म.द.स. वि.वि. मेें मनाया अंतर्राष्ट्रीय मरूस्थलीकरण व सूखा रोक दिवस

IMG_3203अजमेर। म.द.स.वि.वि. के पर्यावरण विज्ञान विभाग में मरूस्थलीकरण व सूखा समाधान हेतु अंतर्राष्ट्रीय मरूस्थलीकरण रोक दिवस मनाया गया।
कार्यक्रम की शुरूआत मां सरस्वती के माल्र्यापण, दीप प्रज्वल्लन व विष्वविद्यालय कुलगीत के साथ हुई। कार्यक्रम में जोधपुर के डाॅ. सुरेष कुमार, पूर्व मुख्य वैज्ञानिक एवं पूर्व विभागाध्यक्ष (ब्र्।त्प्) बतौर मुख्य अतिथि पधारे तथा पूर्व कुलपति प्रो. सतीष अग्रवाल जी ने अध्यक्षता की। प्रो. के.सी. शर्मा बतौर विषिष्ठ अतिथि शरीक हुए।
विभागाध्यक्ष प्रो. प्रवीण माथुर ने मरूस्थलीकरण का मुख्य कारण मानवीय गतिविधियां बताया। इसमें मुख्यतः गलत सिंचाई पद्धति, घटते वन, अतिचारण, राजनैतिक अस्थिरता व गरीबी शामिल है। विष्व में करीब 250 मिलियन लोग सीधे तौर पर मरूस्थलीकरण से प्रभावित हैं। इस दिवस का मुख्य उद्देष्य आम जन में ‘उपजाऊ व दूसरी भूमि का मरूस्थल में बदलना‘ के बारे में जागरूक करना है। ताकि इसे समय रहते रोका जा सके। इस वर्ष में मरूस्थलीकरण एवं सूखा रोक दिवस की विषय वस्तु है- ‘‘हमारी जमीन, हमारा घर, हमारा भविष्य‘‘ उन्होंने भारतीय मरूस्थल का जिक्र करते हुए कहा कि ये जैव विविधता के भंडार हैं इन्हें हमें संजोकर रखना चाहिए। राजस्थान की दृष्टि से मरूस्थल का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, ना केवल जीवों का बल्कि राज्य की काफी आबादी मरूस्थलों व इसके आसपास के वातावरण से जीवन यापन करती है। अतः हमें इन्हें बचाने की आवष्यकता है व साथ में दूसरी भूमि मरूस्थल में तब्दील ना हो पर विषेष गौर करना है ताकि हम अनाज की भरपूर पैदावार कर सकें।
प्रो. के.सी. शर्मा ने राजस्थान के संदर्भ में मरूस्थलीकरण के बारे में जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये अत्यंत महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र है। उन्होंने मरूस्थलीय भूमि को प्रत्येक दृष्टि से महत्वपूर्ण खजाना बताया। यह विषेष प्रकार के पेड़ पौधों व जीवों का घर है जो पारिस्थितिकी तंत्र की महत्वपूर्ण कड़ी है। मरूस्थल वातावरण को संतुलित रखते हैं तथा सौर ऊर्जा के लिए अहम् है। अतः इस महत्वपूर्ण प्राकृतिक खजाने को बचाना अति आवष्यक है।
डाॅ. सुरेष कुमार, पूर्व मुख्य वैज्ञानिक एवं पूर्व विभागाध्यक्ष (ब्र्।त्प्) ने कहा कि मरूस्थल अति महत्वपूर्ण हैं। विष्व के कई महाद्वीपों में जैसे अफ्रीका, अमरीका और एषिया में मरूस्थल बढ़ते जा रहे हैं, जो एक चिन्ता का विषय हैं। इनकी वजह से उपज में लगातार कमी होती जा रही है जिससे दूसरी समस्याएं भी जन्म ले रही है। उन्होंने अपने सम्बोधन में भारतीय मरूस्थल को केन्द्रित करते हुए वहां होने वाले मरूस्थलीकरण के कारक और उनके प्रभावों का विस्तृत विवेचन किया। लगभग दो तिहाई हिस्से में वायु अपरदन की समस्या को रेखांकित करते हुए बताया कि इससे ना केवल मृदा का उपजाऊपन नष्ट होता है बल्कि ये धूल भरी हवाएं लम्बी दूरी तक जाती हैं जो दूरदराज के क्षेत्रों में लोगों के स्वास्थ्य व जनजीवन पर विपरीत असर डालती है। मरूस्थलीकरण को रोकने के लिए मरू क्षेत्रों में पेड़ों की पंक्तियां और घास के मैदान खासतौर से गोचर और औरण के बचाव एवं वनस्पति पुर्नस्थापन पर विषेष बल देना चाहिए ताकि मरूक्षेत्रिय जनजीवन की आजीविका स्थानीय क्षेत्र से पूरी हो सके और उनका पलायन रूक सके जो कि इस वर्ष के अंतर्राष्ट्रीय मरूस्थलीकरण व सूखा रोक दिवस का मुख्य उद्देष्य भी है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुलसचिव प्रो. सतीष अग्रवाल जी ने बढ़ते मरूस्थलीकरण से किसानों की दुर्दषा पर चर्चा की और कहा कि हमें प्रकृति को बचाना होगा क्योंकि प्रकृति ही हमारा पालन पोषण करती है। हमें पर्यावरण असंतुलन, तापमान अनिष्चितता आदि के कारण व समाधान करने होंगे ताकि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित कर सकें। यदि मानवीय विकास इस प्रकार अंधाधुंध चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब इसमें भयंकर परिणाम मानवजाति को भुगतने पड़ेंगे।
कार्यक्रम में डाॅ. विजय मीणा, डाॅ. अष्विनी कुमार, डाॅ. रूचिरा भारद्वाज, संगीता, फिरोज खान, शुभ्रा सिंह, नरेष चैधरी, प्रतिमा यादव, पारूल व सभी छात्र उपस्थित थे।
अंत में डाॅ. रूचिरा भारद्वाज ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित किया।

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