छछुंदर के सिर पर चमेली का तेल

लोकजीवन की सबसे बड़ी ताकत उसकी कहावतें हैं। बिना भाषण दिए, बिना तर्कों का बोझ लादे, वे पूरी बात कह जाती हैं। ऐसी ही एक तीखी, व्यंग्य से भरी कहावत है “छछुंदर के सिर पर चमेली का तेल।” यह कहावत जितनी साधारण दिखती है, उतनी ही गहरी सामाजिक टिप्पणी अपने भीतर समेटे हुए है।
छछुंदर लोकमानस में बदबू, अराजकता और असभ्यता का प्रतीक है। वह न सौंदर्य को समझता है, न सुगंध का मोल जानता है। दूसरी ओर चमेली का तेल भारतीय संस्कृति में कोमलता, शृंगार और सौंदर्य का प्रतीक रहा है। जब लोकबुद्धि ने इन दोनों को एक ही वाक्य में पिरो दिया, तो व्यंग्य अपने चरम पर पहुँच गया। कहावत मानो पूछती है, जिसे गंध और सौंदर्य की पहचान ही नहीं, उसके सिर पर इत्र मलने का क्या अर्थ?
यह कहावत केवल किसी व्यक्ति पर टिप्पणी नहीं करती, बल्कि पूरे सामाजिक व्यवहार पर प्रश्नचिह्न लगाती है। अयोग्य हाथों में अधिकार सौंप देना, समझ से परे लोगों पर संसाधन लुटा देना, और जहाँ कद्र नहीं वहाँ सम्मान उड़ेल देना। इन सब स्थितियों के लिए यह कहावत सटीक बैठती है। समाज अक्सर ऐसी मूर्खताओं पर खुलकर बहस नहीं करता, बल्कि एक वाक्य में सब कह देता है, यह तो छछुंदर के सिर पर चमेली का तेल है।
आज के समय में यह कहावत और भी प्रासंगिक हो गई है। जब पद योग्यता से नहीं, सिफारिश से मिलते हैं। जब ज्ञान का मूल्य समझ से नहीं, दिखावे से आँका जाता है, और जब संस्कृति को केवल सजावट बना दिया जाता है, तब चमेली का तेल खूब बहता है, पर बदबू जस की तस रहती है। वस्तुतः लोक कहावतें हमें आईना दिखाती हैं। वे बताती हैं कि हर चीज हर जगह शोभा नहीं देती। सम्मान, साधन और सौंदर्य, तीनों तभी सार्थक हैं, जब उन्हें ग्रहण करने वाला उसके योग्य हो। अन्यथा समाज को बस इतना ही कहना पड़ता है, इतनी मेहनत, इतना खर्च, और नतीजा? छछुंदर के सिर पर चमेली का तेल।

 

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