अहिंसा है जीवन का सौन्दर्य एवं सृष्टि का आधार

अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस (2 अक्टूबर 2026) पर विशेषः

-स्वामी देवेंद्र ब्रह्मचारी-
आज दुनिया विज्ञान, तकनीक और आर्थिक प्रगति के जिस दौर में पहुंची है, उसी के समानांतर हिंसा, आतंकवाद, युद्ध, तनाव, असहिष्णुता और प्रतिस्पर्धा की प्रवृत्तियां भी बढ़ी हैं। मनुष्य ने प्रकृति पर विजय पाने की कोशिश में स्वयं अपने भीतर अशांति पैदा कर ली है। राष्ट्रों के बीच अविश्वास है, समाजों में वैचारिक टकराव है, परिवारों में तनाव है और व्यक्तिगत जीवन में भी क्रोध, प्रतिशोध एवं प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ रहा है। ऐसे समय में अहिंसा केवल एक नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि संतुलित जीवन और शांतिपूर्ण विश्व-व्यवस्था की अनिवार्य आवश्यकता बन गई है। 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस इसी आवश्यकता की वैश्विक स्वीकृति है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2007 में 2 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस घोषित किया था। प्रस्ताव में अहिंसा की सार्वभौमिक प्रासंगिकता तथा शांति, सहिष्णुता, समझ और अहिंसा की संस्कृति को बढ़ावा देने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।
अहिंसा जीवन का सौंदर्य है। यह केवल किसी को शारीरिक चोट न पहुंचाने का नाम नहीं है। अहिंसा मन, वचन और कर्म की निर्मलता है। किसी के प्रति घृणा न रखना, अपमानजनक भाषा से बचना, विचारों में कटुता न पालना और अपने व्यवहार से दूसरे के मन को अनावश्यक पीड़ा न देना भी अहिंसा है। इसलिए अहिंसा संतुलित जीवन का आधार है। जहां हिंसा है वहां भय है, जहां भय है वहां तनाव है और जहां तनाव है वहां सुख एवं शांति का स्थायी निवास संभव नहीं। अहिंसा की सबसे व्यापक और सूक्ष्म व्याख्या जैन दर्शन में मिलती है। भगवान महावीर ने अहिंसा को जीवन का सर्वाेच्च धर्म बनाया। जैन दर्शन में अहिंसा केवल मनुष्य को मनुष्य से बचाने का सिद्धांत नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के अस्तित्व के सम्मान का दर्शन है। यही कारण है कि जैन साधु-साध्वियों का जीवन अहिंसा की प्रयोगशाला जैसा दिखाई देता है।
जैन साधु चलते हैं तो अत्यंत सावधानी से कदम रखते हैं। वे अपने आगे के स्थान को कोमल रजोहरण से साफ करते हैं, ताकि सूक्ष्म जीवों को भी अनावश्यक चोट न पहुंचे। श्वेतांबर परंपरा में मुखवस्त्रिका का प्रयोग भी सूक्ष्म जीवों के प्रति सावधानी की इसी भावना से जुड़ा है। जैन मुनियों के आचार में चलने, बोलने, वस्तु उठाने-रखने और भोजन ग्रहण करने तक में सजगता का विशेष महत्व है। यहां अहिंसा का अर्थ केवल बाहरी हिंसा से बचना नहीं, बल्कि सजग होकर जीना है। जैन आचार में रात्रि-भोजन से बचने, भोजन और जल को जीवों की रक्षा की दृष्टि से सावधानीपूर्वक ग्रहण करने जैसी परंपराएं भी इसी सूक्ष्म अहिंसक चेतना से जुड़ी हैं। जैन साधु का जीवन हमें एक बहुत बड़ा संदेश देता है-जिस जीवन में छोटी-से-छोटी हिंसा के प्रति भी संवेदना है, उसमें बड़ी हिंसा के लिए स्थान कैसे हो सकता है? यही अहिंसा का विराट दर्शन है।
भगवान महावीर की अहिंसा की विशेषता यह है कि वह केवल हाथ की हिंसा को नहीं रोकती, बल्कि वाणी और विचार की हिंसा को भी चुनौती देती है। कटु शब्द किसी व्यक्ति के शरीर को घायल नहीं करते, लेकिन उसके मन को गहरी चोट पहुंचा सकते हैं। इसलिए अहिंसा का वास्तविक विस्तार तभी होगा जब हम अपनी भाषा को भी करुणामय बनाएं। हमारा व्यवहार ऐसा हो कि हमारे संपर्क में आने वाला व्यक्ति अपने भीतर अपमान, भय या कड़वाहट महसूस न करे। आज सोशल मीडिया के दौर में यह शिक्षा और भी महत्वपूर्ण है। एक कठोर शब्द, एक अपमानजनक टिप्पणी या एक झूठी सूचना हजारों लोगों के मन में तनाव और घृणा पैदा कर सकती है। इसलिए डिजिटल युग में अहिंसक वाणी और अहिंसक संचार की जरूरत पहले से अधिक है।
यदि भगवान महावीर ने अहिंसा को आध्यात्मिक और जीवन-दर्शन के रूप में अत्यंत सूक्ष्मता प्रदान की, तो महात्मा गांधी ने उसे सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का प्रभावी साधन बनाया। गांधी ने सत्य और अहिंसा को स्वतंत्रता संघर्ष के केंद्र में रखा। नमक सत्याग्रह सहित उनके आंदोलनों ने यह दिखाया कि अन्याय का प्रतिरोध हिंसा के बिना भी किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र भी गांधी को अहिंसा के दर्शन और रणनीति के प्रमुख प्रवर्तकों में मानता है और उनके नेतृत्व को विश्वभर के अहिंसक आंदोलनों की प्रेरणा से जोड़ता है। गांधी की अहिंसा कायरता नहीं थी। वह अन्याय के सामने चुप रहने का नाम भी नहीं थी। वह सत्य के साथ खड़े होकर अन्याय का प्रतिरोध करने की शक्ति थी। गांधी के लिए साधन और साध्य का संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण था-शांतिपूर्ण समाज की स्थापना हिंसक साधनों से नहीं की जा सकती। संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेज भी गांधी के विचारों को इसी संदर्भ में प्रस्तुत करते हैं कि स्थायी परिवर्तन के लिए अहिंसक साधनों की आवश्यकता है।
आज युद्ध और आतंकवाद ने मानवता के सामने गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। राष्ट्रों के पास विनाश के पहले से अधिक शक्तिशाली साधन हैं। तकनीक ने युद्ध की क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया है। ऐसे समय में अहिंसा का अर्थ यह नहीं कि समाज अपनी सुरक्षा और न्याय की जिम्मेदारी छोड़ दे। आतंकवाद और हिंसा का सामना करते हुए राष्ट्रों को नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी ही होती है। लेकिन दीर्घकालीन शांति केवल शक्ति-संतुलन से नहीं, बल्कि संवाद, विश्वास, न्याय, सह-अस्तित्व और मानवीय संवेदना से निर्मित होती है। भारत की सभ्यता ने सदियों से वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वे भवन्तु सुखिनः, अनेकांत और सर्वधर्म सद्भाव जैसी अवधारणाओं के माध्यम से इसी व्यापक दृष्टि को पोषित किया है। ये विचार हमें बताते हैं कि दूसरे की दृष्टि को समझे बिना स्थायी शांति संभव नहीं। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी शांति और संवाद की आवश्यकता को लगातार रेखांकित किया है।
भारत के वर्तमान नेतृत्व ने भी विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति, संवाद, सह-अस्तित्व और मानव-केंद्रित विकास जैसे विचारों को सामने रखा है। लेकिन अहिंसा का वैश्विक संदेश केवल सरकारों या राजनेताओं का दायित्व नहीं है। इसकी शुरुआत व्यक्ति से होती है-परिवार से, विद्यालय से, समाज से और हमारी रोजमर्रा की भाषा एवं व्यवहार से। आज मनुष्य को बाहर की हिंसा से जितना खतरा है, उतना ही भीतर की हिंसा से भी है। क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार, लोभ और प्रतिशोध मनुष्य के भीतर निरंतर संघर्ष पैदा करते हैं। इसलिए अहिंसा का पहला प्रयोग अपने भीतर होना चाहिए। अपने क्रोध को करुणा में, प्रतिस्पर्धा को सहयोग में, प्रतिशोध को क्षमा में और असहमति को संवाद में बदलना ही आधुनिक अहिंसा है। परिवार में अहिंसा का अर्थ है-एक-दूसरे को समझना। समाज में अहिंसा का अर्थ है-विविधताओं का सम्मान करना। राजनीति में अहिंसा का अर्थ है-विचारों के संघर्ष को शत्रुता में न बदलना। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अहिंसा का अर्थ है-संवाद और कूटनीति के रास्ते खुले रखना। अहिंसा कमजोरी नहीं, संयमित शक्ति है। हिंसा तत्काल परिणाम दे सकती है, लेकिन स्थायी शांति का निर्माण नहीं कर सकती। संयुक्त राष्ट्र ने भी गांधी के संदर्भ में इस विचार को रेखांकित किया है कि हिंसा पर स्थायी निर्माण संभव नहीं है।
आज जब दुनिया हिंसा की बढ़ती प्रवृत्तियों से चिंतित है, तब भारत की धरती से एक बार फिर यह संदेश मुखर होना चाहिए-अहिंसा केवल भारत की विरासत नहीं, संपूर्ण मानवता का भविष्य है। महावीर की करुणा और गांधी के सत्याग्रह की रोशनी में यदि मनुष्य अपने विचार, वाणी और व्यवहार को बदल सके, तो युद्ध की मानसिकता के स्थान पर संवाद, घृणा के स्थान पर मैत्री और संघर्ष के स्थान पर सह-अस्तित्व की नई विश्व-संरचना संभव है। यही अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस की सार्थकता है और यही मानवता के शांत, संतुलित एवं सुंदर भविष्य की दिशा भी। अहिंसा के इस व्यापक संदेश को समाज के बीच जीवंत बनाने में महावीरायतन फाउंडेशन की भूमिका भी उल्लेखनीय है। महावीरायतन फाउंडेशन द्वारा अहिंसा, करुणा, शाकाहार, जीव-दया, पर्यावरण-संरक्षण, प्राणीमात्र के प्रति संवेदना तथा मानवीय मूल्यों को केंद्र में रखकर विभिन्न सामाजिक एवं रचनात्मक प्रवृत्तियां संचालित की जाती हैं और संगोष्ठियों, सेमिनारों एवं संवाद-कार्यक्रमों के माध्यम से भगवान महावीर के अहिंसा-दर्शन को समकालीन जीवन से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। मेरे गुरुदेव आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने भी अपने संपूर्ण जीवन से अहिंसक, संयमित और करुणामय जीवनशैली की प्रेरणा दी। आज आवश्यकता है कि महावीर की सूक्ष्म अहिंसा, गांधी के अहिंसा दर्शन और आचार्य विद्यासागर जी महाराज की जीवन-साधना से प्रेरणा लेकर अहिंसा को व्यक्तिगत आचरण से सामाजिक संस्कार और सामाजिक संस्कार से वैश्विक जीवन-दृष्टि बनाया जाए।
(प्रख्यात जैन संत देवेन्द्र ब्रह्मचारी महावीरायतन फाउण्डेशन के संस्थापक है)

प्रेषकः
( देवेन्द्र ब्रह्मचारी )
1 ए-9, विंग 501, सिद्धार्थ नगर, बिल्डिंग नं. 2 सीएचएस लि.
खाटू मिल लेन, बोरीवली-इस्ट, मुम्बई- 400066
मो. 9967296666

Leave a Comment

This site is protected by reCAPTCHA and the Google Privacy Policy and Terms of Service apply.

error: Content is protected !!