विज्ञान मंगल और चाँद पर जीवन की संभावनाएँ तलाश रहा है और हमारे देश के परंपरा समर्थक लोग अभी तक महिलाओं के ड्रेस कोड में उलझे हुए हैं. बात पिछले हफ्ते की है जब मंदिरा बेदी अपने पति राज कौशल के देहांत के बाद अपने पति की अर्थी को उठाए तथा अंतिम संस्कार के अन्य कर्मों को करती हुई नज़र आईं थीं. इस दौरान उन्होंने जींस और एक सामान्य सा टॉप पहन रखा था जो कुछ परम्परावादी लोगों को खल गई और उन्होंने इस बात के लिए मंदिरा बेदी को ट्रोल कर दिया. बात अगर संस्कृति और आध्यात्म की हीं की जाए तो निश्चय हीं आध्यात्म भी यह नहीं कहता कि – इस कोरोना काल में एक दूसरे से अलग थलग पड़े एक ऐसे परिवार जहाँ परिवार के मुखिया के असामयिक शरीरांत के बाद उसका अंतिम संस्कार करने के लिए कोई पुरुष नातेदार मौजूद नहीं हो, उस अकेली महिला के पास सफेद साड़ी लाने और उसे पहन कर अपने पति के अंतिम संस्कार की तैयारी करने की अगर योग्यता नहीं है तो उसे हिंदुस्तान के इस तथाकथित सभ्य समाज में रहने का कोई हक नहीं. बहुत सामान्य सी बात है कि इस प्रकार के दुखद और ह्रदय विदारक स्थिति से गुज़रती एक परेशानहाल औरत के पास क्या कपड़ों के लिए सोचने का वक्त होना चाहिए ? नैतिकता पर बड़ी बड़ी डींगे मारने वाले इस समाज में अकेली पड़ जाने वाली स्त्रियों के लिए जीवन दुश्वारियों का दूसरा नाम हो जाता है. यहाँ लोग मदद की बजाय उंगलियाँ उठाना शुरू कर देते हैं. एक और निर्मम सच ये भी है कि इनमें अधिकतर उंगलियां अपनों की हीं होती है. और मजे की बात तो यह है कि स्त्रियों के ऐसे किसी भी आचरण की निंदा करने वाली अधिकतर स्त्रियाँ हीं होतीं हैं. दूसरी स्त्री पर उंगली उठाने वाली इन स्त्रियों का अपना खुद का जीवन चाहे जैसा भी हो पर मुसीबत में घिरी अन्य स्त्री को देखते हीं इनके अंदर की महान औरत जाग उठती है और इनका विषवमन शुरू हो जाता है. जबकि इन अकेली हो चुकी स्त्रियों को निंदा और तिरस्कार की दृष्टि से देखने वालों में वही पुरूष होते हैं जो स्त्रियों के हाथ का बना भोजन खाकर उन्हीं को गलियाते हैं.
यह सत्य है कि हिन्दू परंपरा में महिलाओं का इस संस्कार में हिस्सा लेना वर्जित है. इसके पीछे वजह महिलाओं के मन का कोमल होना माना जाता है. कारण चाहे जो भी हो पर परिवार में पुरुष सदस्य के न होने पर तथा नातेदार पुरुष सदस्यों का सहयोग न मिलने पर एक नारी को क्या करना चाहिए ? इस तरह की स्थिति का समाधान वेदों में अथवा कहीं अन्यत्र भी नहीं मिलता.
सच तो ये है कि हिन्दू परम्पराओं का परिदृश्य अब बदल रहा है. और इन बदलते परिदृश्यों को अब स्वीकारोक्ति, सहयोग की दृष्टि और प्रोत्साहन मिलना चाहिए न कि परम्पराओं के उल्लंघन के नाम पर निंदा, तिरस्कार, आपत्ति या खिल्ली उड़ाना.
दुःख, संताप और विपत्ति की घड़ी में जहाँ जानवर भी मूक संवेदना में व्यथित दिखाई देते हैं, वहीं अकेली स्त्री के लिए परम्पराओं के या अन्य किसी आड़ में सामाजिक विरोध जैसा नृशंस आचरण अत्यंत क्षोभणीय है.
– कंचन पाठक.
ग्रेटर कैलाश .
नई दिल्ली.
परिचय –
नाम – कंचन पाठक
जन्म – 11 फ़रवरी
शिक्षा – कानून, प्राणिविज्ञान और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से स्नातकोत्तर
प्रकाशन – सरिता, कादम्बिनी, अहा ज़िन्दगी, सरस सलिल, कथाक्रम, राजभाषा भारती (गृहमंत्रालय की पत्रिका), समाज कल्याण (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय), मधुमती (राजस्थान साहित्य अकादमी), अट्टहास, स्पंदन, रूपायन आदि पत्रिकाओं में कविताएँ, आलेख, व्यंग्य समेत दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान टाइम्स, अमर उजाला, हमारा मेट्रो, डेल्ही टाइम्स, दैनिक भास्कर, जनसंदेश (मध्यप्रदेश) आदि सौ से अधिक पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित .. विभिन्न वेब पत्रिकाओं और ब्लॉग में लेखन
पुस्तक – इक कली थी (एकल), सिर्फ़ तुम, पुष्पगंधा, काव्यशाला, कविता अनवरत (संयुक्त) इत्यादि
संपादन – कस्तूरी कंचन, आगमन आदि
सम्मान – ठाकुर प्रसाद सिंह स्मृति सम्मान (लखनऊ), आरसी प्रसाद सिंह सम्मान (बिहार), आगमन साहित्य, तेजस्विनी (दिल्ली), मिथिला महोत्सव सम्मान (बिहार), हिजला मेला महोत्सव सम्मान (झारखण्ड) इत्यादि
संपर्क –
कंचन पाठक
द्वारा विनोद कुमार
जॉइंट कमिश्नर कमर्शियल टैक्सेज,
कमर्शियल टैक्सेज ऑफिस
मधुबनी सर्किल
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