बलिया । ‘जन्मने सर्वे शूद्रा, संस्कारायते द्विजो भवति’ मनु स्मृति का यह श्लोक बलिया-सिकंदरपुर मार्ग स्थित ब्रह्माइन गांव के दलित नब्बे वर्षीय रमाशंकर राम पर सटीक बैठता है। दलित होने के बाद भी अपने कर्म के बल पर आज वह पंडित शंकर नाम से जाने जा रहे हैं। उच्च वर्ग की उपेक्षा के बाद भी कठिन अध्ययन के बूते वह मुकाम हासिल कर चुके हैं जो किसी विद्वान को मिलता है।
कक्षा सात तक पढ़े रमाशंकर जब 35 वर्ष के थे, तभी से शौकिया पंचांग देखने लगे। किसी दिन एक विद्वान पंडित ने कहा कि तुम्हे यह देखने का अधिकार ही नहीं है और उनके हाथ से पंचांग छीन लिया। इस उपेक्षा को उन्होंने चुनौती के रूप में लिया। कुछ दिनों बाद वह पूना चले गए। वहां मीरजापुर के रहने वाले पूना में बसे आचार्य राजाराम शास्त्री के संपर्क में आए। उनके सान्निध्य में पंचांग के जरिये गणना आदि का गहन अध्ययन किया। करीब तीन साल में उन्होंने इसकी महारत हासिल कर ली। वर्ष 1955 में वापस गांव आ गए। यहां वह लोगों की जन्म कुंडली बनाने के साथ ही लगन, शुभ मुहूर्त आदि देखने लगे।
इस बार भी कुछ लोगों ने उपेक्षित करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। आज वह पं. रमाशंकर राम नाम से अपार ख्याति अर्जित कर ज्योतिषी के रूप में चर्चित हैं। नब्बे साल की अवस्था में भी बिना चश्मे के ही आसानी से पंचांग से गणना कर लेते हैं। लगभग पांच साल पहले काशी व बदायूं से आए कुछ पंडितों ने उनकी परीक्षा लेने का प्रयास भी किया लेकिन वे उनकी दक्षता का लोहा मान गए। पंडित रमाशंकर ने कहा कि ज्योतिष महासागर है और इसका पूर्ण अध्ययन करना चींटी के पहाड़ पर चढ़ने के समान है।
पंचांग देखना ब्राह्माणों का काम है लेकिन किसी दूसरी जाति का व्यक्ति इस विधा में दक्ष है तो वह इसका लाभ दूसरों को बांट सकता है। उसे ऐसा करने से रोका नहीं जा सकता। परंपरा को आगे बढ़ाना उनकी अंतिम इच्छा है। इसी सोच के तहत वे अपने नाती अजीत कुमार को यह गुण सिखा रहे हैं। जनपद के रमेश कुमार चौहान, सुरेंद्र तिवारी, लक्ष्मण ओझा व विनय अग्रवाल उनके प्रमुख यजमान हैं। उन्होंने कहा कि पंडित रमाशंकर बड़ी विधि पूर्वक धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं।