संवैधानिक परंपराओं के साथ प्रथम नागरिक का जीवन

देश के महामहिम पद के लिए शपथ ले चुके प्रणब मुखर्जी अब भारतीय लोकतंत्र के प्रथम नागरिक बन चुके हैं। प्रथम नागरिक, जिसकी संवैधानिक श्रेष्ठता के मुकाबले भारत में कुछ भी नहीं। शानो शौकत से भरी राजसी जिंदगी जीने के साथ साथ प्रणब मुखर्जी को प्रथम नागरिक की कुछ जिम्मेदारियां भी तोहफे ‌में मिली हैं जिनका पालन करते हुए दादा की रोजमर्रा की जिंदगी बिलकुल बदल जाएगी।

अब ‘दादा’ नहीं कह सकेंगे
अब प्रणब दा ‘पोल्टू दा’ या ‘दादा’ नहीं कहलाएंगे। अब उन्हें सम्मान जनक और संवैधानिक तरीके से ही पुकारा जा सकेगा। उन्हें महामहिम  राष्ट्रपति जी या ऑनरेबल प्रेसिडेंट कहकर पुकारा जाएगा। अभी तक संसद में विपक्षी दल प्रणब दा के‌ खिलाफ मजाकिया छींटाकशी करते थे लेकिन प्रणब दा के महामहिम बनते ही ये सिलसिला खत्म हो जाएगा। एक आदरपूर्वक संबोधन के अलावा प्रणब दा को नहीं पुकारा जा सकेगा।

अब मनमोहन को कराएंगे इंतजार…
प्रणब मुखर्जी के लिए कई सालों का क्रम एक दिन में बदल जाएगा। साल 2004 से जून 2012 तक बतौर केंद्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी को हर समारोह में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इंतजार करना होता था, लेकिन आज से ये क्रम बदल जाएगा। संवैधानिक प्रोटोकाल के चलते अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को महामहिम प्रणब मुखर्जी से पहले समारोह स्थल पर पहुंचना होगा और उनके सम्मान में अपनी कुर्सी से खड़ा होना पड़ेगा। भले ही प्रणब को ये अभिवादन स्वीकार करने में झिझक महसूस होगी लेकिन भारत की इस संवैधानिक गरिमा का ख्याल उन्हें रखना ही होगा।

दुर्गापूजा पर घर कैसे जाएंगे
दादा की पहली चिंता है दुर्गापूजा। दादा का रिकार्ड है कि वो हर साल दुर्गापूजा का आयोजन पश्चिम बंगाल में अपने पैतृक निवास पर करते हैं। दुनिया इधर की उधर हो जाए, दादा दुर्गा पूजा के अंतिम पांच दिन कोई काम नहीं करते और अपने घर में कुलदेवी की पूजा अर्चना में वक्त बिताते है। संसद में अमेरिका के साथ परमाणु डील पर महत्वपूर्ण चर्चा पांच दिन तक इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि प्रणब दा अपने घर पर दुर्गा पूजा में व्यस्त थे।

लेकिन अब क्या होगा। बतौर राष्ट्रपति प्रणब दा अपने पैतृक निवास पर जाकर पूजा नहीं कर सकते। ये देश के राष्ट्रपति के प्रोटोकाल के खिलाफ है। संवैधानिक परंपरा के अनुसार देश का प्रथम नागरिक किसी घर में जाकर पूजा अर्चना नहीं कर सकता। सवाल यही है कि दुर्गा पूजा के पक्के प्रणब दा अब क्या करेंगे। क्या वो प्रोटोकाल निभाएंगे या कुलदेवी की अर्चना से महरूम रह जाएंगे। हालांकि प्रणब दा चतुर राजनीतिज्ञ हैं और वो इसका भी ‘संवैधानिक उपाय’ निकाल लेंगे।

पारिवारिक समारोह, दोस्ती यारी सब बंद
अभी तक प्रणब दा अपने हर पारिवारिक और मित्र समारोह में जोर शोर से भाग लेते थे। दोस्तों के दोस्त बने प्रणब दा भरपूर बिंदास जीवन जीते थे। लेकिन अब ये संभव नहीं होगा। वे किसी पारिवारिक समारोह में उस प्रकार हिस्सा नहीं ले पाएंगे जैसे पहले ले पाते थे। दोस्तों के साथ घूमने फिरने का मौका नहीं मिलेगा। वक्त बेवक्त की दोस्ती यारी पर विराम लग जाएगा। हालांकि प्रणब दा को इससे उलझन हो सकती है लेकिन एक प्रथम नागरिक होने के नाते प्रणब को ये प्रोटोकाल निभाने होंगे।

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