बेटा-बेटी को डाक्टर तो बनाइये, लेकिन उसे इन्सान पहले बनाइए!

मनोहर चावला
आज हर माँ- बाप की इच्छा रहती है कि उसका बेटा डाक्टर बने । वो शुरू से ही बच्चों के मस्तिक में ये विचार डाल देते है कि तुझे डाक्टर बनना है । और इसके लिए वे अपने बच्चों को कोचिंग क्लासो में दाख़िला दिलाते हैं। देखा नहीं आपने २४-२५ लाख विधार्थी नीट के एग्ज़ाम में बैठते है और डाक्टरों की अस्पतालों में जगह मात्र हज़ारो में होती हैं और चंद लोग ही डाक्टर बन पाते है ।केवल जुनूनी लोग ही डॉक्टर बनने का रास्ता चुनते हैं…डॉक्टर बनना सिर्फ एक डिग्री हासिल करना नहीं है।यह सालों की मेहनत, त्याग, संघर्ष, अनिश्चितता और लगातार सीखते रहने का सफर है।
10–14+ साल की पढ़ाई
MBBS, Internship, PG, DM/MCh और Fellowship तक पहुँचते-पहुँचते जिंदगी के कई महत्वपूर्ण साल पढ़ाई और परीक्षाओं में निकल जाते हैं।
कमाई बहुत देर से शुरू होती है
जब तक कई लोग अपने करियर में आगे बढ़ चुके होते हैं, तब तक एक डॉक्टर अपनी पढ़ाई और ट्रेनिंग में लगातार मेहनत कर रहा होता है।इनकी जिंदगी के कई खूबसूरत पल छूट जाते हैं
दोस्तों की शादियाँ, त्योहार, पारिवारिक समारोह और कई बार माता-पिता के साथ बिताने वाला कीमती समय भी इनके हाथ नहीं रहता!अनिश्चितता हमेशा बनी रहती है कभी परीक्षा की तारीख बदल जाती है, कभी परीक्षा स्थगित हो जाती है। लेकिन पढ़ाई, तैयारी और तनाव लगातार चलता रहता है।सेवा करने के बाद भी गलत समझा जाता है
सरकारी अस्पताल में रोज़ सैकड़ों मरीज देखने और अपनी पूरी क्षमता से उनका इलाज करने के बावजूद कई बार डॉक्टर को ही कठोर शब्द सुनने पड़ते हैं।
व्यक्तिगत जिंदगी भी पीछे छूट जाती है लंबी पढ़ाई और कठिन ट्रेनिंग के कारण शादी, परिवार और अपनी जिंदगी के कई फैसले भी देर से होते हैं। दूसरों से तुलना होती रहती है जब कई दोस्त नौकरी, व्यवसाय, घर और आर्थिक स्थिरता हासिल कर चुके होते हैं, तब डॉक्टर अभी भी अपनी पढ़ाई और विशेषज्ञता पूरी करने में लगा होता है। जिम्मेदारी बहुत बड़ी होती है अस्पताल में संसाधनों की कमी हो, मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा हो या व्यवस्था में कोई समस्या हो—इन सबका दबाव भी अक्सर डॉक्टर को ही झेलना पड़ता है। हर कोई सलाह देता है, लेकिन संघर्ष कम लोग समझते हैं
लोग डॉक्टरों को Ethics और Morality समझाते हैं, लेकिन रात-रात भर अस्पताल में रहना, गंभीर मरीजों को संभालना और हर दिन जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष देखना आसान नहीं होता।
और परीक्षाएँ कभी खत्म नहीं होतीं…Written Exam, Viva, Tutorials, Presentations, Clinical Cases और लगातार नई चीजें सीखना—डॉक्टर बनने के बाद भी सीखने का सिलसिला जारी रहता है।लेकिन फिर भी…
जब कोई मरीज बेहद गंभीर हालत में अस्पताल आता है…जब उसके परिवार की उम्मीदें लगभग टूटने लगती हैं !और डॉक्टरों की पूरी टीम की मेहनत से वह मरीज मौत के मुँह से वापस जिंदगी की ओर लौटता है, तो उस पल की खुशी शब्दों में बताना मुश्किल है।
वही एक पल वर्षों की पढ़ाई, त्याग, नींद की कमी और संघर्ष को सार्थक बना देता है।डॉक्टर बनना आसान नहीं है…लेकिन किसी की जिंदगी बचाने का एहसास भी आम नहीं है।
शायद इसलिए डॉक्टर सिर्फ एक पेशा नहीं चुनता—वह एक जिम्मेदारी, एक सेवा और एक जुनून चुनता है। लेकिन वक्त ने ऐसी करवट ली है कि अधिकांश डाक्टर अब सेवा भाव को छोड़कर पैसा कमाने में लग गए हैं वे मरीजों की नब्ज नहीं, जेब देखते हैं । अनावश्यक जांचे, दवाइयो में कमीशन, मरीज को रोगो से भयभीत करना, अस्पताल की बजाय घर पर मरीज़ देखना, घर पर ही दवाई की दुकान खोलना, अपनी लैब खोलना और उसी में ही महंगी जांचे करवाना और भी इन पर कई आरोप लगाये जा रहे है । लोग कहने लगे है कि अब इनकी आत्मा मर चुकी है सेवा भाव से यह महरूम हो चुके है ।पहले इन्हें ईश्वर का दर्जा दिया जाता था अब न जाने इनके बारे में क्या कुछ नहीं कहा जाता? इसलिए इन्हें पहले इंसान बनाइये और फिर डाक्टर। हालाकि इस आर्थिक पैसे के युग में कुछ ऐसे सेवाभावी डाक्टर भी है जिन्होंने अपना जीवन मरीजों की सेवा में समर्पित कर रखा है उन्हें हमारा सलाम! काश अन्य डाक्टर भी उन्ही लोगो से प्रेरणा ले और अपने बेटी- बेटो को डाक्टर बनाने वाले माँ- बाप को भी यह समझना होगा कि उन्होंने अपने बच्चों में सेवा भाव के संस्कार दिए है । और अपनी जिम्मेदारी को समझा है । डाक्टर भगवान नहीं तो कम से कम इन्सान तो बने ।

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