चोरी के अतिचारों को समझ कर बचे =गुरूदेव श्री प्रियदर्शन मुनि*

संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि बाहर की सजावट के लिए पर की (दूसरों )की आवश्यकता होती है, मगर भीतर की सजावट के लिए पापों को छोड़ने की आवश्यकता होती है । तीसरे पाप अदतादान पर चर्चा चल रही है, श्रावक के तीसरे व्रत में इसके पांच अतिचार बताए हैं पहला है चोर की चुराई वस्तु लेना। आप लोभ के वश अगर महंगी चीज कम पैसों में मिल रही हो तो जानते हुए भी की यह चोरी की हो सकती है, फिर भी ले लेना। भगवान ने इसे अतिचार बताया है ।और कानून में भी इसे अपराध माना गया है। बहुत बार देखा जाता है कि जब चोरी का खरीदा हुआ माल पकड़ा जाता है, तब वह माल तो देना ही पड़ता है साथ ही साथ उसके अतिरिक्त और भी नुकसान उठाना पड़ जाता है। दूसरा अतिचार है चोर को सहायता देना या चोरी को प्रोत्साहन देना। इसी के साथ राज्य के विरुद्ध कार्य करना झूठ तोल झूठा माप करना और वस्तुओं में मिलावट करना यह सब अतिचार है ।बहुत बार व्यापारी लोग तराजू के नीचे चुंबक लगा देते हैं, यानी लेने के पलडे अलग और देने के पलड़े अलग ।कपड़े का माप 1 मीटर कहकर 90 सेंटीमीटर ही देना ।इसी के इसी के साथ खाद्य पदार्थ या दवा आदि में मिलावट कर देना आदि।
चोरी करने वाले या विदेशो से कीमती सामान की तस्करी करने वाले अपनी बॉडी तक को भी चीर कर उसमें हीरे आदि भर लेते हैं और देश में आकर फिर हीरे निकाल लेते हैं ।या सोने आदि की पेस्ट बनाकर पी जाते हैं और देश में आकर ऑपरेशन करवा लेते हैं।
लेकिन याद रखें इसमें बहुत नुकसान है। इससे देश की प्रतिष्ठा व सम्मान कम होता है। परिवार की प्रतिष्ठा कम पड़ती है और आने वाली पीढ़ी को गलत संस्कार मिलने की संभावना रहती है।
अतः अपने स्वार्थ को घटाकर चोरी के अतिचारों से बचने का ज्यादा से ज्यादा प्रयास करें ।अगर ऐसा प्रयास और पुरुषार्थ रहा तो सर्वत्र आनंद ही आनंद होगा ।
आज की धर्म सभा में 12 उपवास 7 उपवास की तपस्या के साथ-साथ श्रीमती सुलोचना जी सुराणा ने अठाई की तपस्या के प्रत्याखान गुरुदेव श्री से ग्रहण किया। धर्म सभा में गुरुदेव श्री सोहनलाल जी महाराज साहब का संसार पक्षीय वीर परिवार भी उपस्थित था, एवं विजयनगर ,भीलवाड़ा मेड़ता आदि संघों से भी श्रद्धालुजन पधारे।
धर्म सभा को पूज्य श्री विरागदर्शन जी महारासा ने भीसंबोधित किया ।
धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेडा ने किया।
पदमचंद जैन

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