बेंगलुरु: निवेशकों को अगली बड़ी कामयाब कंपनी से चूक जाने के डर के आगे नहीं झुकना चाहिए, क्योंकि आकर्षक मौके आगे भी आते रहेंगे। कोटक एसेट मैनेजमेंट कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर निलेश शाह ने यह बात कोटक प्राइवेट के ‘टेक एंड काउंटर टेक’ (टीएसीटी) में कही। यह सिर्फ आमंत्रित मेहमानों के लिए होने वाला एक थॉट लीडरशिप प्लेटफॉर्म है। “क्या संपत्ति बनाने का भविष्य पब्लिक मार्केट से प्राइवेट मार्केट की ओर खिसक रहा है?” विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में शाह ने निवेशकों को आगाह किया कि वे जल्दबाजी या बाजार में चल रही कहानियों को अपने अनुशासन पर हावी न होने दें। उन्होंने कहा, “किसी भी निवेश के पीछे सिर्फ इसलिए कभी नहीं भागना चाहिए कि सेल-साइड उसे जीवन में एक बार मिलने वाला मौका बता रहा है।” साथ ही, उनका कहना था कि किसी एक मौके से चूक जाने को ऐसा नुकसान नहीं मानना चाहिए, जिसकी भरपाई कभी न हो सके।
श्री शाह की यह बात प्राइवेट मार्केट के सौदों, आईपीओ और निवेश के नए अवसरों को लेकर अक्सर बने रहने वाले फोमो (FOMO) यानी मौका छूट जाने के डर पर सवाल उठाती है। उनके मुताबिक, हर नए अवसर को संपत्ति बनाने का आखिरी मौका मानने के बजाय निवेशकों को धैर्य रखना चाहिए और सोच-समझकर चुनिंदा निवेश करने चाहिए। ट्रेन के उदाहरण से समझाते हुए उन्होंने कहा कि अगर एक ट्रेन छूट जाए, तो दूसरी ट्रेन भी आएगी। उनका संदेश साफ था: जो निवेश आपके लिए सही न हो, उसमें उतरने की कीमत किसी अच्छे मौके को छोड़ देने की कीमत से ज्यादा हो सकती है।
‘स्टार्टअप और बड़ी कंपनियों के बीच का फर्क धुंधला होगा’
निवेश में यह अनुशासन ऐसे समय में खास तौर पर अहम हो सकता है, जब स्टार्टअप और बड़ी स्थापित कंपनियों के बीच की पारंपरिक सीमा रेखा मिटने लगी है। शाह ने बताया कि कुछ लिस्टेड कंपनियां अपने कारोबार के भीतर स्टार्टअप की तरह काम करने वाली अलग इकाइयां बना रही हैं। इन इकाइयों में समर्पित टीमों को अलग कार्य संस्कृति, कामकाज का अलग तरीका और इनोवेशन की जिम्मेदारी दी जा रही है, ताकि बड़ी कंपनी की नौकरशाही उनके रास्ते में रुकावट न बने।
श्री शाह ने एक भारतीय मैन्युफैक्चरिंग कंपनी का उदाहरण देते हुए बताया कि वह एक खास कंपोनेंट विकसित करना चाहती थी, जिसे दुनिया में सिर्फ तीन कंपनियां बनाती थीं। इसके लिए कंपनी ने एक अलग रिसर्च एंड डेवलपमेंट यूनिट शुरू की। इस यूनिट के लिए व्यवस्था थी, “अपनी कार्य संस्कृति, अपने काम के घंटे, मुख्यालय से कोई जुड़ाव नहीं।” उसे साफ लक्ष्य दिया गया, “यह रहा पैसा, यह है वह तकनीक। जाइए और इसे हासिल कीजिए।”
इसका बड़ा असर उन निवेशकों पर पड़ सकता है, जो अगली पीढ़ी की ग्रोथ कंपनियों की तलाश में रहते हैं। हो सकता है कि इनोवेशन अब सिर्फ निजी फंडिंग वाले स्टार्टअप तक सीमित न रहे। पूंजी, वितरण नेटवर्क और कारोबार के अनुभव वाली स्थापित कंपनियां अपने भीतर नए कारोबारी उपक्रम खड़े कर सकती हैं, और वह भी लिस्टेड कंपनी होने की खूबियां बनाए रखते हुए। शाह ने कहा, “मुझे लगता है कि स्टार्टअप के इनोवेशन करने और बड़ी कंपनियों के डायनासोर बने रहने वाला यह फर्क, उम्मीद है, अब धुंधला होने लगेगा।”
‘भारत में पीई फंड आने से पहले से ही था प्राइवेट इक्विटी का चलन’
श्री शाह ने इस आम धारणा को भी चुनौती दी कि प्राइवेट इक्विटी भारत में हाल के वर्षों में आया कोई नया या विदेशी निवेश मॉडल है। उनके मुताबिक, परिवारों, रिश्तों और कारोबारी समुदायों के इर्द-गिर्द लंबे समय से इसका अनौपचारिक चलन रहा है। उन्होंने कहा, “किसी रिश्तेदार का दूसरे रिश्तेदार को कारोबार शुरू करने के लिए सीड मनी देना भी प्राइवेट इक्विटी है।”
पहले जहां ऐसी पूंजी निजी रिश्तों और नेटवर्क के जरिए लगाई जाती थी, वहीं शाह को अब इसे ज्यादा व्यवस्थित और पेशेवर तरीके से आगे बढ़ाने की गुंजाइश दिखती है। उन्होंने कहा, “जो पहले परिवार तक सीमित था, वह अब पेशेवर तरीके से समुदाय का हिस्सा बन रहा है। अगर यह मॉडल सफल होता है, तो मुझे यकीन है कि दूसरे समुदाय भी इसे अपनाएंगे।”
ये सभी रुझान मिलकर दिखाते हैं कि भारत में संपत्ति बनाने का तरीका कैसे बदला है। आने वाले समय में मौके पारंपरिक स्टार्टअप और शेयर बाजार की स्थापित कंपनियों के अलावा, लिस्टेड कंपनियों की उद्यमी इकाइयों और पेशेवर तरीके से संभाली जा रही सामुदायिक पूंजी से भी ज्यादा से ज्यादा सामने आ सकते हैं। निवेशकों के लिए शाह की सलाह अनुशासन की है: मौके आते रहेंगे, लेकिन हर मौके के पीछे भागना जरूरी नहीं।