नाना पाटेकरः अभिनय की आग में तपा असाधारण कलाकार

भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिन्हें केवल अभिनेता कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना है। नाना पाटेकर उन्हीं विरल कलाकारों में से एक थे। वे अभिनेता थे, रंगकर्मी थे, निर्देशक थे, लेखक थे, सामाजिक सरोकारों से जुड़े संवेदनशील नागरिक थे और भारतीय सेना के प्रति गहरे सम्मान एवं समर्पण का उदाहरण भी थे। उनकी आवाज में खुरदुरापन था, संवादों में धार थी, आंखों में आक्रोश और चेहरे पर जीवन के संघर्षों की सच्चाई। उन्होंने अभिनय को सजावटी कला नहीं बनाया, बल्कि उसे यथार्थ जीवन के अनुभवों, पीड़ा, संघर्ष, संवेदना और सामाजिक चेतना से जोड़ा। 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने एक ऐसा कलाकार खो दिया, जिसकी कोई दूसरी प्रतिकृति संभव नहीं है। वे अभिनय जगत के लिये एक अपरिहार्य नाम थे और ज्यादातर फिल्मप्रेमियों के लिये अजीज भी थे।
नाना की फिल्म-प्रतिभा हमें चौंकाती रही है, रोमांचित करती रही है, उकसाती रही है, क्योंकि उनकी फिल्मों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे आम लोगों के जीवन की सच्चाई और उनके संघर्षो को प्रामाणिकता एवं जीवंतता के साथ प्रस्तुत करते रहे हैं। भारतीय जिंदगी के रंग बेशुमार हैं, कला-संस्कृति की अविस्मरणीय धाराएं हैं, अनूठा एवं बेजोड़ इतिहास और उसकी कहानियां भी अनंत-अथाह। नाना का फिल्मी-युग भारत की खिड़की से विश्व को देखने एवं विश्व को भारत दिखाने की पहल का एक स्वर्णिम युग है। उन्होंने अपने किरदार से राष्ट्रीयता की भावना को भी सुदृढ़ किया। नाना का सफरनामा पूरी तरह मायूस हो चुके किसी भी इंसान के लिये प्रेरणादायी अध्याय भी है, उत्साह की मिसाल भी है। नाना पाटेकर का वास्तविक नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में हुआ। बचपन सामान्य था, लेकिन किशोरावस्था में ही परिवार आर्थिक संकट में घिर गया। पिता का कारोबार डूब गया और महज 13 वर्ष की उम्र में नाना को परिवार की मदद के लिए काम करना पड़ा। वे स्कूल के बाद मुंबई में फिल्म पोस्टर रंगते थे और करीब 35 रुपये महीने कमाते थे। काम पर जाने के लिए उन्हें कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था और बदले में एक वक्त का भोजन भी मिलता था। गरीबी और अभाव ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि भीतर से गढ़ा। बाद में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि भूख और अपमान ने उन्हें जीवन को समझना सिखाया।
कला नाना के जीवन में आरंभ से थी। उन्होंने सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट में शिक्षा ली और व्यावसायिक कलाकार के रूप में काम किया। लेकिन उनका वास्तविक विद्यालय था रंगमंच। मराठी रंगमंच की प्रख्यात निर्देशिका विजया मेहता के मार्गदर्शन में उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं। हमीदाबाईची कोठी जैसे नाटकों ने उन्हें गंभीर रंगकर्मी के रूप में पहचान दी। रंगमंच ने उन्हें संवाद बोलना ही नहीं, बल्कि संवाद के पीछे छिपी भावना को जीना सिखाया। नाना के करियर की शुरूआत फिल्म ‘गमन’ से हुई थी लेकिन इंडस्ट्री में उन्हें फिल्म ‘परिंदा’ से नोटिस किया गया जिसमें उन्होंने खलनायक की भूमिका अदा की थी। इस फिल्म में उनके अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार भी दिया गया। इसके बाद उन्होंने कई अच्छी फिल्मों में काम किया और अपने अभिनय का लोहा मनवाया। क्रांतिवीर, खामोशी, यशवंत, अब तक छप्पन, अपहरण, वेलकम, राजनीति उनकी प्रमुख फिल्मों में से एक हैं। शुरुआती वर्षों की निराशाओं के बावजूद उन्होंने अपनी राह नहीं छोड़ी। अंकुश और सलाम बॉम्बे! जैसी फिल्मों ने उनकी प्रतिभा को पहचान दिलाई।
इसके बाद नाना पाटेकर ने एक के बाद एक ऐसे किरदार निभाए, जिन्होंने हिंदी सिनेमा में अभिनय की एक अलग भाषा निर्मित की। ‘अंगार’ में उनका नकारात्मक किरदार, ‘तिरंगा’ में देशभक्ति से ओतप्रोत शिवाजी राव वागले, ‘क्रांतिवीर’ में प्रखर और विद्रोही प्रताप नारायण तिलक, ‘अग्निसाक्षी’ में जटिल मानसिकता वाला पात्र और ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ में संवेदनशील पिता-हर भूमिका में वे बिल्कुल अलग दिखाई दिए। क्रांतिवीर के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला, जबकि अग्निसाक्षी के लिए फिर राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हुए। इस तरह वे तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने वाले विशिष्ट अभिनेताओं में शामिल हुए। नाना की अभिनयशैली का सबसे बड़ा गुण था स्वाभाविकता के भीतर तीव्रता। वे संवाद को केवल बोलते नहीं थे, उसे जीते थे। उनकी आवाज कभी धीमी फुसफुसाहट बन जाती तो कभी विस्फोट की तरह फूटती। उनका चेहरा, आंखों की हरकत, हाथों का इस्तेमाल, अचानक आने वाला ठहराव और फिर तेज गति से निकलते संवाद-इन सबका अपना नाटकीय व्याकरण था। उनकी संवाद-अदायगी इतनी विशिष्ट थी कि साधारण वाक्य भी उनके मुंह से निकलकर यादगार बन जाता था। वे संवादों को अभिनय से बड़ा नहीं होने देते थे, बल्कि अभिनय के माध्यम से संवाद को अर्थ देते थे।
नाना की लोकप्रियता का एक अलग अध्याय ‘वेलकम’ है। गंभीर और आक्रामक भूमिकाओं के लिए पहचाने जाने वाले नाना ने उदय शेट्टी के रूप में ऐसी कॉमेडी की कि नई पीढ़ी भी उनकी मुरीद हो गई। उनका “कंट्रोल, उदय, कंट्रोल!” जैसे संवाद और चेहरे के हावभाव आज भी लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा हैं। यह उनकी अभिनय-बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण था कि जो कलाकार परिंदा और क्रांतिवीर में दर्शकों को भीतर तक हिला सकता था, वही वेलकम में उन्हें खुलकर हंसा भी सकता था। 2000 के दशक में ‘अब तक छप्पन’, अपहरण, शक्ति: द पावर, राजनीति जैसी फिल्मों में उन्होंने उम्र और अनुभव के साथ अपने अभिनय को और गहरा किया। अब तक छप्पन के पुलिस अधिकारी का किरदार हो या राजनीति में राजनीतिक संघर्षों के बीच खड़ा चरित्र-नाना हमेशा चरित्र की भीतरी बेचैनी को सामने लाते थे। मराठी सिनेमा में भी उन्होंने अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा। ‘नटसम्राट’ (2016) में रंगमंच के दिग्गज कलाकार की भूमिका उनके करियर की सबसे मार्मिक प्रस्तुतियों में गिनी जाती है।
नाना केवल अभिनेता बनकर संतुष्ट नहीं थे। ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ का निर्देशन करके उन्होंने यह साबित किया कि उनके भीतर निर्देशक और लेखक भी मौजूद है। इस फिल्म की तैयारी के दौरान उन्होंने सेना का कठोर प्रशिक्षण लिया। आगे चलकर उनका भारतीय सेना से संबंध वास्तविक जीवन का हिस्सा बन गया। वे टेरिटोरियल आर्मी से जुड़े और लेफ्टिनेंट कर्नल के मानद पद तक पहुंचे। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी वे सैनिकों के साथ रहे। पर्दे पर देशभक्ति का अभिनय करने वाले इस कलाकार ने वास्तविक जीवन में भी सैनिकों के बीच जाकर देश के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया। उनकी राष्ट्रीयता किसी नारे की तरह नहीं थी, उसमें कर्तव्य और संवेदना थी। तिरंगा, प्रहार और क्रांतिवीर जैसी फिल्मों में देश, समाज और नागरिक जिम्मेदारी के प्रश्न दिखाई देते हैं। वे देशभक्ति को केवल सीमा पर लड़ने वाले सैनिक की भावना तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि ईमानदारी से अपना काम करना, कमजोर के साथ खड़ा होना और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी राष्ट्रसेवा का हिस्सा मानते थे। उनके व्यक्तित्व की दूसरी बड़ी विशेषता थी सादगी और सामाजिक प्रतिबद्धता। महाराष्ट्र के किसानों की समस्याओं और ग्रामीण संकट से वे गहराई से जुड़े। 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य किसानों और सूखा प्रभावित ग्रामीण परिवारों की सहायता करना था। उन्होंने राहत एवं सामाजिक कार्यों में आर्थिक सहयोग भी किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन पर शोक व्यक्त किया कि वे एक सच्चे ‘क्रांतिवीर’ थे जिन्होंने सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनकी खामोशी उतनी ही असरदार थी जितनी उनकी दमदार आवाज। उन्होंने हमेशा देश-विरोधी तत्वों पर लगाम लगाने की वकालत की।
नाना पाटेकर की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने स्टार बनने की कोशिश नहीं की, कलाकार बने रहे। वे ग्लैमर की दुनिया में रहते हुए भी अपनी जड़ों से कटे नहीं। गरीबी ने उन्हें संवेदनशील बनाया, रंगमंच ने अनुशासन दिया, फिल्मों ने व्यापक पहचान दी, सेना ने राष्ट्रबोध को मजबूत किया और सामाजिक कार्यों ने उनके भीतर के मनुष्य को जीवित रखा। उनके अभिनय की विरासत केवल पुरस्कारों में नहीं, उन पात्रों में है जिन्हें उन्होंने अमर कर दिया। परिंदा का अन्ना, क्रांतिवीर का प्रताप, तिरंगा का शिवाजी राव, अब तक छप्पन का पुलिस अधिकारी, नटसम्राट का गणपत बेलवलकर और वेलकम का उदय शेट्टी-ये सभी नाना के अलग-अलग चेहरे हैं, लेकिन इनके पीछे एक ही कलाकार है, जो अभिनय को दिखाता नहीं था, संवेदनशीलता के साथ जीता था। नाना पाटेकर का जीवन हमें यह संदेश देता है कि प्रतिभा अवसर की मोहताज नहीं होती। जिस किशोर ने कभी 35 रुपये महीने के लिए फिल्म पोस्टर रंगे थे, वही आगे चलकर तीन राष्ट्रीय पुरस्कारों और पद्मश्री से सम्मानित हुआ। भारत ने एक अभिनेता खोया है, लेकिन उसकी कला, आवाज, संवाद, संघर्ष और संवेदनशील नागरिक की छवि लंबे समय तक जीवित रहेगी। नाना पाटेकर की सबसे बड़ी फिल्म शायद उनका अपना जीवन था-संघर्ष से शुरू हुई, संवेदना से समृद्ध हुई और कर्म की सच्चाई पर समाप्त हुई।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज
दिल्ली-110092, मो. 9811051133

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