*इंकार और स्वीकार के फेर में भाई-बहन*

*राहुल का लीडर ऑफ अपोजिशन बनने से मना करना और प्रियंका का वायनाड़ से चुनाव लड़ने की हां करने के मायने*

ओम माथुर
*कांग्रेस एक बार फिर मौका चूक रही है। राहुल गांधी के लोकसभा में विपक्ष का नेता बनने से लगभग इंकार करने और प्रियंका गांधी के वायनाड़ से चुनाव लड़ने की मंजूरी,दो ऐसे कारण हैं,जिनसे कांग्रेस फिर कटघरे में खड़ी हो जाएगी। उन दो आरोपों के कटघरे में,जिनमें भाजपा उसे हमेशा खड़ा करती रही है। भाजपा आरोप लगाती रही है कि राहुल गांधी गंभीर नेता नहीं है और पार्ट टाइम राजनीति करते हैं। ऐसे में लीडर आफ अपोजिशन पद बड़ा अवसर है, जब वह भाजपा को जवाब दे सकते हैं कि वह गंभीर, परिपक्व और फुलटाइम पोलटिशयन बन गए हैं। लोकसभा में नेता विपक्ष का पद कैबिनेट मंत्री के बराबर होता है और उसे वह सब सुविधा मिलती है, जो कैबिनेट मंत्री को मिलती है। लेकिन नेता विपक्ष को विषयों का गहन अध्ययन और सदन में बोलने की काफी तैयारी करनी पड़ती है। यह चुनाव सभाओं की तरह नहीं है कि आरोप लगाया और बात खत्म। लोकसभा में तथ्यों और तर्कों के साथ अपनी बात रखनी पड़ती है। तो,क्या पांचवीं बार सांसद बनने के बाद भी राहुल गांधी अभी इतनी मेहनत करने के लिए तैयार नहीं है या इसका कोई और कारण है?*
*माना ये भी जा रहा है कि इस लोकसभा चुनाव में जिस तरह कांग्रेस को संजीवनी मिली है,उसे देखते हुए राहुल गांधी उत्तर प्रदेश सहित हिंदी पट्टी के राज्यों में कांग्रेस को मजबूत करने के लिए प्रयास करना चाहते हैं। लेकिन क्या इतना आसान है ? उत्तर प्रदेश में उसे 6 लोकसभा सीटें मिली है। जबकि 403 में से उसका सिर्फ 2 विधायक है। निचले स्तर पर कांग्रेस का संगठन पूरी तरह खत्म हो चुका है। फिर उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन फैलाने के लिए उसे भाजपा के साथ उस समाजवादी पार्टी का मुकाबला भी करना पड़ेगा, जो अभी इंडिया गठबंधन में शामिल है। सपा कभी नहीं चाहेगी कि उसके आधार पर कांग्रेस का कब्जा हो। ऐसे में वहां गठबंधन के गड़बडा़ने का संकट रहेगा, क्योंकि अखिलेश यादव की पहली प्राथमिकता उत्तर प्रदेश में अगली बार सत्ता में वापस आना रहेगी, दिल्ली नहीं। बिहार में भी कांग्रेस की स्थिति यही हैं। वहां गठबंधन का सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल कभी नहीं चाहेगा कि कांग्रेस मजबूत हो। वहां तो अगले साल ही विधानसभा चुनाव होने हैं,जो तेजस्वी यादव की प्राथमिकता होंगे। ऐसे में अगर राहुल गांधी नेता विपक्ष बनाकर पहले संसद में खुद को और प्रभावशाली साबित करेंगे,तो देश भर में कांग्रेस के लिए सकारात्मक संदेश जाएगा, लेकिन अगर वो इंकार करते हैं,तो विपक्ष के आरोप में दम रहेगा कि वो जिम्मेदारी की राजनीति से बचना चाहते हैं।। लीडर आफ अपोजिशन का पद पिछले 10 साल से खाली पड़ा है,क्योंकि इसे पाने के लिए सबसे बड़े दल को लोकसभा की कुल सीटों का 10% प्राप्त करना होता है। यानी 54 सीटें। लेकिन कांग्रेस 2014 और 2019 में आंकड़ा नहीं पा सकी। लेकिन इस बार उसे ये पद आधिकारिक रूप से मिलेगा।*
*राहुल गांधी पिछले कुछ साल से विपक्षी नेता के तौर पर सरकार को लगातार घेरने का काम कर रहे हैं और कांग्रेस की ओर से इस लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने अकेले ये मोर्चा संभाला था। महंगाई,बेरोजगारी,आरक्षण समाप्त करने और उद्योगपतियों की सरकार जैसे उनके मुद्दों का असर ही रहा कि कांग्रेस पिछली बार से लगभग दोगुनी सीटें जीत कर आई। राहुल खुद रायबरेली और वायनाड दोनों जगह से चुनाव जीते। जबकि पिछली बार वह अमेठी में हार गए थे।*
*उधर, जिसके लिए प्रियंका और पूरे गांधी परिवार को इंकार करना चाहिए था,वह उसने सहर्ष स्वीकार कर लिया है। यह कि, राहुल गांधी के वायनाड सीट खाली करने पर वहां से प्रियंका गांधी को चुनाव लडेगी। इससे एक बार फिर कांग्रेस पर परिवारवाद का ठप्पा लग जाएगा। हालांकि परिवारवाद से अब कोई भी पार्टी मुक्त नहीं है, लेकिन कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक परिवारवाद का जितना लंबा सिलसिला है,वह किसी और पार्टी में नहीं है। इसलिए भाजपा तो कांग्रेस को प्राइवेट कंपनी भी कहने लगी है। कहने को ही सही,जब राहुल गांधी की तुलना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की जाती है,तो परिवारवाद के मुद्दे पर उनकी छवि निखर जाती है। जिस तरह अमेठी में रणनीति के तहत राहुल गांधी ने सीट छोड़कर वहां से एक साधारण कार्यकर्ता किशोरी लाल शर्मा को उतारा और उन्होंने भाजपा की बड़ी तोप मानी जाने वाली स्मृति ईरानी को पस्त कर दिया। वैसा ही प्रयोग वह वायनाड में भी कर सकती थी। वहां तो 50 प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम वोट है। वहां कांग्रेस का मुकाबला भाजपा से नहीं,वाम दलों से होता है। वहां कांग्रेस का कोई भी नेता चुनाव जीत सकता है। प्रियंका चुनाव लडने से इंकार करके खुद और पार्टी की छवि को मजबूत कर सकती थी। लेकिन लगता है लगातार 20 साल तक राजनीति में अपनी मां और भाई के लिए काम करने के बाद अब प्रियंका की रुचि भी संसद में जाने की दिखती है। वैसे कांग्रेस में उन्हें चुनावी राजनीति में उतरने की मांग लंबी से की जाती रही है। लेकिन शायद राहुल गांधी को राजनीति में पूरी तरह स्थापित करने के चक्कर में गांधी परिवार ने उन्हें हमेशा बैकग्राउंड में ही रखा। प्रियंका की भाषण देने की कला,भीड़ इकट्ठा करने,मुद्दों की समझ और उन्हें लोगों के सामने रखने में भी राहुल गांधी से कई आगे है। इसीलिए अब तक कांग्रेस की राजनीति में अपने भाई के पीछे ही रही।*

*■ ओम माथुर ■*
*9351415379*

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