रुबरू थिएटर दिल्ली की प्रस्तुति नाटक ढलती साँझ की नई सुबह का एलटीजी ऑडिटोरियम में सफल मंचन

नई दिल्ली। नाटक “ढलती साँझ की नई सुबह” : रिश्ते खून से नहीं, संवेदना से भी बनते हैं। काजल सूरी के एकाँकी में वृद्धावस्था के अकेलेपन, बदलते पारिवारिक रिश्तों और नई शुरुआत की मार्मिक कहानी रुबरू थिएटर द्वारा प्रस्तुत हिंदी नाटक “ढलती साँझ की नई सुबह” का मंचन एलटीजी ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में किया गया। काजल सूरी द्वारा लिखित एवं निर्देशित इस भावनात्मक और विचारोत्तेजक नाटक ने दर्शकों के सामने पारिवारिक रिश्तों, वृद्धावस्था में अकेलेपन और बुज़ुर्ग माता-पिता के प्रति हमारी जिम्मेदारियों जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।लेखिका काजल सूरी का भावपूर्ण एकाँकी “ढलती साँझ की नई सुबह” वृद्धावस्था में बढ़ते अकेलेपन, संतान की व्यस्तता और भावनात्मक उपेक्षा जैसे समकालीन सामाजिक विषयों को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है।
एकाँकी के अंत में सुधा और कमला अपने जैसे अकेले लोगों को साथ जोड़कर जीवन की दूसरी पारी शुरू करने का निर्णय लेती हैं। वे अपने अधूरे सपनों को फिर से जीने और दूसरों के लिए सहारा बनने का संकल्प लेती हैं। “ढलती साँझ की नई सुबह” का मूल संदेश है कि उम्र बढ़ना जिंदगी का अंत नहीं है। कभी-कभी जीवन की ढलती साँझ ही अपने लिए जीने की एक नई सुबह लेकर आती है। एकाँकी दर्शकों से एक मार्मिक सवाल भी करता है— “अगर आपके घर में कोई बूढ़ी माँ आज भी दरवाज़े की ओर देखती है, तो उससे केवल यह मत पूछिए कि दवाई खाई? कभी उसका हाथ पकड़कर पूछिए—‘माँ, आज दिल कैसा है?’”
काजल सूरी के लेखन और निर्देशन में प्रस्तुत इस नाटक ने यह संदेश दिया कि रिश्तों की वास्तविक मजबूती केवल पारिवारिक संबंधों में नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान, संवेदनशीलता और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी निभाने में निहित है। विशेष रूप से बुज़ुर्गों की भावनात्मक आवश्यकताओं और उनके प्रति परिवार के सदस्यों के व्यवहार को केंद्र में रखकर नाटक ने एक प्रासंगिक सामाजिक विषय को मंच पर साकार किया। इस प्रस्तुति में अन्नू शर्मा, शुभम शर्मा और काजल सूरी ने मंच पर अपनी अभिनय प्रतिभा के माध्यम से कहानी को जीवंत रूप दिया।

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