*विकल्पहीनता पर विराम*

*राजनीति विशेषकर लोकतंत्र में विकल्पहीनता तानाशाही को जन्म  देती है। भारत के लोकतांत्रिक बगीचे में   विकल्पहीनता का यह बिजूका पिछले बारह- तेरह वर्षों से खड़ा- खड़ा मुस्कुरा रहा है।*
           *इस विकल्पहीनता को खड़ा करने में, सत्ता द्वारा सब जायज-नाजायज  हथकंडे अपनाए गए हैं। प्रधानमंत्री की ‘लार्जर देन लाइफ़’ वाली छवि गढ़ने के लिए, असत्य, अज्ञान अभद्रता, आडम्बर, के साथ  सबसे अधिक ऊर्जा विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी, की छवि धूमिल करने के लिए लगाई गई। सार्वजनिक उपहास, वक्तव्यों को अनुचित व्याख्याएं, परिवारिक लांछन के साथ पप्पू अर्थात कि विक्षिप्त, अबोध या अज्ञानी के रूप में इस तरह प्रचारित किया कि जनसामान्य विकल्पहीनता में प्रधानमंत्री को एक मात्र विकल्प मानकर चुनता रहे। जबकि पब्लिक डोमिन में प्रधानमंत्री की शिक्षा और सत पर हमेशा  सवाल लगते रहे और  राहुल गांधी शिक्षित वर्ग के अपनी शालीन उपस्थिति दर्ज करवाते रहे। चूंकि लोकतंत्र का मतलब संख्या में निहित है। संख्या के गणित में राहुल गांधी का पिछड़ना तय था। परिणाम सत्ता द्वारा चस्पा “पप्पू ” की छवि उनका सच बनती चली गई।*
         *इधर पिछले कुछ महीनों में राहुल गांधी या उनकी राजनैतिक टीम ने इस सच को जान लिया। लोहे को लोहा काटता है,  डायमंड कट्स डायमंड, जहर को जहर  मारता है , की तर्ज पर, राहुल  गांधी प्रधानमंत्री को उनकी अपनी भाषा  में जवाब देने लगे, सत्ता की चिरपरिचित रणनीति पर चलने लगे। मतलब, संबोधन में अशिष्टता, भाषा में हल्कापन, आरोप में आक्रामकता, तथ्यों में अन्वेषण , झूठ की शिनाख्त , युवाओं के मुद्दे ,संसद में  दहाड़,  सड़क पर धरना.. सभाओं में उपहास… । परिणाम  सभाओं में स्व स्फूर्त भीड़ ..भीड़ से संवाद..। सत्ता पक्ष और प्रधानमंत्री का समूचा तंत्र हक्का बक्का इस देह परिवर्तन को समझ ही नहीं पाया..या जब तक समझने की कोशिश करता तब तक राहुल गांधी और आगे बढ़ चुके होते..*
        *यह कहना मुश्किल या जल्दबाजी है कि यह भीड़ वोटों में बदलेगी या नहीं, किंतु इतना हो गया है कि पप्पू का स्टीकर अब राहुल के माथे से हटकर प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व पर जा चिपका है।*
         *यक़ीनन राहुल के मूल प्रशंसक या विचारवान नागरिक को यह सब अच्छा नहीं लग सकता और इस आचरण का पक्ष लिया भी नहीं जाना चाहिए ..इसके अंतिम परिणाम अधिक भयावह  हैं..समाज उच्छलृंख आचरण को राजनीति मानने लगेगा। विचार अनुपस्थित होता चला जाएगा। उजाले की उम्मीद खत्म हो जाएगी। भाषा के दरवाजों  पर ताला लटक जाएगा..।*
         *बहुत संभव है राहुल गांधी भी यह सब जानते हो।  फिर भी अगर वे यह सब कर रहे हैं तो, या तो अपना बदला ले रहे हैं या फिर सोची समझी राजनैतिक रणनीति के तहत भविष्य का गणित गढ़ रहे हैं। बाद वाला अंदेशा अपेक्षाकृत अधिक सटीक लगता है।*
        *इस सबके तात्कालिक परिणाम सामने हैं। आज राहुल गांधी राजनीति- विमर्श के केंद्र में हैं। सत्ता-पक्ष बचाव की मुद्रा में है। आम जन के मुद्दे सुनाई दे रहे हैं। नागरिक बोध की आवाजें जिंदा हुई हैं। सत्ता के भय का वलय संकुचित हुआ है। सरकार जवाबदेही की लिए भाषा विन्यास बुनने लगी है। अजेय होने का तिलिस्म भंग हुआ है।*
         *सबसे महत्वपूर्ण, भारतीय लोकतंत्र में विकल्पहीनता पर लगा प्रश्न चिन्ह धुंधला पड़ रहा है… उस पर विराम लग गया है। सत्ता में चाहे जो दल या नेतृत्व आए लेकिन विकल्प का होना लोकतंत्र की सबसे पहली और महती शर्त है …*
*रास बिहारी गौड़*

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