्व सदी ने (गौतम बुद्ध के समय) मोटे मोटे रूप ने सौलह बड़ी शक्तियां ( महाजनपद) विद्यमान थे। महत्वपूर्ण गणराज्यों में कपिलवस्तु के शाक्य और वैशाली के लिच्छवी.. । इसके अलावा कौशाम्बी (वत्स), मगध, कौशल, कुरु, पांचाल, चेदी, अवंति आदि राजतंत्रीय राज्य थे। सब एक दूसरे के प्रति विस्तार की नीतियां रखते थे ..परिणामतः भारत छोटे छोटे साम्राज्यों में बंट गया था जो मौर्य काल में फिर से संगठित हो सका।
मौर्य राजवंश (322-185 ईसा पूर्व) जिसका विस्तार आधुनिक अफगानिस्तान से मणिपुर और तक्षशिला से आधुनिक कर्नाटक तक फैला था… (केवल दक्षिण तक नहीं पहुँच पाया था..वहाँ चोल शक्तिशाली शासन था ) अशोक (265-241 BC) उस वंश का महत्वपूर्ण राजा था। मौर्य वंश का पतन भी उसके अनुगामी शासकों का अतिवादी और अकर्मण्य शासन रहा..।
मौर्य वंश के पतन के बाद लंबे समय तक भारत मे राजनीतिक एकता स्थापित नहीं हो सकी। कुषाण और सातवाहनों ने कुछ प्रयास जरूर किया।
मौर्योत्तर काल के उपरांत तीन बड़े राजवंशों का उदय हुआ..मध्य भारत में नाग शक्ति, दक्षिण में वाकाटक और पूर्व ने गुप्त वंश..। इसने गुप्त वंश का कार्यकाल रेखांकित करने योग्य रहा। इस कार्यकाल में देश की सांस्कृतिक पहचान में वृद्धि हुई( इसे हम भारत का स्वर्ण काल भी कहते हैं..।) गुप्त वंश के बाद हर्ष वर्धन ( 590-647 ई ) उत्तर भारत का एक मात्र उल्लेखनीय राजा रहा…जिसके राज्य का व्यपाक विस्तार के चलते उसे इतिहास अंतिम हिन्दू सम्राट माना गया।
बिखरे हुए राजतंत्र में वे राजतंत्रीय लूट खसोट के लिए आठवी सदी में सिंध पर अरबो के अधिकार से भारत मे इस्लाम का प्रवेश माना गया। अभी वे शासन के मन से हिन्द की ओर नहीं आये थे..।
शासकीय कार्यो में धर्म के अतिरिक्त हस्तक्षेप से भारत फिर से बिखराव और शक्ति हीन होता चला गया..कोई बड़ा उल्लेखनीय शासक नहीं आया..।
12 वीं सदी के अंत तक तुर्क दासों ने विधिवत अपना शासन स्थापित किया – जिनमे खिलजी, तुगलक, लोदी आदि थे। उस समय भी देश के अलग-अलग हिस्सों में छोटे- छोटे राजतंत्र, स्वत्रंत या उनके अधीन काम कर रहे थे..। पन्द्रवी सदी में मध्य एशिया से आये बाबर ने मुगल सम्राज्य की नींव रखी… उसके वंशजो ने ढाई से तीन सदियों तक राज किया ..और मूलतः भारत का वह स्वरूप गढ़ा जो आज का हिंदुस्तान है….। लगभग डेढ़ सदी बाद हिंदुस्तान अपने एकीकृत रूप में पुर्नजीवित हो सका..।
* *कुल मिलाकर हिंदुस्तान वैदिक संस्कृति से लेकर मुगल सल्तनत तक सबको अपने आप मे सामहित करते हुए आज का देश बना है …।*
महान बादशाह हो या छोटे-छोटे राजवाड़े उनका पतन, उनकी सोच में था..। जिस-जिस या जब-जब शासक या उसके राज्य ने संस्कृति के समभाव को अपनाया यह अजेय रहा..अद्वितीय रहा…। जब- जब सत्ता या समाज असहिष्णु हुआ तब तब राजवंशों के साथ देश और समाज दोनों का ही पतन हुआ…। पुष्पमित्र सुंग से लेकर औरंगजेब तक अनेक उदाहरण हैं जो उसे धर्म आधरित देश बनाना चाहते थे। इसके ठीक उलट ..चंद्रगुप्त, अशोक से लेकर रजिया बेगम, अकबर, दाराशिकोह, बहादुर शाह, आजाद भारत मे नेहरू जिन्होंने समभाव को जाना और हिंदुस्तान को हिंदुस्तान बनाया…।
वैदिक, बौद्ध, जैन, कुषाण, तुर्क, मुगल, अंग्रेजो की तरह हमें लूटकर या छोड़कर नहीं भागे ..वे कहीं से भी आये लेकिन इसी जमीन पर रहे इसी में दफन हो गए..। ठीक वैसे ही जैसे कोई किसी राज्य या देश से आकर हमेशा अगर उस देश का हो जाये तो उसे पराया नहीं कह सकते..।
आज हमारी भाषा, विरासत, रहन सहन, मिलकर ही तो हमारा हिंदुस्तान बनाते हैं..। हम रामनगर और सीतापुर रचते हैं..मिर्जापुर और मुराद नगर बसाते हैं..रामलीलाओं में रहमान राम बनाते हैं..और राम होकर दरगाह शरीफ मन्नत का धागा बांधते हैं ..यहीं हमारा हिंदुस्तान है..।
हिंदुस्तान वह नहीं है जो मंदिर को ढक कर उस पर मस्जिद खड़ी कर दे या मंदिर बनाने के लिए मस्जिद को ढहा दे..जहाँ इलाहाबाद या मुगलसराय का नाम बदल कर आर्यवर्त होने का गौरव खोजा जाए..। हिंदुस्तान को हिंदुस्तान रहने के लिए हिंदुस्तान को जानना जरूरी है ..इतिहास की बीथियो से गुजरना जरूरी है…। इतिहास को नकार कर ..उसके पन्नों को फाड़कर. स्याही का रंग बदल कर..आप अपना होना ही नकारते हैं जैसे आंखे मूँद कर बैठा कबूतर ना आकाश देख पाता है , ना उड़ान और ना ही सामने खड़ा शिकारी….।
हिन्दुतान का मतलब हिन्दू, मुस्लिम, सिख्ख, ईसाई, पारसी, यहूदी, जैन, बौद्ध, सहित सैकड़ों धर्म, जाति ,उपजाति हैं…। जो हमारा नागरिक है वह हिंदुस्तानी है..। वह ही हिंदुस्तान है…। हिंदुस्तान ..सिर्फ हिंदुस्तान है..।

रास बिहारी गौड़

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