*कविता- पवित्र आलोक*

रास बिहारी गौड़
किसी कविता ने कभी कोई क्रांति नहीं की
किसी किताब ने कभी तख्तापलट नही किया
फिर क्यों
शब्द के पास आने से डरते हैं सिहांसन
बौखला जाते हैं आइनों में जड़े राजा
कांपने लगती है खून सनी तलवारें

क्योंकि वे जानते हैं
कविता की राख से निकला जिन्न
समय के पार जाकर भी
समय का हिसाब मांग सकता है

किसी कविता ने
कभी ईश्वर को जन्म नहीं दिया
कभी देवालयों के द्वार पर भीख नहीं माँगी
कभी किसी रंग को अपने बेरंग होने नहीं चिढ़ाया

फिर भी कविता से डरते हैं
मन्दिर, मस्जिद, गिरजे, गुरद्वारे
कविता पर थोप देते हैं
अपने अकेले गान की बंदिशे

क्योंकि वे जानते हैं
कविता
आख्यान, कथा और ग्रंथों को
आँख खोलकर पढ़ने की जिद करेगी
उनके भीतर से नई कविता उकेर कर
फिर-फिर ईश्वर के सच से डराएगी

कविता ने
कभी किसी भूखे पेट को रोटी नहीं दी
किसी शोषित का पसीना नहीं पूछा
कमजोर की लाठी बन सहारा नहीं दिया
किसी को मौत के मुँह से नहीं बचाया
किसी को जीते जी स्वर्ग नहीं पहुंचाया

फिर भी
भूखे पेट, मन और पवित्र आत्माएं
कविता के पास बैठकर
अपना दर्द बाँटती हैं..बतियाती हैं
अपने आप में गुनगुनाती हैं
और
इस तरह पेट की भूख बेमानी हो जाती है
पसीना खिल खिल जाता है
भीतर अपने आप एक ताकत उग जाती है
आत्मा की पवित्रता से आलोक झरने लगता है

*रास बिहारी गौड़*

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