रटने से रचने तक: आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली से मेरा एक सवाल

प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल

हाल ही में अजमेर में राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की सृजनात्मक प्रतियोगिता के समापन समारोह में विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों के बीच बैठने का अवसर मिला। वहां से लौटते हुए मन में एक सवाल बार-बार लौटता रहा, जो शायद हम सबको बार-बार पूछना चाहिए — क्या हम अपने विद्यार्थियों को केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए तैयार कर रहे हैं, या उन्हें नए विचार गढ़ने, समस्याओं को नए ढंग से देखने और भविष्य रचने योग्य भी बना रहे हैं?

बोर्ड से मेरा जुड़ाव कोई नया नहीं है। वर्ष 2004 से मैं इसकी गतिविधियों से जुड़ा रहा हूं, सदस्य के रूप में पाठ्यपुस्तक लेखन में योगदान दिया है और नीतिगत निर्णयों में भी अपनी राय रखी है। इसी अनुभव के आधार पर मुझे यह कहते हुए संकोच नहीं कि बोर्ड द्वारा आयोजित हमारी सृजनात्मक प्रतियोगिताएं वर्षों से चार-पांच-छह श्रेणियों तक सिमटी रही हैं, जबकि आज के भारत में उभर रही प्रतिभा की प्रवृत्तियां कहीं अधिक विविध और तेज़ी से बदलती हुई हैं। हमारी सृजनात्मकता बीते तीन दशकों में जिस स्तर पर थी, बड़े पैमाने पर आज भी वहीं ठहरी हुई प्रतीत होती है — उसमें अपेक्षित विस्तार नहीं हो पाया।

सृजनात्मकता केवल कला और साहित्य का विषय नहीं
यह ठहराव मुझे एक गहरी शैक्षिक भूल की ओर इशारा करता प्रतीत होता है — सृजनात्मकता को कला, चित्रकला या निबंध-लेखन जैसी परंपरागत श्रेणियों तक सीमित मान लेना। जीवन के हर क्षेत्र में, हर कर्म में एक सृजनधर्मिता होती है, और आवश्यकता इस बात की है कि उस कर्म को पहचानकर सृजनात्मकता का दायरा बढ़ाया जाए। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अनुसंधान, उद्यमिता, शासन-प्रशासन और पर्यावरण — हर क्षेत्र में आज मौलिक और नवाचारी सोच की मांग लगातार बढ़ रही है। मैं किसी भी परिवार या संस्थान को तभी शैक्षिक मानता हूं जब उसमें सृजनधर्मिता मौजूद हो — यही मेरी शिक्षा-दृष्टि का मूल आधार रहा है।

रटने से नहीं, रचने से बनती है शिक्षा
मुझे लगता है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में सीखने और रचने के बीच एक गहरा फासला है। हमें विद्यार्थियों को केवल इस लायक तैयार करना पर्याप्त नहीं कि वे खुद से पूछें “क्या मैं इसे सीख सकता हूं” — हमें उन्हें यह पूछने योग्य बनाना होगा कि “क्या मैं इसे रच सकता हूं”। सीखने से सृजन तक की यह यात्रा अगर हमने तय नहीं की, तो 2047 तक विकसित भारत की जो परिकल्पना हमने संजोई है, वह शायद साकार नहीं हो पाएगी।

यहां मुझे एक पुराना अनुभव याद आता है, जो शिक्षक-प्रशिक्षण और कक्षा-शिक्षण की गुणवत्ता पर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है। वर्ष 1996 में एक रिफ्रेशर कोर्स के समन्वयक के रूप में मैंने देखा कि जेएनयू, नई दिल्ली से आए एक विशेषज्ञ ने अंग्रेजी व्याकरण पढ़ाते हुए पूरे सत्र में एक ही उदाहरण वाक्य का इस्तेमाल किया — “आई किल्ड ए स्नेक” और उसका पैसिव वॉइस “ए स्नेक वाज़ किल्ड बाय मी”। सत्र समाप्त होने पर मैंने उनसे कहा कि व्याख्यान के दौरान कम से कम पचास सांपों की प्रतीकात्मक हत्या हो चुकी थी, और यह सोचने का विषय है कि हम चेतन-अचेतन रूप से पर्यावरण और भारतीय बोध को कक्षा में किस हद तक नुकसान पहुंचाते हैं। इस किस्से से मुझे यह हमेशा स्पष्ट रहा है कि कक्षा में पढ़ाई जाने वाली विषय-वस्तु से कहीं अधिक मायने यह रखता है कि उसे किस पद्धति और किस चेतना के साथ पढ़ाया जा रहा है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी इसी बिंदु को स्पष्ट करती है — कक्षा में “मटेरियल” उतना निर्णायक नहीं होता जितना “पेडागोजी” यानी पढ़ाने की पद्धति। शिक्षक किस सामग्री का चयन करते हैं, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वे उसे कक्षा तक कैसे पहुंचाते हैं। यह जिम्मेदारी अंततः हम शिक्षकों के कंधों पर टिकी है — जब तक कक्षा-शिक्षण में किताबी ज्ञान के साथ नवाचार और सृजन का पुट शामिल नहीं होगा, शिक्षा देने का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।

भारतीय बोध के बिना अधूरी है सृजनात्मकता
मेरे चिंतन की दूसरी बड़ी धुरी भारतीय ज्ञान-परंपरा और सृजनात्मकता के आपसी रिश्ते पर टिकी है। भारतीय सभ्यता मूलतः “कर्तव्य प्रधान” रही है और संस्कृति “ज्ञान प्रधान” — हमारे यहां अधिकारों से पहले हमेशा दायित्व की बात हुई है: माता, पिता, प्रकृति, समाज और पर्यावरण के प्रति दायित्व। जब भी अधिकारों की चर्चा हुई, तो इस शर्त के साथ कि वह दूसरों के अधिकारों में बाधा न बने। यह कर्तव्य-बोध ही कर्म से जुड़ता है, और कर्म में ही सृजनधर्मिता छिपी है — किसी भी काम को नए ढंग से करना ही सृजनात्मकता है।

भारतीय ज्ञान-मीमांसा की एक सूक्ष्मता मुझे बार-बार याद आती है — विवेक, बुद्धि, ज्ञान और सूचना के बीच जितना सटीक अंतर भारतीय चिंतन-परंपरा ने किया, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इसी सूक्ष्मता को बचाए रखने के लिए मेरा सुझाव है कि हम प्रतियोगिताओं को केवल परंपरागत श्रेणियों तक सीमित न रखें, बल्कि “अनुवादात्मक भारतीय बोध” को प्रोत्साहित करने वाली नई श्रेणियां भी जोड़ें। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 स्वयं यह इंगित करती है कि अनुवाद की प्रवृत्ति को बदलने की जरूरत है, क्योंकि अनुवाद के तरीके अब पहले जैसे नहीं रहे। चीन ने एक नई प्रवृत्ति शुरू की है — अपनी भाषा के मूल शब्दों (जैसे “संस्कृति”) को अंग्रेजी में अनुवाद किए बिना ज्यों का त्यों प्रयोग करना, कोष्ठक में “कल्चर” जैसा समानार्थी शब्द भर जोड़ देना। बिना सोचे-समझे किए गए अनुवाद ने हमारी सृजनात्मकता को भी बड़ी क्षति पहुंचाई है, और जब तक शिक्षा में भारतीय बोध का परिवेश नहीं होगा, तब तक मैं इसे अधूरी शिक्षा ही मानूंगा।

प्रतियोगिताओं का असली उद्देश्य: पुरस्कार से आगे
मैं मानता हूं कि ऐसे आयोजनों का मूल्य केवल पुरस्कार-वितरण तक सीमित कर नहीं आंका जाना चाहिए। प्रतियोगिताएं विद्यार्थियों को अपनी छिपी प्रतिभा पहचानने, खुद को अभिव्यक्त करने और आत्मविश्वास हासिल करने का मंच देती हैं — बशर्ते उनका दायरा लगातार विस्तृत होता रहे।

क्या हम बच्चों को सही उत्तर देना सिखा रहे हैं, या नए सवाल पूछना भी?
यही वह सवाल है जो मुझे बार-बार कचोटता है। मेरा मानना है कि विकास की यात्रा — व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र तक — जिज्ञासा से ही शुरू होती है। भारत ही नहीं, विश्व की तमाम बड़ी प्रतिभाएं इसलिए बड़ी बनीं क्योंकि उनमें जिज्ञासा की भावना प्रबल थी, और ऐसी प्रतियोगिताएं इसी जिज्ञासा को सींचने के लिए आयोजित की जाती हैं। मैं अक्सर कहता हूं — ज्ञान हमें बताता है कि संसार यह है, लेकिन जिज्ञासा हमें बताती है कि संसार ऐसा भी हो सकता है।

यह अंतर मामूली नहीं है। जो ज्ञान केवल दिए गए तथ्यों तक सीमित रहता है, वह विद्यार्थी को दुनिया को समझने तक ले जाता है; लेकिन जिज्ञासा उसे दुनिया को बदलने की कल्पना तक ले जाती है। यही वह बिंदु है जहां मैं अपने विद्यार्थियों — जिन्हें मैं जानबूझकर “जेन जी” नहीं बल्कि “भारतीय युवा” कहना पसंद करता हूं — से आग्रह करता हूं कि वे अपनी इस कल्पनाशक्ति का उपयोग सकारात्मक दिशा में करें और नकारात्मक प्रवृत्तियों का प्रतिरोध करें, ताकि सृजनात्मकता राष्ट्र-निर्माण के काम आए।

स्कूली शिक्षा से उच्च शिक्षा तक की निरंतरता
एक विश्वविद्यालय के कुलगुरु के रूप में मैं इसे एक सेतु की तरह देखता हूं। स्कूली स्तर पर जो जिज्ञासा और सृजनात्मकता विकसित होती है, वह तभी सार्थक होती है जब वह उच्च शिक्षा, शोध और नवाचार तक निर्बाध रूप से आगे बढ़े। बोर्ड-स्तर की प्रतियोगिताओं में जो जिज्ञासा आज पनप रही है, वही आगे चलकर विश्वविद्यालयों में अनुसंधान और नवाचार की नींव बनेगी। स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा के बीच यह समन्वय भारत की शैक्षिक प्राथमिकताओं में से एक होना चाहिए।

भारतीय बोध केवल विचार नहीं, जीवंत अनुभव
भारतीय बोध मेरे लिए कोई अमूर्त अवधारणा नहीं, एक जीवंत, अनुभवसिद्ध सच्चाई है। कोरोना काल में मैंने एक समाचार पत्र में एक घटना पढ़ी थी, जो मुझे आज भी याद है। दिल्ली से सहारनपुर की ओर पैदल जा रहे प्रवासी मजदूरों के एक समूह में एक गर्भवती महिला आगे चलने में असमर्थ हो गई। रास्ते में एक बंद घर के बाहर खड़ी साइकिल देखकर समूह ने उसे उठाया और दरवाजे पर एक पर्ची छोड़ी, जिसमें लिखा था कि साइकिल किस मजबूरी में ले जाई जा रही है और घर पहुंचते ही उसकी कीमत लौटा दी जाएगी। अगली सुबह जब घर के मालिक ने पर्ची पढ़ी, तो उसने खुद फोन कर पैसे लेने से इनकार कर दिया — और कहा कि अगर साइकिल के पिछले टायर की मरम्मत में खर्च हुआ हो, तो मुझे सूचित करना, मैं आपको भेज दूंगा। यह कोई मिथक नहीं, एक वास्तविक घटना है, और ऐसी घटनाएं ही मुझे यकीन दिलाती हैं कि भारतीय बोध कोई कल्पना नहीं, बल्कि संकट के समय समाज में सामने आने वाली एक ठोस सच्चाई है।

निष्कर्षतः 21वीं सदी का भारत केवल डिग्रीधारी युवाओं से आगे नहीं बढ़ेगा, उसे ऐसे युवाओं की जरूरत होगी जो नए विचार जन्म दे सकें, जटिल समस्याओं का हल खोज सकें और ज्ञान को समाज तथा राष्ट्र के विकास से जोड़ सकें। अजमेर के उस समापन समारोह में उठा यह सवाल, वास्तव में, हमारी समूची शिक्षा व्यवस्था से पूछा गया सवाल है — क्या हम अगली पीढ़ी को केवल परीक्षा पास कराने के लिए तैयार कर रहे हैं, या उसे भविष्य रचने योग्य भी बना रहे हैं? इसका जवाब जितनी जल्दी हम अपने स्कूलों और विश्वविद्यालयों की कक्षाओं में तलाशेंगे, विकसित भारत की परिकल्पना उतनी ही ठोस जमीन पर खड़ी होगी।

— प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल
(लेखक महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर के कुलगुरु हैं)

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