गंगाशहर। आत्म शुद्धि का साधन ही सच्चा धर्म है। त्याग में धर्म है भोग में नहीं। लौकिक धर्म और अलौकिक धर्म अलग-अलग है। अरिहन्त मेरे देव है, जिनेश्वर देव द्वारा घोषित धर्म मेरा आत्म धर्म है। यह विचार तेरापंथ भवन में आयोजित सम्यक्त्व दीक्षा कार्यशाला में मुनिश्री सुमतिकुमार जी ने कही। उन्होंने कहा कि जो सत्य जैसा है उसे वैसा समझना चाहिए। यथार्थ रूप में समझना सम्यक्त्व है। जब तक मोह तत्व का ज्ञान नहीं होता, मन का भ्रम मिटता नहीं है। भ्रम मिटने से सम्यक ज्ञान होता है। इस अवसर पर मुनिश्री सुमतिकुमार जी ने सैंकड़ों श्रावक-श्राविकाओं को सम्यक्त्व दीक्षा का संकल्प करवाया।
कार्यक्रम के दौरान मुनिश्री आदित्यकुमार जी ने कहा कि जो सही है, सत्य है उसे जानना ही सम्यक्त्व है। जो झूठ है उसे मानना मिथ्यात्व है। जब तक हमें सत्य का बोध नहीं होगा सही राह पर कैसे कदम रखेंगे। जब तक सही राह पर कदम नहीं बढें़गे मंजिल कैसे मिल पाएगी। मुनिश्री देवार्यकुमार जी ने आचार्य महाप्रज्ञ जन्म शताब्दी समारोहके संदर्भ में महाप्रज्ञ जी के बाल्य काल का विवेचन प्रस्तुत किया। श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, तेरापंथ महिला मण्डल, तेरापंथ युवक परिषद द्वारा संयुक्त रूप से कार्यक्रम का आयोजन किया गया। सभा मंत्री अमरचन्द सोनी ने बताया कि जैन दर्शन प्रतियोगिता प्रथम रेखा चोरडि़या, द्वितीय बिन्दु छाजेड़ और तृतीय स्थान पर सुशीला ललवाणी को सभा अध्यक्ष डॉ. पूनमचन्द तातेड़ व तेयुप अध्यक्ष पवन छाजेड़ ने मोमेन्टों देकर सम्मानित किया।
अमरचन्द सोनी
मंत्री