कुछ रिश्ते याद नहीं आते, शाम होते ही दिल में उतर आते हैं
बिना कोई दस्तक दिए, चुपचाप अपना घर बना जाते हैं
दिन की भीड़ में हम उनको अक्सर भूल भी जाते हैं
मगर ढलती धूप में जाने क्यों फिर सामने आ जाते हैं
कभी किसी पुरानी गली की खुशबू बनकर
कभी किसी भूली हुई हँसी की गूँज बनकर
वो बीते हुए मौसमों से निकलकर चले आते हैं
और आँखों में कुछ अधूरे ख़्वाब छोड़ जाते हैं
न कोई शिकायत होती है, न कोई सवाल होता है
बस दिल के किसी कोने में उनका खयाल होता है
कुछ रिश्ते साथ नहीं होते, फिर भी पास रहते हैं
दूरियों के बावजूद दिल के आसपास रहते हैं
शाम जब खिड़की से चुपके से कमरे में आती है
पुरानी यादों की कोई तस्वीर सामने रख जाती है
तब समझ आता है, रिश्ते खत्म कहाँ होते हैं
कुछ लोग बिछड़कर भी उम्र भर हमारे होते हैं
“राहत टीकमगढ़”