क्या अभिमंत्रित जल असरदार होता है?

आपने देखा होगा कि किसी भी पूजा अनुष्ठान के बाद पंडित सभी पर जल के छींटे डाला करते हैं। प्रसाद के रूप में जल का आचमन करवाते हैं। यहां तक कि शुद्धि के लिए उठावने के समापन पर भी जल के छींटे डाले जाते हैं। सवाल उठता है कि क्या जल के ये छींटे वाकई असरदार होते हैं?
शास्त्रों के अनुसार जल को अभिमंत्रित करने की पद्धति बहुत पुरानी है। कोई पूजा अनुष्ठान हो या शास्त्र का पाठ, उसमें तांबे के एक पात्र में जल भर कर रखा जाता है। आखिर में उस जल का छिड़काव किया जाता है। आचमन भी करने की प्रथा है। ऐसी मान्यता है कि पूजा-पाठ के दौरान रखे गए जल में सकारात्मक ऊर्जा संग्रहित हो जाती है। उस जल के छिड़काव या आचमन से शारीरिक व मानसिक पीड़ा दूर हो जाती है। भिन्न प्रकार की व्याधियों के लिए भिन्न प्रकार के मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। केवल जल ही क्यों, झाड़ा लगाने वाले तांत्रिक मोर पंख की पिच्छी को अभिमंत्रित करके कष्ट दूर करने के उपाय करते हैं। अंगूठी या माला आदि धारण करने से पहले उसे भी दूध से शुद्ध करके अभिमंत्रित किया जाता है।
यह एक स्वाभाविक सी जिज्ञासा होती है कि क्या इस प्रकार अभिमंत्रण कारगर होता है? जहां तक मेरे निजी अनुभव का सवाल है, मैंने पाया है कि यह पद्धति असरदार होती है। वर्षों पहले, जब मुझे तंत्र-मंत्र में रुचि थी, तब इस प्रकार के अनेक प्रयोग किए थे। उनमें से एक का जिक्र कर रहा हूं।
जब भी किसी अधिकारी या बड़े व्यक्ति के पास किसी काम के लिए जाना होता था अथवा किसी मीटिंग या सभा में भाषण देना होता था, तब तांबे के लोटे में जल भर कर एक मंत्र का एक सौ आठ बार उच्चारण करता। मंत्र था:- ओम् लक्ष्मीनारायण मोहन प्रेम वशीभूता, कुरु कुरु स्वाहा। उसके बाद उस जल को मुंह पर छिड़क कर कहीं जाता था। मेरा अनुभव तो ये है कि उसका असर दिखाई देता था। ऐसा नहीं कि मंत्र से जल को अभिमंत्रित करने की पद्धति में मेरा अंध विश्वास हो। शंका की दृष्टि से भी मनन करता था। सोच यह थी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जल अभिमंत्रित करने का प्रयोग करने से विल पॉवर बढ़ जाती हो। मन में यह भाव उत्पन्न हो जाता हो कि मैने अभिमंत्रण किया है, इस कारण वह असर डालेगा ही। वही भाव आत्मशक्ति बढ़ा देता हो। अभिव्यक्ति प्रखर हो जाती हो, वही काम कर रही हो। जो कुछ भी हो, मुझे तो अभिमंत्रण की पद्धति असरदार प्रतीत हुई।
एक बार किसी तांत्रिक ने जानकारी दी थी कि यदि किसी को भूख नहीं लगती तो उसका भी उपाय है। वो यह कि सुबह उठने के बाद तांबे के एक लोटे में जल डाल कर उसे दायें हाथ की हथेली पर रखें और ओम् अमिचक्रायक्रीय नम: मंत्र का एक सौ आठ बार उच्चारण करें। उसके बाद लोटे के जल को पी जाएं। इससे भूख जागृत हो जाएगी। हालांकि मैंने इस प्रयोग को नहीं आजमाया, लेकिन आपकी जानकारी के लिए यह साझा कर रहा हूं।
यह तो आपने भी सुना होगा कि ऋषि-मुनि हर वक्त अपने साथ एक कमंडल रखा करते थे। किसी को वर देने अथवा श्राप देने के लिए उस कमंडल के जल का उपयोग करते थे। अर्थात उनकी साधना व मंत्रोच्चार का असर कमंडल के जल में संग्रहित हुआ करता होगा। चूंकि जल अति संवेदनशील है, इस कारण आम तौर पर मंदिर किसी तालाब या नदी के किनारे पर बनाए जाते थे। मान्यता है कि पहाडिय़ों की ऊंची चोटियां भी ऊर्जा युक्त होती हैं, इस कारण कई मंदिर पहाडिय़ों पर बने हुए हैं।
कुल जमा बात ये है कि जल में जीवनी शक्ति होती है। विशेष रूप से गंगा की बात करें तो वह बहुत पवित्र मानी जाती है। उसकी शुद्धता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि उसका जल किसी पात्र में वर्षों तक रखा हो तो भी वह अशुद्ध नहीं होता। अशुद्ध न होने के अपने वैज्ञानिक कारण भी हैं, मगर आस्था यही है कि वह पावन है और इसी कारण यज्ञादि अनुष्ठान करने से पहले उस स्थान को गंगा का जल छिड़क कर शुद्ध किया जाता है। ऐसा नहीं कि केवल हिंदू धर्म में ही पवित्र नदियों या सरोवरों, यथा गंगा व तीर्थराज पुष्कर सरोवर के जल को शुद्ध माना जाता है, इस्लाम को मानने वालों में आब-ए-जमजम की बड़ी महिमा है। वे उस जल को ठीक उसी प्रकार उपयोग में लाते हैं, जैसे हिंदू गंगा जल को। विश्व प्रसिद्ध दरगाह ख्वाजा साहब के उर्स में कुल की रस्म के दौरान एकत्रित जल का उपयोग व्याधियों के निवारण के लिए जायरीन अपने साथ ले जाते हैं।
फूंक अर्थात हवा में भी मंत्र की शक्ति का उपयोग किया जाता है। मेरे एक परिचित के ससुर, जो कि अलवर में रहते हैं, अजमेर आए थे। न जाने उनका किसी गलत जगह पैर पड़ गया और वे विक्षिप्त से हो गए। यहां डॉक्टरों को दिखा कर अलवर चले गए। दवाइयों से वे ठीक नहीं हुए। उन्होंने मुझ से जिक्र किया। मैने मेरे एक घनिष्ठ मित्र, जो कि खादिम समुदाय से थे व पीर भी थे, उनसे जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मेरी बीमार से मोबाइल पर बात करवाइये। भले ही वे बात करने की स्थिति में न हों, केवल मैं जो सुनाता हूं वह सुनें। हमने ऐसा ही किया। पीर साहब कुरान की कोई आयत बुदबुदा रहे थे और बार-बार मोबाइल के माइक में फूंक मार रहे थे। आश्चर्यजनक रूप से मेरे मित्र के ससुर बिलकुल ठीक हो गए। मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि क्या सैंकड़ों किलोमीटर दूर सिर्फ मोबाइल फोन पर अभिमंत्रित फूंक से भी कोई ठीक हो सकता है। मगर चूंकि प्रमाण सामने था, इसलिए मैने अपनी तर्क बुद्धि को शांत होने को कहा।
एक बात और। जिन्हें हम स्थूल समझते हैं, यथा धरती, जलाशय, पहाड़ी इत्यादि, वे भी किसी न किसी अर्थ में सजीव हैं और उन पर हमारे उच्चारण व विचार का असर पड़ता है। इतना ही नहीं, वह लंबे समय तक बना रहता है। वह असर आप तीर्थराज पुष्कर में अनुभव कर सकते हैं। वहां जाने पर एक अनोखी शांति महसूस होती है। वह इसलिए कि मान्यतानुसार सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्माजी ने यहीं यज्ञ किया था। इसके अतिरिक्त अनेकानेक ऋषि-मुनियों की भी यह साधना स्थली रही है। उनके उस तप का प्रभाव आज भी पुष्करारण्य में है।
यह आपके भी अनुभव में होगा कि कोई जगह हमें सुकून देती है तो कोई जगह मन को अशांत कर देती है। वह क्या है? वह उस स्थान में पहले हुए कृत्यों का प्रभाव है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिनमें किसी मकान में किसी समय हत्या या आत्म हत्या का कृत्य हुआ हो तो वहां रहने वालों को रात में मारकाट के सपने आया करते हैं।
लब्बोलुआब, इन सभी उदाहरणों के बाद मुझे नहीं लगता कि जल को अभिमंत्रित करने की पद्धति पर अविश्वास करने की गुंजाइश बचती है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

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