क्या केवल बाबा राम रहीम ही जिम्मेदार है?

तेजवानी गिरधर

तेजवानी गिरधर

अपनी ही शिष्या साध्वी के साथ बलात्कार करने के मामले में दोषी ठहराये जाने के बाद हुई हिंसा, आगजनी, तोडफ़ोड़ को लेकर कोर्ट तो सख्त है ही, पूरा मीडिया भी बाबा राम रहीम की जम कर मजम्मत कर रहा है। यह स्वाभाविक भी है। धर्म व आस्था की आड़ में यौन शोषण कोई निराधम प्राणी ही कर सकता है, जिसकी जितनी निंदा की जाए कम है। इस घटना के कारण एक ओर जहां इसी किस्म के बाबाओं को लानत दी जा रही है, वहीं देश की राजनीति, धर्म और हमारी सामाजिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
सबसे पहले बात राजनीति की। इस घटना के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में कहा कि आस्था के नाम पर हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसी पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यह बात ठीक है कि प्रधानमंत्री को ऐसा ही वक्तव्य देना चाहिए, मगर आस्था के नाम पर राजनीति के सहारे पनपने वाले व बाद में राजनीतिज्ञों को ही सहारा देने वाले ऐसे मठ व डेरे क्यों बर्दाश्त किए जा रहे हैं? क्या ये सही नहीं है कि वोटों की खातिर ऐसे बाबाओं को पनपाने में राजनीतिज्ञों का ही हाथ है? बाबा राम रहीम के मामले में तो जानते बूझते हुए भी राजनीतिक संरक्षण दिया जाता रहा। यह हरियाणा सरकार की की नरमी का ही नतीजा रहा कि राम रहीम के समर्थकों को सिरसा, पंचकूला और अन्य शहरों में एकत्रित होने से रोकने के लिए उपयुक्त कदम नहीं उठा सकी। इसके दुष्परिणाम सबके सामने हैं। यदि हम बाबाओं के प्रति अंध भक्ति रखने वालों को दोषी ठहराते हैं तो बाबाओं के मंचों पर जा कर उनकी ब्रांडिंग करने वाले राजनीतिज्ञों को निर्दोष कैसे मान सकते हैं? सच तो ये है कि बाबाओं का सहारा लेने और उन्हें संरक्षण देने के मामले में भाजपा ही सबसे आगे नजर आती है। डेरा समर्थकों की राजनीति में इतना अहमियत उनके वोट के कारण है, जो हार जीत तय कराती है। सिरसा के अलावा हरियाणा के कई जिलों में डेरा का प्रभाव है, जिसका फायदा 2014 के चुनाव में बीजेपी को कई सीटों पर मिला और जीत हासिल हुई। जीत हासिल होने के बाद गुरमीत रामरहीम को धन्यवाद अदा करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव के साथ बीजेपी के उम्मीदवार सिरसा गए थे। जब सत्ताधारी पार्टी के विधायक और मंत्री किसी संत के आगे माथा टेकता है तो अधिकारियों को क्या सन्देश जाएगा?
वहीं मीडिया जो, आज चिल्ला चिल्ला कर बाबाओं का पोस्टमार्टम कर रहा है, क्या उनका ऐसे बाबाओं को स्थापित करने में मीडिया की भूमिका नहीं है? सोशल मीडिया पर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की जम कर आलोचना हो रही है। एक बानगी देखिए:-
आज हर न्यूज़ चैनल पर दिखाया जा रहा है- बाबा की अय्याशी का अड्डा, गुफा का रहस्य, दत्तक पुत्री का सच इत्यादि। ऐसी कितनी ही कहानियां और गुफा के आभासी वीडियो, जिन्हें दिखा कर लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। प्रश्न उठता है कि इतने खोजी मीडिया चैनल अब तक कहां थे? न तो बाबा नया है न ही गुफा रातों-रात बन गई है, फिर ये कैसी पत्रकारिता? जो अब तक सो रही थी, अब बाबा के जेल जाते ही मुखरित होने लगी। इन अवसरवादी चैनलों पर भी जानबूझकर जुर्म छिपाने का आरोप लगना चाहिए।
सोशल मीडिया, जो कि पूरी तरह से स्वच्छंद है, उस पर तो बाबाओं के चक्कर में पडऩे वाली महिलाओं पर भी तंज कसे जा रहे हैं-
बाबा राम रहीम को गालियां दे लो या आशाराम को। उन मूर्ख महिलाओं को भी कुछ बोलो, जो अपने सास, ससुर, घर-परिवार की सेवा को छोड़ कर बाबाओं के चरण दबाती हैं। उन महिलाओं का क्या जो, पति परेमश्वर को छोड़ कर बाबाओं को पूजती हैं, माता-पिता समान सास-ससुर का प्रताडि़त करती हैं? सच तो ये है कि इन बाबाओं की सेवा में लगी महिलाएं अगर दस प्रतिशत भी अपने परिवार की सेवा में मन लगा लें तो उनका जीवन धन्य हो जाए।
बाबाओं के प्रति अंध भक्ति रखने वालों की मूर्खता की भी खूब मजम्मत हो रही है। देखिए- अंधभक्त श्रद्धा से सुनते हैं, वे सोचते नहीं हैं। बाबा जी दौलत के ढ़ेर पर बैठ कर बोलते हैं कि मोह-माया छोड़ दो, लेकिन उत्तराधिकारी अपने बेटे को ही बनायेंगे। भक्तों को लगता है कि उनके सारे मसले बाबा जी हल करते हैं, लेकिन जब बाबा जी मसलों में फंसते हैं, तब बाबा जी बड़े वकीलों की मदद लेते हैं, अंधभक्त बाबा जी के लिये दुखी होते हैं, लेकिन सोचते नहीं हैं। भक्त बीमार होते हैं, डॉक्टर से दवा लेते हैं, मगर बाबाओं के आगे भी सिर झुकाते हैं, जब ठीक हो जाते हैं तो कहते हैं, बाबा जी ने बचा लिया, जबकि बाबा जी बीमार होते हैं तो बड़े डॉक्टरों से महंगे अस्पतालों में इलाज करवाते हैं। अंधभक्त अपने बाबा को भगवान समझते हैं, उनके चमत्कारों की सौ-सौ कहानियां सुनाते हैं, लेकिन जब बाबा किसी अपराध में जेल जाते हैं, तब वे कोई चमत्कार नहीं दिखाते।
एक के बाद एक बाबा के जेल जाने के बाद कुल जमा बात ये सामने आती है कि वे बाबा भले ही सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, मगर हमारी अंध श्रद्धा और राजनीतिक व्यवस्था भी उतनी ही दोषी है। इस पर गंभीर चिंतन की जरूरत है।

-तेजवानी गिरधर
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