बुरी फसी मगरूर राणी

महेन्द्र सिंह भेरूंदा
एक रानी थी जो हर वक्त अपने प्रशंसको से घिरी रहती थी इस लिए स्वयम की प्रशंसा के उन्माद में उसे राज्य में प्रगति करने में कोई रुचि नही थी एक दिन रानी का दरबार लगा हुआ था तब एक मंत्री ने बताया कि राणी साहिब जनता में आस-पास के राज्यों से प्रगति की प्रशंसा होने के कारण जनता में कुछ खिन्नता दिखाई दे रही है ।
तो महाराणी ने मंत्रियों से पूछा इस से हमें क्या नुकसान है और इसक उपाय क्या है ?
एक मंत्री ने कहा जनता की नाराजगी से राणी साहिब आपको तो कोई नुकसान नही है , मगर महाराणी जी हमें पड़ोसी राज्यो की बकवास को बंद करने के लिए कोई उपाय तो करना पड़ेगा इसके लिए हम कुछ करे या ना करे मगर ऐसा लगना चाहिए कि हम जनता के लिए बहुत कुछ कर रहे है ।
रानी को यह सुझाव अछा लगा और रानी ने कहा हाँ यह ठीक है मगर बताओ यह होगा कैसे ।
एक मंत्री ने कहा महाराणी साहिबा सूबे का रुतबा तब बढ़ेगा जब आपका रुतबा बढ़ेगा इसके लिए सम्पूर्ण प्रदेश में एक गौरव यात्रा निकाली जाए ।
बरखुरदार उसमें क्या होगा ? राणी ने पूछा
इसमें राणी साहिब आपके प्रशंसा के कसीदे पढ़े जाएंगे ।
राणी ने वित्तमंत्री की तरफ देख कर पूछा इसमें जनता को खुश करने के लिए क्या कुछ देना पड़ेगा ?
कुछ भी नही देना पड़ेगा महाराणी साहिबा आपको तो केवल भाषण देना पड़ेगा आप अपने भाषण में यह कहती रहिएगा कि हमने यह कर दिया और हमने वह कर दिया तथा आगे भी हम यह करवाएंगे और हम वह भी करेंगे बस इन बातों से दिल्ली की सलतनत तक आपके प्रशंसा का बिगुल बज जाएगें ।
राणी इस प्रस्ताव से बहुत प्रभावित हुई और दूसरे दिन ही गौरव यात्रा के इंतजामात का आदेश दे डाला और प्रातःकाल से यात्रा भी प्रारम्भ हो गई मगर राणी का रथ ज्यो ही नगर के मुख्यद्वार से निकलने लगा और ना जाने बिल्ली किधर से आई और रास्ता काट गई ।
देखते हुए भी सत्ता के मद में महाराणी ने अनदेखी कर के कारवां आगे बढ़ाने का आदेश दिया मगर अपशकुन का असर पहले दिन से ही जनाक्रोश से महाराणी को रूबरू होना पड़ा और दूसरे व तीसरे दिन तो जनआक्रोश चरम पर दिखाई देने लगा और आननफानन में कार्यक्रम बीच मे ही छोड़कर महाराणी को महल का रुख करना पड़ा और सिपहसालोरो व मन्त्रीगणो को आपात बैठक बुलाई गई सभी ने गौरव यात्रा के गौरव के हालात को सुनकर व राणी के चहरे की उड़ी हुई हवाइयां देख कर निर्णय लिया कि यात्रा से पीछे हटने में तो राणी साहिबा की तौहीन बादशाह सलामत तक दिल्ली पहुच जाएगी ।
मंत्रीगणों ने बाद विचारविमर्श निर्णय लिया कि यात्रा का मार्ग व साधन बदल दिया जाय ताकि काले झंडे दिखाने वाले सड़क मार्ग पर रथ का इंतजार ही करते रह जाएंगे महाराणी पुष्पविमान से सीधी सभास्थल के करीब ही उतरेगी भाषण दिया और रवाना बस ।
इस निर्णय से महाराणी तमककर बोली क्या बस वो उछल उछल कर जो सभा स्थल पर खिलाफ नारे लगा रहे है उनका क्या करोगे ?
राणी के इस जटिल प्रश्न के आगे सभी निरुत्तर हो गए !
मगर एक राणी के विश्वासपात्र अधिकारी ने खड़े होकर कुछ बोलने की इजाजत मांगी और बोला राणी साहिबा गुस्ताखी माफ हो एक उपाय मैं बताता हूं ।
बताओ तुम बताओ ।
तब अधिकारी बोला हुकूम इस जनता के विरोध से ध्यान हटाने के लिए इनको मुफ्त फोन दे दिया जाए ।
अधिकारी की इस बात का मजाक उड़ाते हुए दरबार के सभी मंत्रीगण ठहाका लगा कर हँसने लगे ।
दरबार में अपने चहेते अधिकारी की तौहीन होने से राणी अपनी तौहीन भूलकर राणी जोर से चिल्लाई ” खामोश ” और दरबार में सन्नाटा छा गया और महाराणी ने अधिकारी को आगे बोलने का कहा बताओ इस से कार्यक्रम में क्या राहत मिलेगी और कैसे ?
महाराणी साहिबा यह मुफ्तखोर जनता विरोध को भूलकर मुफ्त फोन लेने के लिए लाईन खड़ी हो जयेगी और उछल कूद स्वतः कम हो जएगी ।
बात तो तुम्हारी सही है मगर फोन कौनसी कम्पनी के देना है ?
राणी साहिबा फोन तो जिओ का ही देंगे जिससे सेठ जी खुश और सेठ जी खुश तो चोकीदार भी खुश और आप समझ गए होंगे चोकीदार खुश तो बादशाह सलामत खुश और इस परामर्श को सुनकर राणी भी खुश , तो राणी ने सूबे में मुफ्त फोन देने की घोषणा कर डाली ।
अगले दिन राणी रोड़ के बजाय उड़न खटोले में सवार होकर गौरव यात्रा तो प्रारम्भ करदी मगर चौथे दिन से सूबे के लोग राणी के रथ कैसा था यह देखने को बेचारी जनता महरूम हो गई ।
खेर जैसे तैसे गौरव यात्रा में शांति तो हो गई मगर गौरव यात्रा में भीड़ कम और मोबाईल की दुकान पर भीड़ अधिक दिखाई देने लगी , लोगो का ध्यान राणी के गौरव में कम और मोबाईल पर अधिक ध्यान देती दिखाई दी परन्तु कुछ भी हो गौरव यात्रा फेल हो गई तो हो गई मगर यात्रा चल तो रही है नाक तो नही कटी अरे भाई असफलता के चलते समझौता ही समझदारी है वरना कटी हुई नाक साफ दिखाई देने लगती है ।
यह जीत तो जिओ की है वाह रे जिओ मेरे लाल ।

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