
ज्ञातव्य है कि आमतौर पर व्यापारी वर्ग भाजपा मानसिकता का माना जाता है। अब जब कि केन्द्र में भाजपा की सरकार है तो उन्हें इस बात का मलाल है कि आजादी के बाद 70 वर्ष में किसी भी सरकार ने कपड़े पर कोई भी टैक्स नहीं लगाया, जबकि मौजूदा सरकार इस पर आमादा है।
संघ की ओर से जारी विज्ञप्ति से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस हड़ताल में किस प्रकार भाजपा मानसिकता के व्यापारियों ने हिस्सा लिया। जरा उन नामों पर गौर कर लीजिए:- मुख्य कार्यकारिणी अध्यक्ष सुरेशचन्द गुप्ता, सचिव प्रवीनचन्द जैन, भगवान चन्दीराम, मुकेश सेठी, राजकुमार गर्ग, अशोक राठी, मुकेश गोयल, कमलेश शर्मा, सुन्दर भाई, किशन गोपाल गुप्ता, कैलाश अग्रवाल, शिवशंकर बाड़मेरा, रमेश शर्मा, मुकेश जैन, सुनिल गदिया, ललित अग्रवाल, किशोर सतरानी, दुर्गेष सन्तूमल, परमानन्द, सन्देश मॉयल साडी। कम से कम व्यापारी वर्ग तो जानता है कि इनमें कितने भाजपा मानसिकता के हैं।
ज्ञातव्य है कि इससे पहले नमकीन व्यापारियों ने विरोध जताया था, जिनमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अजमेर महानगर प्रमुख सुनील दत्त जैन आगे की पंक्ति में खड़े थे।
इसी प्रकार अन्य वस्तुओं का व्यापार करने वाले भी कसमसा रहे हैं। आपसी बातचीत में वे केन्द्र सरकार को कोस रहे हैं। उन्हें इस बात का ज्यादा अफसोस है कि जब केन्द्र में कांग्रेस सरकार जीएसटी को लाना चाहती थी, तब भाजपा ने उनकी पैरवी करते हुए इसका विरोध किया था और जब भाजपा सत्ता में है तो इसे लागू करने पर अड़ी हुई है।
जाहिर सी बात है कि आज जब भाजपा मानसिकता के व्यापारी परेशान हैं तो कांग्रेसी मानसिकता के लोग इस मुद्दे को हाथोंहाथ लपक रहे हैं। राष्ट्रीय सोनिया गांधी ब्रिगेड कांग्रेस अजमेर के शहर अध्यक्ष राजकुमार गर्ग, राजस्थान प्रदेश यूथ फेडरेशन के प्रदेश संयोजक कमल गंगवाल, सीए प्रकोष्ठ के अध्यक्ष विकास अग्रवाल एवं पूर्व विधि प्रकोष्ठ अध्यक्ष एडवोकेट विवेक पाराशर और वरिष्ठ कांग्रेस नेता शिव बंसल, नीरु दोसाई, असलम खान, सीताराम सांखला, सुनीता सांखला, विभूति जैन, जीनत बानो, विनीता अग्रवाल, शांति लश्कार, आशा कच्छावा, अनुपम शर्मा, अरुणा कच्छावा, राजेश जैसवाल, नीरु गर्ग, अभिलाषा विश्नोई ने तो बाकायदा संयुक्त विज्ञप्ति जारी कर कपड़े पर प्रस्तावित टैक्स से मुक्त किये जाने की मांग को लेकर चल रहे विरोध का समर्थन कर दिया। विरोध के यज्ञ में आहुति देते हुए उन्होंने कहा कि व्यापारी वर्ग नोटबन्दी की वजह से परेशान है, व्यापार ठप्प पड़ा हुआ है, नोटबन्दी के बाद बाजार में अभी तब उठाव आया ही नहीं था कि सरकार जीएसटी जैसा जटिल टैक्स लागू कर रही है, जिसने व्यापारियों की कमर ही तोड़ दी है।
अब देखने वाली बात ये है कि क्या सरकार देशहित का ख्याल रखती है या फिर वोट बैंक खिसकने के डर से पैर पीछे खींचती है।
-तेजवानी गिरधर
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किसानों को भी बीजेपी ने तरह तरह को प्रलोभन दिए थे. किसानों दवारा की गई आत्म हत्याओ पर जार जार आंसू बहाये गए. अब उन पर गोली चलाई गई है और आत्म हत्याएं बदस्तूर चालू है. बडे सरजी विदेशों की सैर पर है. नौजवान ठगे से दो करोड नौकरियों की बाट जो रहे है. ऐसे में व्यापारियों का मोह भंग हुआ है तो एक शेर याद आरहा है. इसी बायस तो कत्ले आशंका से मना करते थे, अकेले फिर रहे हो युसुफे बेकारवां होकर.