रूहानी संवाद : इबादत में बाहरी तमीज और तहजीब की तो जरूरत ही नहीं है!

शिव शर्मा
तमीज और तहजीब का संबंध शरीर से है। इसका ताल्लुक कर्मकाण्ड से है – सिर ढकना, साफ वस्त्र पहिनना, जूते चप्पल उतार कर अंदर जाना, फूल माला अगरबत्ती पेश करना आदि बाहरी धार्मिक क्रियाएं हैं। ये इबादत नहीं हैं। इबादत तो मन का अभ्यास है। इबादत तो मन को आतमा से जोड़ने का तरीका है। इबादत तो निराकार अहंकार को रूह में फना कर देने का संकल्प है। इबादत खुदी को मिटा देने की दिलेरी है। तमीज और तहजीब की इस मन तक तो पहुंच ही नहीं है। वहां तो करोड़ों न्यूरांस हैं, करोड़ों स्पंदन हैं। वहां तो अदृश्य विचार हैं, अदृश्य भाव हैं। वहां पूर्व जन्मों के निराकार संस्कार संचित हैं। वहां तहजीब क्या करेगी। वहां तमीज क्या करेगी।
इबादत तो मन की जागरूकता है। अधर्म, अनीति, अपकर्म नहीं करने का संकल्प है। इबादत तो तकरार, तिरस्कार, प्रताड़ना, प्रपंच आदि से बचे रहने की सचेतनता है। यह अंदर का संयम है। अंतःकरण का रूहानी नियमन है। यह तो वस्तुवादी स्वाद, भोग आदि के यौगिक रूपांतरण की आंतरिक प्रक्रिया है। यह धूप, दीप, अगरबत्ती से सम्भव नहीं है।
इबादत तो मानस भक्ति है। अंदर वाले चिदाकाश को खोलने वाली साधना की निरंतरता ही इबादत है। अपनी ही श्वास में सोहं सुनने का तरीका है इबादत। अनहद नाद में डूबो देने वाली उपासना है इबादत। यह जूतों, चप्पल, टोपी रुमाल वाली तमीज से नहीं सधेगा। इसलिए इबादत सम्पूर्णतः मन की विभूति है। यह मन को पदार्थ से परमाणु तक ले जाने वाली प्रक्रिया है। यह मनुष्य को शुक्राणु से ब्रह्माणु तक पहुंचा देने वाली रूहानी प्रयोगात्मकता है। इसी का दूसरा नाम है – खुदा से इश्क करना। ं

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