स्थानीयवाद का मुद्दा कितना दमदार?

तेजवानी गिरधर
आसन्न लोकसभा चुनाव में अजमेर संसदीय क्षेत्र तीन लोक से मथुरा न्यारी की कहावत को चरितार्थ कर रहा है। न्यारी इस लिहाज से कि संभवत: अजमेर ही ऐसी सीट है, जहां कि ये पंक्तियां लिखे जाने तक नित नाम दावेदारों के नाम सामने आ रहे हैं। सिलसिला कहीं तो थमे। दोनों पार्टियों में सीमित स्थानीय दावेदार थे। वे चर्चा की शुरुआत में उभर गए थे, मगर बाहरी दावेदारों की संख्या प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। गिरिजा व्यास, सी. आर. चौधरी सरीखे नाम परिचित तो हैं, मगर अजमेर से उनका कोई वास्ता नहीं रहा। और तो और ऐसे ऐसे नाम, जो कि किसी ने नहीं सुने तक नहीं। मसलन पूर्व पर्यटन मंत्री बीना काक के रिश्तेदार व भीलवाड़ा के कपड़ा व्यवसायी रिजू झुंझुनूवाला, किरोड़ी सिंह बैंसला के पुत्र या पुत्री। प्रसंगवश बता दें कि जब पहली बार विधानसभा चुनाव में प्रो. वासुदेव देवनानी यहां आये तो उनका नाम भी पहली बार ही जानकारी में आया। इसी प्रकार भिन्न लोकसभा चुनावों में कांग्रेस जब विष्णु मोदी व हाजी हबीबुर्रहमान टिकट लेकर आए तो उनको भी कोई नहीं जानता था।
खैर, मुद्दे पर आते हैं। बाहरियों की चर्चा इतना होने का मतलब ये कत्तई नहीं कि स्थानीय दावेदार दमदार नहीं हैं या योग्य नहीं हैं, मगर जरूर कोई न कोई लोचा है, इसी कारण बाहरी दावेदार इस सीट को ललचाई नजर से देख रहे हैं। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि कहीं न कहीं हाईकमानों तक स्थानीयों की तुलना में बाहरी दावेदारों की ज्यादा पकड़ है, जो कि अपने रसूखात के दम पर टिकट लाने का माद्दा रखते हैं। ऐसे में स्थानीय दावेदारों की पेशानी पर चिंता की रेखाएं उभरना स्वाभाविक है। अगर वे किसी न किसी रूप में स्थानीयवाद की आवाज उठावा रहे हैं तो वह गलत नहीं कही जा सकती।
स्थानीयवाद का मुद्दा इस कारण जायज है चूंकि वर्षों से अजमेर की धरती पर पला-बढ़ा नेता ही यहां की समस्याओं व जरूरतों को बेहतर समझ सकता है। स्थानीय व्यक्ति ही जीतने के बाद स्थानीय जनता से जुड़ा रहेगा, जबकि बाहरी जीतने के बाद भी अजमेर वासियों को सीमित समय ही देगा। मगर क्या किसी का स्थानीय होना मात्र पर्याप्त है? क्या उसका प्रभावशाली होना जरूरी नहीं है? इसी सिलसिले में जेहन में एक बड़ा सवाल ये उठता है कि स्थानीय तो प्रो. रासासिंह रावत भी हैं। पांच बार जीत हासिल कर रिकार्ड बनाया, मगर उनके रिकार्ड में एक भी उपलब्धि दर्ज नहीं है। वजह सिर्फ ये कि दिल्ली के नक्कारखाने में उनकी आवाज तूती सी होती थी। वे सहज सुलभ थे, मगर ऐसी सहजता से हासिल क्या? ऐसे स्थानीय को ड्राइंग रूम में सजा कर रखें या सहलाएं। स्थानीय तो स्वर्गीय प्रो. सांवरलाल जाट भी थे, मगर दुर्भाग्य से अधूरे कार्यकाल में लौटा दिए गए, जिसमें वे अजमेर को कुछ नहीं दे पाए। इसके विपरीत मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट बाहर से आ कर जीते और उन्होंने एक ही कार्यकाल में इतने काम किए, जितने एकाधिक कार्यकाल वाले सांसद नहीं कर पाए। वो तो अजमेर का दुर्भाग्य था कि अजमेर को अपने इतिहास में पहली बार मिले केन्द्रीय मंत्री को भरपूर काम करवाने के बाद भी मोदी लहर में हार का सामना करना पड़ गया।
बहरहाल, अपनी समझदानी में तो यही समझ आता है कि पार्टियां स्थानीय को तो ख्याल में रखती ही होंगी, मगर उनकी चिंता केन्द्र में सरकार बनाने के लिए उचित आंकड़ा हासिल करने की होती है। और अगर एक पार्टी बाहरी पर हाथ रखती है तो दूसरी को भी उसकी टक्कर के लिए बाहरी की आयातित करना पड़ता है। जैसा कि पूर्व में सचिन के मुकाबले किरण माहेश्वरी को लाना पड़ा।
ऐसा नहीं कि अपुन बाहरी की पैरवी कर रहे हैं, मगर इस सच को भी दरकिनार नहीं करना चाहते कि स्थानीय जब तक वजनदार न हो, उसका कोई भी फायदा नहीं है। यह ठीक है कि स्थानीय सांसद स्थानीय विषयों को बेहतर समझता है और उनको लोकसभा में उठा सकता है, जैसा कि प्रो. रावत ने भी भरपूर किया, मगर नतीजा ढ़ाक के तीन पात। वैसे भी लोकसभा सदस्य से आम आदमी को कोई खास काम नहीं पड़ता। काम पड़ता है तो पार्षद व विधायक से। वह जरूर स्थानीय ही होना चाहिए।
लब्बोलुआब, सांसद भले ही स्थानीय हो या बाहरी, मगर दमदार होना चाहिए जो कि कोई बड़ी परियोजनाएं अजमेर में ला कर विकास के नए आयाम छुए।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

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