भू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

*भारतवर्ष विविधताओं से भरा देश है जहां हर 50-100 किलोमीटर पर पानी और वाणी बदल जाते हैं । क्रमशः देश के सभी प्रांतों में एक छोर से दूसरे छोर तक जाने पर खान-पान, वेशभूषा, भाषा, रहन-सहन, रंग रूप, जलवायु तक में अंतर होता है। इतनी विविधताओं में हमारी संस्कृति ने ही देश को एकता के सूत्र मैं जोड़ कर रखा है*।
राष्ट्र के विकास में स्वदेश का महत्व सबसे अधिक होता है इसलिए हर युग में स्वत: ही अपनी संपूर्ण मातृभूमि के दर्शन हो ऐसा प्रयत्न किया गया है , किसी भी मत अथवा संप्रदाय को मानने वाले क्यों ना हो उनके सम्मुख हिमालय से कन्याकुमारी तक आसिंधु- सिंधु पर्यंत भारत का चित्र रहता है।
*प्रत्येक संप्रदाय के आचार्य ने यही प्रयत्न किया है कि उनके संप्रदाय के लोग संपूर्ण भारत को पवित्र माने, इतना ही नहीं भारत की एकता का प्रत्यक्ष ज्ञान कर सकें, इसलिए प्रत्येक संप्रदाय में तीर्थ यात्रा की पद्धति प्रचलित हुई यह तीर्थ तो भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक बिखरे हुए हैं*।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की दक्षिण यात्रा ने उत्तर और दक्षिण भारत का जो गठबंधन किया वह जनसाधारण के आचार – विचार और भावना में अटूट हो गए, बिल्कुल वैसे ही जैसे उत्तर से गए श्री राम और दक्षिण में श्री हनुमान जी का अटूट संबंध है।महापुरुषों ने इसी एकता को प्रकट करने के लिए एक बार नहीं बार-बार भारत के एक छोर से दूसरे छोर का अत्यंत महत्वपूर्ण वर्णन किया है।
*दक्षिण में केरल के कालपी में जन्मे पूज्य आदि शंकराचार्य जी ने केरल से हिमालय तक की यात्रा कर चार पीठों की स्थापना कर मात्र 32 वर्ष के जीवन काल में राष्ट्र को जोड़ा, और इसी प्रकार कई संप्रदाय और संतों ने भी यही कार्य किए। बंगाल में जन्मे स्वामी विवेकानंद ने हिमालय से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक सांस्कृतिक जागरण करते हुए भारत की भूमि के कण-कण की पवित्रता को एकता के सूत्र से जोड़ा हैं*।
अनेकता में एकता के इस मंत्र से ही आज राष्ट्र एक शक्तिशाली भूमिका में है ।
*प्रसिद्ध शायर इकबाल ने लिखा भी है “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों से रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा*”

अरविंद यादव अजमेर
94142 52930

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