(10th October 1933 – 18th December 2011)
*स्वर्गीय श्री मिर्चूमल सोनी* का जन्म 10th October 1933 को मांझन्द, जिला दादू, सिंध प्रांत (ब्रिटिश भारत) में हुआ था। उन्होंने सिंधी फाइनल तक शिक्षा प्राप्त की तथा शास्त्रीय संगीत में विशारद की उपाधि हासिल की।पेशे से स्वर्णकार होने के साथ-साथ वे गीत-संगीत, नाटक, साहित्य एवं लेखन के क्षेत्र में भी विशेष प्रतिभा रखते थे। उन्होंने सिंधी साहित्य को समृद्ध करने में उल्लेखनीय योगदान दिया और कई पुस्तकें लिखीं। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘मुहिंजो मुल्क मलीर’, ‘रूह जा रोशनदान’ और ‘मोतीअं जो महिराण’ शामिल हैं।
साहित्य एवं संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान को विभिन्न सम्मानों से सराहा गया। राजस्थान सिंधी अकादमी ने उनकी पुस्तक ‘रूह जा रोशनदान’ के लिए उन्हें पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया। उनके कई कार्यक्रम आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर भी प्रसारित हुए।
उन्होंने भारत के विभिन्न शहरों के साथ-साथ विदेशों में भी अनेक मंचीय कार्यक्रम प्रस्तुत किए। विशेष रूप से हांगकांग में स्वर्गीय सेवकराम सोनी के साथ, गोरधन भारती के सान्निध्य में, उन्होंने सिंधी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेकर अपनी कला का परिचय दिया।
सिंधी समाज एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में योगदान
मिर्चूमल सोनी बड़ड़िया सिंधी स्वर्णकार समाज के सम्मानित सदस्य एवं सलाहकार थे। वे वैशाली नगर स्थित भोलेश्वर मंडल के अध्यक्ष भी रहे। इसके अतिरिक्त, वे वैशाली सिंधी सेवा समिति के विशेष आमंत्रित सदस्य थे और शहर की विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक समितियों में सक्रिय भूमिका निभाते थे।
सिंधी भाषा, संगीत एवं भावी पीढ़ी के प्रति समर्पण
वे बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रतिज्ञाबद्ध स्वयंसेवक थे। भारतीय सिंधु सभा, अजमेर की स्थापना के समय से ही वे इसके सक्रिय सदस्य रहे। सभा द्वारा आयोजित सिंधी कार्यशालाओं में उन्होंने भावी पीढ़ी को सिंधी गीत-संगीत का ज्ञान प्रदान किया और अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में योगदान दिया।
स्व. मिर्चूमल सोनी का 18th December 2011 को निधन हो गया। वे अपने साहित्यिक सृजन, संगीत साधना, मंचीय प्रस्तुतियों और समाजसेवा के माध्यम से सिंधी भाषा एवं संस्कृति के प्रति अपनी निष्ठा और समर्पण की अमिट छाप छोड़ गए।
Jayanti Arjandas Thakkar “MITHI”
— Researcher • Writer • Social Worker