
कई सालों से दशहरे के दिन विशालकाय रावण, मेघनाथ एवं कुंभकर्ण के पुतलों को जलाते हैं | इन पुतलों को जलाते वक्त कुछ पलों के लिये हमारे मन के अंदर भगवान राम के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाकर सभी प्रकार दुष्कर्मों एवं तामसी प्रव्रत्तियों यानि काम,क्रोध,लोभ,मद,मोह,मत्सर,अहंकार,आलस्य,हिंसा एवं चोरी को त्यागने का विचार आता है,किन्तु हमारा यह विचार श्मशानी वैराग्य की तरह ही क्षणिक होता है क्योंकि कुछ ही समय बाद हम सभी अपने सांसारिकता के प्रपंचों में तल्लीन हो कर तामसी प्रव्रतियों के चंगुल में फंस जाते हैं | काश ! अगर हम हम इस सात्विक सोच को अमली जामा पहना पाते तो हमारा जीवन एक अलग ही किस्म का बन जाता यानि हमारे समाज में झूठ, फरेब ,धोखाधडी, लूटकचोट ,चोरी-चकारी, हिंसा, मारकूट, अपहरण-बलात्कार की भयावह घटनायें घटित ही नहीं होती |