भाटी के इस्तीफे की बात से गरमाई सियासत

– हरीश बी. शर्मा
लॉयन न्यूज, बीकानेर। देवीसिंह भाटी एक बार फिर से नाराज हैं। नाराजगी का आलम यह है कि एक बार फिर उन्होंने पार्टी छोडऩे का फैसला कर लिया है। इस बार उनकी नाराजगी का कारण अर्जुन मेघवाल हैं। अर्जुन मेघवाल से भाटी की नाखुशी के कारण बहुत कम लोगों को पता है, राजनीति के गलियारों में ऐसी चर्चा है कि दोनों के बीच खिंचाव का कोई बड़ा कारण कभी नहीं रहा, एक छोटी सी घटना ने दोनों के बीच दूरियों को ऐसा बढ़ाया कि पिछले विधानसभा चुनाव तक भी दोनों के बीच सहज-संबंध नहीं बन पाए। दस साल पहले दोनों के बीच खिंचाव तब ही शुरू हो चुका था, जब अर्जुन मेघवाल ने पहला चुनाव लड़ा था।
हालांकि राजनीतिक गलियारों में इस खिंचाव को वसुंधराराजे से जोड़कर भी देखा जा रहा है। 25 की 25 सीटें भाजपा को देने वाली वसुंधराराजे की इस बार लोकसभा में भूमिका ज्यादा महत्व की नहीं रखी गई है। इस वजह से राजे-कैंप में आक्रोश है। यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अर्जुन मेघवाल पिछले कुछ सालों में राजे से दूर ही हुए हैं, भले ही उन्होंने केंद्र में कुछ नेताओं को करीबी बनाने में सफलता हासिल कर ली हों। अरुण चतुर्वेदी के बाद प्रदेशाध्यक्ष की दौड़ में अर्जुन मेघवाल के शामिल होने के बाद तो जैसे स्थितियां पूरी तरह से बदल गई थी। वरना कौन नहीं जानता कि अशोक गहलोत ने सबसे पहले अर्जुन मेघवाल में राजनीतिक-महत्वाकांक्षा देखी थी। वसुंधराराजे ने इसे समझा और तत्काल प्रयास करते हुए बीकानेर से टिकट दिलाने में पूरा जोर लगा दिया, लेकिन अब राजे और अर्जुन के बीच भी छत्तीस का आंकड़ा है।
ऐसे में राजस्थान में जिस तरह वसुंधरा राजे और नरेंद्र मोदी के बीच एक महा-मुकाबले का माहौल चल रहा है, वहां अर्जुन मेघवाल और देवीसिंह भाटी को दोनों तरफ का सेनापति भी कहा जाने लगा है। इन परिस्थितियों में राजनीतिक पंडित यह भी मान रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में राजे को महत्व नहीं दिए जाने का यह पहला ट्रेलर भर है, पिक्चर अभी बाकी है।
उल्लेखनीय है कि राजस्थान भाजपा ने अभी तक 25 में से किसी एक भी सीट पर फैसला नहीं किया है। वसुंधराराजे से राजस्थान के प्रभारी प्रकाश जावड़ेकर की बातचीत भी बेनतीजा रही है। ऐसे समय में देवीसिंह भाटी का यह कदम राजे को और मजबूत बना रहा है। कोई बड़ी बात नहीं है कि आने वाले दिनों में यह रंग और अधिक सुर्ख हो जाए।
whats app

Leave a Comment