रियल सिंघम है कुंवर राष्ट्रदीप अजमेर के पुलिस अधीक्षक

*एस.पी.अजमेर की समझदारी व सूझबूझ से टला गंभीर विवादित मामला*

दोस्तों कल हमारे अजमेर के पुलिस अधीक्षक कुंवर राष्ट्रदीप व नगर निगम के महापौर सहित कांग्रेस व बीजेपी के पार्षदों में जोरदार विवाद की स्थिति पैदा हो गई थी।शहर के पत्रकार नवीन वैष्णव द्वारा किये गए कवरेज का वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है।दोनों ही पक्ष अपनी अपनी मर्यादाओं में रहते हुए ड्यूटी का पालन कर रहे थे।एक और एसपी.कोरोना के चलते धारा 144 लागू होने की दुहाई दे रहे थे।दूसरी और महापौर धर्मेंद्र गहलौत के नेतृत्व में इकठ्ठा हुए पार्षद प्रजातांत्रिक प्रणाली को अपनाते हुए प्रशासन के खिलाफ गुस्सा निकाल रहे थे।
पार्षदों के गुस्से का कारण जायज था।उन लोगों के गुस्से के पीछे उनकी प्रशासन से नाराजगी थी।नाराजगी का जो कारण सामने निकलकर आया है वो कारण मेरी नजर में बिल्कुल जायज है।कारण यह था कि शहर में लॉक डाउन के बाद से ही जिन लोगों को किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल रहा था उन्हें जिला प्रशासन की और से अक्षय पात्र फाउंडेशन योजना के माध्यम से खाने के पैकेट बांटे जा रहे थे जिनकी संख्या छ हजार पांच सौ थी।इस योजना की क्रियान्विति में निगम व पार्षदों का महत्वपूर्ण रोल था।निगम के पार्षद स्वयं ऐसे गरीब मजदूरों,दिहाड़ी श्रमिको को भोजन उपलब्ध करवाकर सामाजिक सरोकारिता की भावना को साकार कर रहे थे।इतनी अच्छी योजना को बिना किसी उचित आधार व कारण के जिला कलेक्टर विश्वमोहन शर्मा ने गुरुवार शाम को बन्द करते हुए रोक लगा दी।निगम के महापौर धर्मेंद्र गहलोत ने जिला कलेक्टर से संपर्क कर कारण जानना चाहा तो वो भी नहीं बताया।
जाहिर बात है।निगम महापौर सहित कांग्रेस व बीजेपी के पार्षदों का रोष फुट पड़ा और वो सारे के सारे 55 पार्षद जिला प्रशासन खास तौर पर जिला कलेक्टर विश्वमोहन शर्मा के खिलाफ रोष जताने के लिए एकत्रित हो गए।जैसे ही इसकी जानकारी पुलिस अधीक्षक कुंवर राष्ट्रदीप को लगी वो चेम्बर से निकलकर बाहर आ गए और महापौर व चेयरमैन को समझाने लगे कि धारा 144 लगी हुई है आप लोग समझदार हो आपका कोई विरोध है तो 2-4 व्यक्ति आकर रख सकते थे।पार्षद जो की जिला कलेक्टर की कार्यशैली से तपे हुए तो थे,ही उन्होंने राष्ट्रदीप जी की बात समझने की बजाय विरोध करना प्रारंभ कर दिया।
ये बात कुंवर राष्ट्रदीप को अखर गई।उन्होंने स्पष्ट कहा कि मेरा काम कानून की पालना करवाना है,मैं किसी भी सूरत में इस मामले में राजनीति नहीं करने दूंगा।आप लोग समझदार हो अगर नहीं मानेंगे तो मुझे कानून की पालना करवाना आता है।पार्षद भी तैश में थे ही उन्होंने भी कह दिया कि कर लो गिरफ्तार।इस पर एस.पी.ने एक्शन लेते हुए 55 ही पार्षदों को गिरफ्तार करने के आदेश दिए और सिविल लाइंस थाने ले गए जहां पर शहर के विधायक अनिता भदेल व वासुदेव देवनानी भी पहुंच गए।यहां से शुरू होती है रियल

सिंघम की वास्तविक कहानी।
*पहुंचने के बाद एस.पी.ने अपने गुस्से को कंट्रोल में रखते हुए वास्तविक समस्या को निपटाने की दिशा में प्रयास किया।अपने गुस्से को ताक में रखकर एक ऐसा निर्णय करवाया जिससे सांप भी मर गया लाठी भी नहीं टूटी*। *यहां तक कि पार्षदों को संतुष्ट और खुश करने के लिए उन्होंने उनको हाथ जोड़कर समझा कर और खुश करके भेजा।अपने साथी अधिकारी की गलती को भी उन्होंने बड़ी ही सूझबूझ से दूर कर दिया तथा सभी पार्षदों ने अपने फंड से एक एक लाख रुपये देकर योजना को चालू करवाने की सहमति होने पर बिना कोई कार्यवाही किये छोड़ दिया*।

*मेरी नजर में इसे कहते हैं रियल सिंघम*
जहां जरूरत पड़ी वहां अपना रुतबा दिखाया,जहां जरूरत पड़ी एक परिवार के मुखिया का रोल अदा करते हुए समझा बुझाकर मामला शांत कर शहर का सौहार्द व शांति कायम की।उन गरीबों को उनका हक दिलवाया जो तुगलकी फरमानों से अपने हक से वंचित हो रहे थे।ये होती है अच्छे और बेस्ट ऑफिसर की क्वालिटी।जो समय और परिस्थितियों को देखते हुए अपने कॉमन सेंस से आमजन के हितों के लिए बेस्ट निर्णय ले।इनकी जगह कोई जबरदस्ती का ईगो रखने वाला और आड़ू अफसर होता तो मुकदमा दर्ज करके पूरे शहर को विरोध में कर देता न समस्या का हल निकलता ना कानून की पालना हो पाती।बहुत बहुत धन्यवाद आपका।आज आपने एक बार फिर जिले की शांति व सौहार्द को कायम रखने की अपनी प्राथमिकता का उदहारण पेश किया है।सबके आत्म सम्मान की रक्षा की है आपने।जय हिंद…
डॉ.मनोज आहूजा एडवोकेट एवं पत्रकार।9413300227…

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