*वैचारिकी-सच की अनुपस्थिति

रास बिहारी गौड़
अजीब समय है ..सतही और नक़ली चीजों के बीच सत्य उसी तरह कुचला जा रहा है जैसे किसी बड़े जलसे में ज़मीन पर गिरा असहाय बूढ़ा अपनी आख़िरी साँसे ले रहा हो । सच का बोलना या होना बीते समय की बोझिल वें कहनियाँ लगती हैं, जब उम्र के सायों को आशीष कहा जाता था, खिलते बचपन से ख़ुशबुए बटोरी जाती थी, प्रेम को देह के घोल से इतर पीया जाता था।
सत्ता और शोषण का शाश्वत रिश्ता रहा है.. धार्मिक अंधत्व ने सदियों को लीला है ..युद्धों के नाम में मौत को महिमा मंडित किया गया है। इन सबके बीच भी समाज अपनी बेहतरी के लिए संघर्षरत रहा है .. छोटी बड़ी क्षमताओं से स्वयं को आगे बढ़ता रहा है..अपने नायकों की सही-सही शिनाख्त करता रहा है.। जब-जब वह किसी नशे या सम्मोहन में ऐसा करने से विमुख हुआ, तब-तब किसी उसने बड़े अनिष्ट को आमंत्रित किया है ।
आज भारत का नागरिक समाज उसी अप्रिय दौर से गुज़र रहा है..वह हर सच को पूरी ताक़त से ख़ारिज कर रहा है ..हर झूठ को प्रसारित करना अपना दायित्व समझ रहा है।
पिछले दिनों इस तरह के अनेक अनुभवों से गुजरना हुआ। कुछ बेहद प्रिय मित्र, जिनके संवाद में समाज को लेकर अक्सर चिताएँ रहती थीं ..आज उन चिंताओं के स्वर थके-थके से लगते हैं ..मसलन घर की आर्थिकी, आजीविका, बाज़ार,बच्चों का भविष्य, सद्भाव हर कोण से नकारात्मक होते हुए उनके भीतर का ग़ुस्सा जैसे तिरोहित हो चुका है ..वे अपने प्रति एक विशेष क़िस्म की अवज्ञा से घिरे रहते हैं..ज़्यादा से ज़्यादा अपना आक्रोश किसी धर्म, जाति या राजनीतिक दल को गालियाँ देकर ख़ाली कर लेते हैं..वे सत्ता या संस्थान से अपने अधिकारों की कोई माँग नहीं करते..इसके उलट अगर कोई यह कार्य करता है तो उसे अपना निज विरोधी मान कर शत्रुता पाल लेते हैं। इतना ही नहीं अपराध और डर को लेकर भी वे वास्तविक खलनायक में अपनी जाति, धर्म, निष्ठाएँ देखते हैं..उनके पक्ष में तर्क गढ़ते हैं..।
मोटा सा उदाहरण जो इन दिनों क़रीब से देखने को मिला..। कवि सम्मेलन की तीन दशक की यात्रा में पहली बार मंच से सरोकारी आवाज़ें सिरे से ग़ायब दिख रही हैं..यदि अपवादिक रूप से कुछेक हैं भी तो उन्हें श्रोताओं की तीखी प्रतिक्रिया से गुजरना पड़ता है। यहाँ तक कि मसखरी या हल्के हास्य में भी वही धर्मांधता, व्यक्ति पूजा, अंधत्व को पोषित करने वाला बतरस ही सुनाई दे रहा है ..। साहित्यिक संस्थान, पत्र पत्रिकाओं, आयोजनों, पुस्तकों की स्थिति और भी ख़राब है ..वहाँ पौराणिक आख्यानों का रोचक रूपांतरण, सफलता कैसे पाएँ. रातों रात अमीर बनने का रास्ता..या फिर बेस्ट सेलर के तमग़े के साथ समाज पूरी तरह अनुपस्थित मिल रहा है।
चूँकि शिखर का तीव्र प्रवाह निम्नतर तल हर को अपने में बहा ले जाता है .अतः सच या नैतिकता के प्रति यह नकार उसी ऊँचाई से आ रहा है, जहाँ सरकारें ख़रीदने से लेकर देश बेचने तक के जुमले वैधता पा चुके हैं..।
स्वतंत्र रहते हुए ग़ुलामी के नए मानक समाज में न केवल स्वीकार्य हो चले हैं बल्कि चीख चीख कर उनका गौरव गान प्रसार माध्यमों घरों, ज़हनों, समय में बरस रहा है..।
मुझे तो फ़िलहाल कोई किरण नज़र नहीं आ रही…अगर आपके पास किसी उजाले का पता हो तो ज़रूर बताएँ …।

*रास बिहारी गौड*

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