काश ! इस पुरस्कार की जगह मेरी मातृभाषा का मान बख्श दिया जाता मुझे

IMG-20171229-WA0081राजस्थानी सृजन मेरे लिए कोई प्रोजेक्ट या पहचान का जरिया-भर नहीं है, यह मेरा जीवन, संस्कार, संवेदना और मेरा मान है । आज इस पुरस्कार की जगह अगर मुझे मेरी मातृभाषा की मान्यता का मान बख्श दिया जाता तो आने वाली पीढी को सर उठा कर कह पाता कि मैंने मिट्टी का कर्ज नहीं लजाया । ये विचार राजस्थानी-हिन्दी के कवि, कथाकार, समालोचक रवि पुरोहित ने साहित्य अकादमी, दिल्ली के अनुवाद पुरस्कार से समादृत होने के बाद अवार्डीज मीट में रखे । सैयद भगतसिह युवा अब्बास, खजूरबाग, अगरतल्ला मे समानधर्मा साथियो से अनुवाद के अनुभवो को साझा करते हुए कहा कि साहित्य अकादमी में राजस्थानी के अनुवाद, पुरस्कार आदि तमाम उपक्रम होते हैं पर आठवीं अनुसूची में जुड़ने के लिए वह आज भी राजनैतिक इच्छाशक्ति की मोहताज है । प्रदेश में भले ही इसे शिक्षा का अधिकार में जोड़ लिया गया हो, बच्चों को संस्कारित करने व समझाने के लिए भले ही जमीनी धरातल पर मायड़ भाषा माध्यम बनती हो, भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के विकास के लिए भले ही राज्य सरकार ने पृथक अकादमी बना रखी हो पर प्राईमरी शिक्षा का माध्यम वह आज भी नहीं बन पाई है । अमेरिका ने भले ही लोक समृद्ध भाषा मान लिया हो, टी. वी. चैनल्स ने भले ही धारावाहिकों में राजस्थानी के जरिए अपनी टीआरपी और आर्थिक समृद्धि बना ली हो, मोबाईल कंपनियों ने भले ही कस्टमर केयर में राजस्थानी को संवाद विकल्प के रूप में चुन लिया हो पर स्टेट लैंग्वेज के लिए यह आज भी सत्ता के गलियारों में हांफ रही है, सिसक रही है । काश ! मुझे इस पुरस्कार की बजाय मेरी मातृभाषा का मान बख्श दिया जाता तो मैं भी फक्र से कह पाता- हमारी अपनी भाषा है, जिसमें हम सोचते-विचारते-रचते और विगसते हैं । काश ! बच्चों के संस्कार व शिक्षण का माध्यम एक हो पाता तो हमारे नौनिहाल भी प्रतियोगिताओं में सरपट दौड़ पाते ।

अनुवाद की महत्ता को रेखाकित करते हुए पुरोहित ने कहा कि अनुवाद एक सांस्कृतिक अनुष्ठान है । साहित्य के अनुवाद हमें उन महान प्रतिभाओं से मिला देते हैं जिनसे हम भाषिक व्यवधान के कारण नहीं मिल पाते । कालिदास, शेक्सपियर, व्यास, वाल्मिकी, होमर, डांटे, टॉलस्टॉय, डोस्टोवस्की, रवीन्द्रनाथ, मोपांसा, शरदचन्द्र, उमर खय्याम , गोर्की, खलील जिब्रान और नोबेल पुरस्कार व ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले कितने ही नाम हैं । अगर अनुवाद नहीं होता तो हम कितने महानुभवों से अपरिचित रह जाते और कितने अलौकिक आनंद से वंचित रह जाते । दूसरे देशों की सांस्कृतिक पहचान भी हमे साहित्यिक अनुवादों से ही हो पाती है ।

अनुवाद विश्व संस्कृति के लिए आवश्यक है क्योंकि वह एक सांस्कृतिक सेतु है । वह केवल बहुभाषाओं की समस्या का व्यावहारिक समाधान नहीं है । भाषाएं यदि फूट का कारण बनती है तो अनुवाद जोड़ने का काम करता है ।

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