बालकवि बैरागी: बुझ गया ‘दीवट का दीप’
दीये की बाती जलती है तब सबको उजाले बांटती है। बीज उगता है तब बरगद बन विश्राम लेता है। समन्दर का पानी भाप बन ऊंचा उठता है तब बादल बन जमीं को तृप्त करने बरसता है। ऐसे ही लाखों-लाखों रचनाकारों की भीड़ में कोई-कोई रचनाकार जीवन-विकास की प्रयोगशाला मेें विभिन्न प्रशिक्षणों से गुजरकर महानता का … Read more