समाज की संस्कृति का परिचायक नवरात्रा पर विशेष –
हमारे देश में अनेक धर्म एवं सम्प्रदाय के लोग रहते है। जो समय समय पर अपनी संस्कृति के अनुसार धर्मो को मनाते है। इसीलिए हमारे देश के लिए अनेकता में एकता की बात कही जाती है। विभिन्न धर्मो एवं सम्प्रदाय के लोगों को एक सूत्र में बांधे रखना ही हमारे देश की विशेषता है।
हमारे यहां अनेक त्यौहारों के साथ ही शारदीय नवरात्रि का त्योहार भारत ही नहीं पूरी दुनिया में बड़ी धूमधाम से बनाया जाता है। नवरात्रि का त्योहार भारत में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव है। जो मां दुर्गा की आराधना के लिए मनाया जाता है। इस त्योहार पर देश के विभिन्न शहरों में नृत्यों और संगीत का आयोजन किया जाता है। जिनमें से गरबा और डांडिया नृत्य प्रमुख माने जाते हैं। नवरात्रि जो नव दुर्गा के नाम से जानी जाने वाली देवी माँ के नौ विभिन्न रूपों का उत्सव और सम्मान है। गरबा और डांडिया रास की थापों पर थिरकने के बिना अधूरी है। रंग-बिरंगी पोशाकें तरह-तरह के व्यंजन (हालांकि कई लोग व्रत भी रखते हैं) और डांडिया की डंडियों की झंकार लयबद्ध संगीत हंसी और उत्साह के साथ वातावरण को भक्ति प्रेम और आनंद से भर देती है। आध्यात्मिक रूप से यह अपने भीतर से जुड़ने और देवी माँ की पूजा में लीन होने का एक बेहतरीन समय है वहीं नौ रातों के दौरान होने वाले ये उत्सव परिवार दोस्तों परिचितों और सबसे महत्वपूर्ण बात अपने चंचल स्वभाव से फिर से जुड़ने का एक उत्तम अवसर भी प्रदान करते हैं।
नवरात्रि में गरबा और डांडिया रास इन दोनों नृत्य शैलियों के इतिहास पर नजर डालें तो दोनों की उत्पत्ति पश्चिमी राज्य गुजरात में हुई और दस दिवसीय उत्सव के दौरान हर रात इनका प्रदर्शन किया जाता है। माना जाता है कि ये नृत्य शैलियाँ देवी दुर्गा और राक्षस राजा महिषासुर के बीच नौ दिनों तक चले युद्ध का नाट्य रूपांतरण हैं। जिसमें अंत में देवी दुर्गा की विजय होती है। ये नृत्य देवी माँ के प्रति प्रार्थना भाव से किए जाते हैं। ये नवरात्रि की भावना का प्रतीक हैं। ये नौ दिन हमें अपने मन को शुद्ध करने नए सिरे से शुरुआत करने और नई ऊर्जा प्राप्त करने का अवसर देते हैं।
आरंभ में देवी के निकट सछिद्र घट में दीप ले जाकर यह नृत्य होता था। इस प्रकार यह घट दीपगर्भ कहलाता था। वर्णलोप से यही शब्द गरबा बन गया। आजकल गुजरात में नवरात्रों के दिनों में लड़कियाँ कच्चे मिट्टी के सछिद्र घड़े को फूलपत्तियों से सजाकर उसके चारों ओर नृत्य करती हैं। गरबा सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और अश्विन मास की नवरात्रों को गरबा नृत्योत्सव के रूप में मनाया जाता है।
हालांकि गरबा और डांडिया रास का इस्तेमाल एक दूसरे के स्थान पर किया जाता है लेकिन उनकी शैली उत्पत्ति और प्रदर्शन करने के तरीके में अंतर होता है।
परंपरागत रूप से गरबा मिट्टी के एक बर्तन ( गरबो ) के चारों ओर किया जाता था जिसके अंदर एक दीपक रखा होता था जिसे ‘गर्भ दीप‘ कहा जाता है। दीपक जीवन का प्रतीक है – विशेष रूप से गर्भ में पल रहे नन्हे भू्रण का। बर्तन शरीर का प्रतीक है जिसमें दिव्यता निवास करती है। आज भी गरबा में भक्तिमय आकर्षण बरकरार है।
आजकल यह नृत्य देवी दुर्गा की तस्वीर या मूर्ति को केंद्र में रखकर भी किया जाता है। नर्तक वामावर्त दिशा में घूमते हुए वृत्त बनाते हैं। यदि सभी नर्तकों के लिए एक वृत्त बनाने के लिए पर्याप्त जगह न हो तो नर्तक विपरीत दिशाओं में घूमते हुए संकेंद्रित वृत्त बनाते हैं। यह भाव जीवन चक्र का प्रतीक है जो जीवन से मृत्यु और पुनर्जन्म की ओर बढ़ता है और जीवन का अपरिवर्तनीय केंद्र केवल देवी माँ ही हैं।
नवरात्रों की पहली रात्रि को गरबा की स्थापना होती है। फिर उसमें चार ज्योतियाँ प्रज्वलित की जाती हें। फिर उसके चारों ओर ताली बजाती फेरे लगाती हैं। गरबा नृत्य में ताली चुटकी खंजरी डंडा मंजीरा आदि का ताल देने के लिए प्रयोग होता हैं तथा स्त्रियाँ दो अथवा चार के समूह में मिलकर विभिन्न प्रकार से आवर्तन करती हैं और देवी के गीत अथवा कृष्णलीला संबंधी गीत गाती हैं। आश्विन मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होती है। शक्ति की आराधना पूरे नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा इस महोत्सव के दौरान की जाती है और दसवें दिन दशहरा के साथ ही पर्व का समापन होता है। इस वर्ष शारदीय नवरात्रि की शुरुआत ग्यारह अक्टूबर रविवार से हो रही है और इसका समापन बीस अक्टूबर मंगलवार को महानवमी के साथ होगा।
नवरात्रि में देवी के नौ स्वरूपों के दर्शन और पूजन के साथ डांडिया और गरबा भी खेला जाता है। गुजरात के इस लोक नृत्य का सीधा कनेक्शन मां दुर्गा से है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि में इस नृत्य साधना से भक्त देवी को प्रसन्न करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। गरबा या डांडिया नृत्य अलग- अलग तरीके से खेला जाता है। डांडिया नृत्य में जब भक्त डांडिया खेलते है जो इससे देवी की आकृति का ध्यान किया जाता है जो समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। प्राचीन काल मे लोग गरबा करते समय सिर्फ दो ताली बजाते थे लेकिन आज आधुनिक गरबा में नई तरह की शैलियों का उपयोग होता है। जिसमें नृत्यकार दो ताली छः ताली आठ ताली दस ताली बारह ताली सोलह तालियाँ बजा कर खेलते हैं।
गरबा नृत्य सिर्फ नवरात्री के त्यौहार में ही नहीं किया जाता है बल्कि शादी के महोत्सव और अन्य खुशी के अवसरों पर भी किया जाता है। गरबा नृत्य एक पारंपरिक गुजराती नृत्य है। जो इस राज्य की शोभा और भी बढ़ाता है। इसे नवरात्रि के दौरान विशेष रूप से आयोजन किया जाता है। इस नृत्य में महिलाएं और पुरुष एक सर्कल के हिसाब से खड़े होते हैं और एक-दूसरे के चारों ओर घूमते हुए नृत्य करते हैं। इस नृत्य का मुख्य आकर्षण महिलाओं और पुरूषों की ऊर्जा होती है। दोनों के हाथ डांडिया नृत्य के दौरान खेली जाने वाली छड़ियां होती है जो मां दुर्गा की तलवार का प्रतीक मानी जाती हैं। शारदीय नवरात्र में गरबा और डांडिया एक ऐसा नृत्य कला है जो लोगों को एक साथ लाने और उन्हें देवी दुर्गा की आराधना में शामिल होने के लिए प्रेरित करते हैं।
आजकल नई पीढ़ी के बच्चों में इसका विशेष उत्साह देखने को मिलता है। वे कई दिनों से इस नृत्य के आयोजन इसकी तैयारी करते रहते है। यह नृत्य न केवल नवरात्रि के त्योहार का हिस्सा हैं बल्कि समाज की संस्कृति का भी परिचायक हैं। इस त्योहार में ज्यादातर लोग पारम्परिक वेषभूषा को पसंद करते है। महिलाएं कुर्ती और पायजामे के साथ चुनरी ओढ़नी या दुपट्टा पहनती हैं। गरबा और डांडिया नृत्य के लिए महिलाओं के लिए पारंपरिक वस्त्रों में घाघरा चोली और दुपट्टा शामिल होता हैं। वही पुरूष भी धोती कुर्ता और पगड़ी आदि पहन कर गरबा खेलते है। इसके अलावा महिलाएं और पुरुष गरबा और डांडिया नृत्य के समय झुमके बांगड़ी और अन्य तरह के आभूषण सजने के लिए पहनते हैं।
वर्तमान में गरबा और डांडिया नृत्य का आयोजन देश के अधिकांश राज्यों में होने लगा हैं। आरंभ में यह गुजरात राज्य में ही धूमधाम से मनाया जाता था लेकिन अब यह उत्सव महाराष्ट्र राजस्थान मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी मनाया जाता है। लोग गरबा और डांडिया नृत्य करते हुए मां शक्ति देवी दुर्गा की आराधना करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि डांडिया नृत्य के समय डांडिया लड़ने से जो आवाज उत्पन्न होती है उससे सकारात्मक ऊर्जा आती है। इसके अलावा जीवन की नकारात्मकता भी समाप्त हो जाती है। ठीक ऐसे में गरबा नृत्य के दौरान महिलाएं तीन तालियों का प्रयोग करती है जिससे सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
डांडिया या गरबा नृत्य से पहले देवी की पूजा होती है। इसके बाद देवी की तस्वीर या प्रतिमा के सामने मिट्टी के कलश में छेद करके दीप जलाया जाता है। फिर उसके बाद उसमे चांदी का सिक्का भी डालते हैं। इसी दीप की हल्की रोशनी में इस नृत्य को भक्त करते है। लेकिन आज के आधुनिक समय में लाईटों को चकाचैंध करने लगे है। नृत्य स्थल को आकर्षक रूप से सजाया जाता है। नवरात्रा के आरंभ होने के साथ ही लोग अपने नवीन कार्यो का आरंभ भी कर देते है। वहीं घरों की साफ सफाई भी शुरू हो जाती है। लोग अपने घरों में पडे टुटे हुए सामान को हटा देते है। ताकि घर में सकारात्मकता बनी रहे। इसके साथ ही नवरात्रा में लोग घर के उत्तर पूर्व दिशा में कलश की स्थापना करते है। इस दिशा को पूजा के लिए शुभ माना जाता है। कलश को भगवान गणेश का प्रतीक माना गया है और यह समृद्धि भी लाता है। इस कारण इसको साफ सुथरी जगह पर रखते है। नवरात्रा पर लोग अपने घर के प्रवेश द्वार को भी सजाते है। वहां रोशनी करते है। नवरात्रि के दौरान घर के ईशान कोण में घी का दीया जरूर जलाते है। दीया अंधकार को दूर भगाता है और इसलिए इसे प्रकाश और ज्ञान का प्रतीक माना गया है। इसके अलावा यह घर से विभिन्न तरह की बाधाओं को भी दूर करने का काम करता है।
हालांकि यह जानना दिलचस्प है कि हम हर साल इन नृत्य शैलियों का प्रदर्शन क्यों करते हैं लेकिन असली सार उस गर्मजोशी और एकजुटता में निहित है जो हम नौ दिनों के लिए अपने परिवार और दोस्तों के साथ इकट्ठा होने पर महसूस करते हैं। यह समय अपनेपन और आनंद से भरा होता है। ईश्वर के प्रति श्रद्धा जीवित रहने और इतनी समृद्धि से धन्य होने के प्रति हमारी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है। नवरात्रि इन भव्य नृत्यों के बिना अधूरी है।
—श्रीमती संतोष शर्मा
स्वतंत्र पत्रकार साकेत नगर