
इबादत तो मन की जागरूकता है। अधर्म, अनीति, अपकर्म नहीं करने का संकल्प है। इबादत तो तकरार, तिरस्कार, प्रताड़ना, प्रपंच आदि से बचे रहने की सचेतनता है। यह अंदर का संयम है। अंतःकरण का रूहानी नियमन है। यह तो वस्तुवादी स्वाद, भोग आदि के यौगिक रूपांतरण की आंतरिक प्रक्रिया है। यह धूप, दीप, अगरबत्ती से सम्भव नहीं है।
इबादत तो मानस भक्ति है। अंदर वाले चिदाकाश को खोलने वाली साधना की निरंतरता ही इबादत है। अपनी ही श्वास में सोहं सुनने का तरीका है इबादत। अनहद नाद में डूबो देने वाली उपासना है इबादत। यह जूतों, चप्पल, टोपी रुमाल वाली तमीज से नहीं सधेगा। इसलिए इबादत सम्पूर्णतः मन की विभूति है। यह मन को पदार्थ से परमाणु तक ले जाने वाली प्रक्रिया है। यह मनुष्य को शुक्राणु से ब्रह्माणु तक पहुंचा देने वाली रूहानी प्रयोगात्मकता है। इसी का दूसरा नाम है – खुदा से इश्क करना। ं