तप के समान है कथा श्रवण : भाईश्री

-सुमित सारस्वत- ब्यावर। श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ महोत्सव समिति की ओर से आयोजित संगीतमय भागवत कथा के दूसरे दिन अंतर्राष्ट्रिय कथा वाचक पूज्य रमेश भाई ओझा ने कहा कि जहां प्रेम होता है, उसे पाने की चाहत बढ़ जाती है। बुद्धि जिनका महत्व स्वीकार करे, उससे लगाव हो जाता है। जिसके मन में प्रेम व भक्ति नहीं, वह साधक नहीं। रघुनाथ में प्रीत की कमी व श्रद्धा के अभाव से भक्ति संभव नहीं है।
001नारायण आश्रम में कथा कहते हुए भाईश्री ने कहा कि कथा श्रवण करना तप के समान है। संत मार्गदर्शक है जो प्रभु से मिलन का मार्ग बताते हैं। जिससे प्रेम हो जाए उसे हर कीमत पर प्राप्त करें। उन्होंने कहा कि भागवत रहस्यमय कथा है। जिसे समझने के लिए संत-महापुरूष का सानिध्य आवश्यक है। भागवत भगवान का अवतार व अक्षर ध्येय है। जिस तरह गंगा में डुबकी लगाने से पुण्य प्राप्त होता है, उसी तरह भागवत कथा श्रवण करने से जीवन का कल्याण हो जाता है। भागवत श्रवण परमात्मा से मिलन का मार्ग प्रशस्त करता है। भागवत जीवन जीने की कला सीखाती है। श्रीनाथजी व वृंदावन बिहारीलाल अर्चन विग्रह हैं और भागवत ग्रंथ अक्षर विग्रह है। अन्य पुस्तकें पढऩे से मनोरंजन होता है जबकि भागवत ग्रंथ मन शुद्ध करता है। भाईश्री ने धर्म पालन करने का संदेश देते हुए कहा कि परमात्मा जीवन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। भागवत भक्ति ग्रंथ है। भागवत में राधा नाम का जिक्र नहीं, मगर राधा बिना भागवत की कल्पना संभव नहीं है। भागवत का प्रत्येक शब्द राधा के समान है।
002भगवान के श्रीमुख से कहे गए शब्दों का ग्रंथ भागवत है। संतश्री ने कहा कि विनम्रता से मिलने पर प्रेम बढ़ता है। अहम और वहम बहुत से संबंध बिगाड़ देते हैं। अहंकार के साथ प्रभु प्राप्ति संभव नहीं है। महाराज ने ‘तेरी मेहरबानी का है बोझ इतना…, दर्शन दो घनश्याम नाथ मेरी अंखियां प्यासी रे…, जय जय राधारमण गिरधारीÓ भजन सुनाया तो श्रोता भाव विभोर होकर झूम उठे। कथा के बीच महाराजश्री ने कवियों की लड़ाई व पति-पत्नी के झगड़े का व्यंग्य सुनाकर सभी को हास्य से ओतप्रोत भी किया। कथा प्रारंभ होने से पूर्व तहसीलदार मदनलाल जीनगर, सभापति बबीता चौहान, उपसभापति सुनील मूंदड़ा, आयुक्त मुरारीलाल वर्मा, पार्षद उमा खंडेलवाल, कांता ग्वाला, भाजपा महिला मोर्चा महामंत्री साधना सारस्वत, संगीता द्विवेदी, डॉ. अमिता बिड़ला, मुकुंददास राठी, एलएन डागा, ओम मंगल, किशन बंसल, मोहनलाल अग्रवाल, सुनील शर्मा, चंपालाल गोयल, धरणीधर गर्ग, मोतीलाल मित्तल, कमल जिंदल, अजय, नितेश, गौरव, मुकेश गोयल, मृदुल गर्ग, शाश्वत गर्ग, सुखदेव बंसल, रमेश मास्टर, तरूण अग्रवाल ने महाराजश्री का स्वागत कर आशीर्वाद लिया। मंच संचालन रमेश बंसल व राधेश्याम डाणी ने किया।

दो दूनी चार की गणित
भाईश्री ने भागवत की व्याख्या करते हुए दो दूनी चार के पहाड़े से जीवन की गणित समझाई। उन्होंने कहा कि भा यानि प्रकाश, ग यानि ज्ञान, व यानि वैराग्य, त यानि त्याग। भागवत का तात्पर्य है कि अध्यात्म दीप। भागवत का ज्ञान प्राप्त हो जाता है तो अंधकार मिट जाता है। जिस तरह रात के अंधेरे में रस्सी का आभास सर्प के समान होता है उसी तरह संसार भी मिथ्या से भय पैदा करता है।

राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित हो गीता
संतश्री ने कथा में ग्रंथों का महत्व बताते हुए कहा कि श्रीमद् भगवद गीता सांप्रदायिक ग्रंथ है। सभी धर्मों के लोग इस ग्रंथ का सम्मान करते हैं। भाईश्री ने गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि गीता योग शास्त्र, रामायण प्रयोग शास्त्र व भागवत वियोग शास्त्र है।

भाषाओं की जननी है संस्कृत
भाईश्री ने कहा कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। इसकी शैली अति सुंदर है। सभी भाषाओं का संबंध संस्कृत से ही है।

ऐसे बनता है कैरेक्टर
महाराजश्री ने कैरेक्टर यानि चरित्र की व्याख्या करते हुए बताया कि एक्शन (क्रिया), थॉट (विचार), इमोशन्स (भावना) से मिलकर कैरेक्टर (चरित्र) बनाता है। भाईश्री ने कहा कि सद्विचार से सद्भाव होगा और सद्भाव से मनुष्य सत्कर्म करेगा।

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