संविधान के शिल्पकार—विश्व भूषण अम्बेडकर

ambedkarजीवनपर्यन्तवर्ण व्यवस्था एवं हिन्दू समाज में व्याप्त उंच-नीच, जाति व्यवस्था एवं धार्मिक आडम्बरों के विरुद्ध अनवरत् संघर्ष करने वाले बाबासहिब अम्बेडकर को 15 अगस्त 1947 को देश का पहले कानून मंत्री बनाया गया | 29 अगस्त 1947 को उन्हें भारत के संविधान निर्माण के लिए बनी के संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। संविधान के प्रारूप मे धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया। अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों मे आरक्षण प्रणाली शुरू के लिए सभा का समर्थन किया | 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया, उस वक्त अम्बेडकर ने कहा-“मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके |14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अम्बेडकर ने उनके समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया। डॉ अम्बेडकरर को भारतीय बौद्ध भिक्षुओं ने बोधिसत्व की उपाधि प्रदान की थी किन्तु उन्होने खुद को कभी भी बोधिसत्व नहीं कहा। | बाबासहिब विश्व की एक बहुत बड़ी आबादी (दलितों) के प्रेरणा स्रोत हैं, इसीलिए उन्हें विश्व भूषण कहना भी अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं है।

भारत रत्न बाबासाहेब अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रेल 1891 को महू छावनी में गरीब दलित (हिन्दू महार) परिवार मे हुआ था। महू छावनी निवासी रामजी मालोजी सकपालऔरभीमाबाईकी 14 वीं संतान थेबाबासहिब। | स्कूली पढ़ाई मेंप्रतिभाशालीहोने के बावजूद उन्हें एवं अन्य दलित छात्रों को विद्यालय मे अलग से बिठाया जाता था एवं उन सभी के साथ भेदभाव कर अमानवीय व्यवाहर किया जाता था| अपने शिक्षक श्री महादेव के कहने परयुवा भीमराव ने अपने नाम से सकपाल हटाकर अपने गाँव “अंबावडे” पर आधारित अम्बेडकर जोड़ लिया था।

1907में मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद अम्बेडकर ने बंबई विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, बाबासहिब कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले दलित बन गये। 1908 में उन्होंने एलिफिंस्टोन कॉलेज में प्रवेश लिया और बड़ोदाके गायकवाड़ शासकसयाजी राव तृतीय के सहयोगसे उच्च अध्ययन के लिये अमेरिका चले गये | कुछ समय बाद उन्होने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में अध्ययन किया किन्तु अपने अध्ययन के मध्य ही छात्रवृत्ति की समाप्ति की वजह से उन्हें अपना अध्ययन बीच मे ही छोड़ कर भारत वापस लौटना पडा़ | उन्हें बंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स मे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गयी।1920में वे पुनः कोल्हापुर के महाराजा एवं अपने पारसी मित्र के सहायता से वे वापस इंग्लैंड चले गये |1923में उन्होंने अपना शोध “प्रोब्लेम्स ऑफ द रुपी” पूरा किया, उन्हें लंदन विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ साईंस की उपाधि प्रदान की गयी।

1919 में बाबासहिब को साउथ बोरोह समिति के समक्ष गवाही देने के लिये आमंत्रित किया गया। इस सुनवाई के दौरान बाबासहिब अम्बेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लियेपृथक निर्वाचिका और आरक्षण देने की वकालत की। अम्बेडकर नेबहिष्कृत हितकारिणी सभाकी स्थापना भी की जिसका उद्देश्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। सन्1926में, वो बंबई विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य बन गये। सन1927में डॉ॰ अम्बेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया, उन्होनें अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया।

डा. जे. के. गर्ग
डा. जे. के. गर्ग
अम्बेडकर को 1931 मे लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में, भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। यहाँ उनकी अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने के मुद्दे पर गांधीजी से तीखी बहस हुई। गांधीजी का मानना था कि धर्म और जाति के आधार पर पृथक निर्वाचिका हिंदू समाज की भावी पीढी़ को हमेशा-हमेशा के लिये विभाजित कर देगी। किन्तु 1932मे जब अग्रेंजों ने अम्बेडकर के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों के लिए प्रथक निवार्चिकादेने की घोषणा कर दी तब गांधी ने इसके विरोध मे पुणेकी यरवदासेंट्रल जेल में आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया। अनशन के कारण गांधीजी मरणासन्न हो गये थे अत: उस वक्त के वातावरण को देखते हुए अंबेडकर ने अपनी पृथक निर्वाचिका की माँग तो वापस ले ली किन्तु इसके बदले मे अछूतों के लिये सीटों में आरक्षण तथा मंदिरों में उनके एवं पूजा के अधिकार की मांग स्वीकार करवा ली जो छूआ-छूत खत्म करने की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ|

अम्बेडकर ने 1936 में स्वतंत्र लेबर पार्टीकी स्थापना की जिसे 1937 में केन्द्रीय विधान सभा चुनावों मे 15 सीटें जीती। उन्होने अपनी पुस्तक‘हू वर द शुद्राज़?’ के द्वारा हिंदू जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में सबसे नीची जाति यानी शुद्रों के अस्तित्व मे आने की व्याख्या की | अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक पार्टी को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन मे बदल दिया हांलाकि 1946 में हुए भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनावों में अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन का प्रदर्शन खराब ही रहा। 1948 में “ द अनटचेबलस: ए थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी “ मे अम्बेडकर ने हिंदू धर्म की तीखी आलोचना की थी।

भारतीय संविधान के प्रमुख शिल्पकार

15 अगस्त 1947 को भारत की सरकार में अम्बेडकर देश के पहले कानून मंत्री बने | 29 अगस्त 1947 को उन्हें भारत के संविधान निर्माण के लिए बनी के संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। संविधान के प्रारूप मे धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया। अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों मे आरक्षण प्रणाली शुरू के लिए सभा का समर्थन किया | 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया, उस वक्त अम्बेडकर ने कहा-“मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके | 1951 मे संसद में अपने हिन्दू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद अम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया इस मसौदे मे उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी। मार्च 1952 मे उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानि राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया |

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अम्बेडकर ने उनके समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया। डॉ अम्बेडकरर को भारतीय बौद्ध भिक्षुओं ने बोधिसत्व की उपाधि प्रदान की थी किन्तु उन्होने खुद को कभी भी बोधिसत्व नहीं कहा। | । डा बी.आर. अम्बेडकर ने दीक्षा भूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,14 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं | उन्होंने अपनी अंतिम पांडुलिपि “बुद्ध या कार्ल मार्क्स“को2दिसम्बर 1956को पूरा किया। अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसम्बर 1956 को अम्बेडकर की मृत्यु नींद में दिल्ली में उनके घर मे हो गई।7 दिसंबरकोचौपाटी समुद्र तटपर बौद्ध शैली मे अंतिम संस्कार किया गया जिसमें सैकड़ों हजारों समर्थकों,कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया।
14 अप्रेल 2016 को बाबा साहिब के 126वें जन्म दिवस पर समस्त भारतीय उन्हें अपनें श्रद्दा सुमन अर्पित करते हैं |

प्रस्तुती—डा. जे. के.गर्ग

सन्दर्भ—विकीपीडिया,भारत ज्ञान कोष, विभिन्न पत्र-पत्रिकायें अन्य स्त्रोत

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