एक विलक्षण व्यक्तित्व के धनी *महामना आचार्य भिक्षु*

*जैन श्वेताम्बर तेरापन्थ के प्रथम आचार्य भिक्षु के 296 वें जन्मदिवस के अवसर पर विशेष*

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आचार्य भीखण जी सिरियारी के संत के रुप में विख्यात जैन संत थे,कालांतर में वे जैन तेरापंथ धर्म संघ के प्रथम आचार्य बने।यही महापुरुष आगे चलकर आचार्य भिक्षु के नाम से प्रसिद्ध हुए । आज असाढ शुक्ला त्रयोदशी को 296 वा जन्म दिवस है । इस महामना महापुरुष को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक विशेष आलेख प्रस्तुत किया जा रहा है ।

*आचार्य भिक्षु का जीवन वृत्त*

*जन्म*- विक्रम संवत् १७८३ आषाढ़ सुदी १३ मंगलवार
*जन्म स्थान* – कंटालिया (राजस्थान)
*पिता का नाम* – शाह बल्लू जी
*माता का नाम* – दीपां बाई
*जाति-वंश* – ओसवाल सकलेचा
*प्रथम दीक्षा* – विक्रम संवत् १८०८ मीगसर बदी १२
*अभिनिष्क्रमण* – विक्रम संवत् १८१७ चैत्र सुदी ९ सुधरी
*भाव दीक्षा* – विक्रम संवत् १८१७ आषाढ़ पूर्णिमा, केलवा तेरापंथ स्थापना
*प्रथम मर्यादा पत्र* – विक्रम संवत् १८३२ ( सात साधुओं के साथ )
*अंतिम मर्यादा पत्र* – विक्रम् संवत् १८५९ माघ शुक्ला सप्तमी
*साहित्य सृजन* – ३८००० पद्धय प्रमाण
*महाप्रयाण* – विक्रम संवत् १८६० भादवा सुदी १३ मंगलवार, सिरियारी
*सर्व आयु* – ७७ वर्ष प्रमाण
*अनशन* – सात प्रहर प्रमाण
*साधु – ४९ साधु
*साध्वियां – ५६ साध्वियां

*भिक्षु कौन*
आचार्य भिक्षु उस व्यक्तित्त्व का नाम है जिसने चारित्रिक शिथिलता के लिए खुले मैदान में एक लड़ाई लड़ी ।
आचार भिक्षु उस व्यक्तित्त्व का नाम है जिसने शुद्ध साधना के लिए बनी लकीर पर चलने का संकल्प लिया ।
आचार्य भिक्षु उस व्यक्तित्त्व का नाम है जिसने सत्य पाने के लिए मरने की तैयारियां कर ली ।
आचार्य भिक्षु उस व्यक्तित्त्व का नाम है जिन्होंने संघ के नाम मर्यादाएं लिखीं ,जो विधान बनाए, वे सर्व प्रथम अपने पर लागू किये, फिर दूसरों पर ।
आचार्य भिक्षु उस व्यक्तित्त्व का नाम है जिन्होंने कष्टों को उपहार मान स्वीकार किया ।
उनका जीवन एक दिव्य पुरूष के रूप में प्रसिद्ध हुआ। अन्त में एक ज्योति शांत हो गई , सिरियारी में ।
तेरापंथ के प्रवर्तक आचार्य भिक्षु श्रमण परंपरा के महान संवाहक थे । उनका जन्म वि. स. १७८३ आषाढ़ शुक्ला १३ को कंटालिया (मारवाड़) में हुआ । उनके पिता का नाम शाह बल्लुजी तथा माता का नाम दींपा बाई था । उनकी जाति ओसवाल तथा वंश सकलेचा था । आचार्य भिक्षु का जन्म-नाम भीखण था । प्रारंभ से ही वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे । तत्कालीन परंपरा के अनुसार छोटी उम्र में ही उनका विवाह हो गया । वैवाहिक जीवन से बंधे जाने पर भी उनका जीवन वैराग्य भावना से ओतप्रोत था । धार्मिकता उनकी रगरग में रमी थी । पत्नी भी उन्हें धार्मिक विचारों वाली मिली । पति-पत्नी दोंनो ही दीक्षा लेने के उद्यत हुए, किंतु नियति को शायद यह मान्य नहीं था । कुछ वर्षो के बाद पत्नी का देहावसान हो गया। भीखणजी अकेले ही दीक्षा लेने को उद्यत हुए, पर माता ने दीक्षा की अनुमति नहीं दी । तत्कालीन स्थानकवासी संप्रदाय के आचार्य श्री रघुनाथ जी के समझाने पर माता ने कहा – महाराज ! मैं इसे दीक्षा की अनुमति कैसे दे सकती हूं क्योंकि जब यह गर्भ में था ,तब मैंने सिंह का स्वप्न देखा था । उस स्वप्न के अनुसार यह बड़ा होकर किसी देश का राजा बनेगा और सिंह जैसा पराक्रमी होगा। आचार्य रघुनाथ जी ने कहा बाई यह तो बहुत अच्छी बात है। राजा तो एक देव के रूप में पुजा जाता है । तेरा बेटा तो साधु बन कर सारे जगत का पुज्य बनेगा और सिंह कि तरह गुंजेगा। इस प्रकार आचार्य रघुनाथ जी के समझाने पर माता ने सहर्ष दीक्षा की अनुमति दे दी । वि.स. १८०८ मार्गशीर्ष कृष्णा बारस को भीखणजी ने आचार्य रघुनाथजी के पास दीक्षा ग्रहण की । संत भीखण जी की दृष्टि पैनी और मेघा सूक्षमग्राही थी । तत्व की गहराई में पैठना उनकी लिए स्वाभाविक बात थी । थोड़े ही वर्षो में वे जैन शास्त्रों के पंडित बन गये ।
वि.स.१८१५ के आस पास संत भीखणजी के मस्तिष्क में साधु वर्ग के आचार विचार संबन्धी शिथिलता के प्रति एक क्रांति की भावना पैदा हुई। उन्होंने अपने क्रांति पूर्ण विचारों को आचार्य रघुनाथजी के सामने रखा। दो वर्ष तक विचार विमर्श होता रहा ।
जब कोई संतोषजनक निर्णय नहीं हुआ ,तब विचार भेद के कारण वि.स. १८१७ चैत्र शुक्ला नवमी को कुछ साधुओं सहित बगड़ी (मारवाड़) में उनसे पृथक हो गये। उनकी धर्म क्रांति का विरोध हुआ ,चुंकि उस समय पुज्य रघुनाथ जी का प्रभाव प्रबल था, इस लिए लोगो ने भीखणजी का असहयोग किया। ठहरने के लिए स्थान नहीं दिया । वहां से विहार किया। गांव के बाहर आये कि तेज आंधी आ गई । पीछे गांव में जगह नहीं, आगे आंधी ने रास्ता रोक लिया। इस लिए उन्होंने पहला पड़ाव गांव के बाहर शमशान में जैतसिंहजी की छतरियों में किया । आज भी वे छतरियां विद्यमान है ।
संघ बहिष्कार के साथ ही आचार्य भिक्षु पर जैसे विरोधों के पहाड़ टुट पडे । पर वे लोह पुरूष थे। विरोध के सामने झुकना उन्होंने सीखा नहीं था । वे सत्य के महान उपासक थे । सत्य पर प्राण न्यौछावर करने के लिए वे तत्पर थे । उन्ही के मुख से निकले हुए शब्द *आत्मा रा कारज सारस्यां ,मर पुरा देस्यां*,
वे महान आत्मबली थे और जीवन में शुद्ध साधुता को प्रतिष्ठित करना चाहते थे । वि. स. १८१७ आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को केलवा(मेवाड़) में बारह साथियों सहित उन्होंने शास्त्र सम्मत दीक्षा ग्रहण की । यह तेरापंथ स्थापना का प्रथम दिन था। इसी दिन आचार्य भिक्षु के नेतृत्व में एक सुसंगठित साधु संघ का सूत्र पात हुआ और वह संघ तेरापंथ के नाम से प्रख्यात हो गया ।
वि.स.१८१७ से लेकर वि.स. १८३१ तक पन्द्रह वर्ष का जीवन आचार्य भिक्षु का महान संघ संघर्षमय रहा । यहां तक कहा जाता है कि उन्हें पांच वर्ष पेट भर पुरा आहार नहीं मिला, कभी मिलता कभी नहीं भी मिलता । इस महान संघर्ष की स्थति में आचार्य भिक्षु ने कठोर साधना, तपस्या, शास्त्रों का गंभीर अध्यन एवं संघ की भावी रूप रेखा का चिंतन किया ।
वि.स. १८३२ में आचार्य भिक्षु ने अपने प्रमुख शिष्य भारमल जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया । उस समय संघीय मर्यादाओं का भी निर्माण किया । उन्होंने पहला मर्यादा पत्र इसी वर्ष मार्ग शीर्ष कृष्णा सप्तमी को लिखा। उसके बाद समय समय पर नई मर्यादाओं के निमार्ण से संघ को सुदृढ करते रहे। उन्होंने अन्तिम मर्यादा पत्र लिखा स. १८५९ माघ शुक्ला सप्तमी को ।
एक आचार्य में संघ की शक्ति को केन्द्रित कर उन्होंने सुदृढ संगठन की नींव डाली । इससे अपने अपने शिष्य बनाने की परम्परा का विच्छेद हो गया । भावी आचार्य के चुनाव का दायित्व भी उन्होंने वर्तमान आचार्य को सौंपा। आज तेरापंथ धर्म संघ अनुशासित मर्यादित और व्यवस्थित धर्म संघ है, इसका श्रेय आचार्य भिक्षु कृत इन्हीं मर्यादाओं को है ।
आचार्य भिक्षु ने अपने मौलिक चिंतन के आधार पर नये मूल्यों की स्थापना की । हिंसा व दान-दया संबंधी उनकी व्याख्या सर्वथा वैज्ञानिक कही जा सकती है। आचार्य भिक्षु की अहिंसा सार्वभौमिक क्षमता पर आधारित थी । बड़ों के लिए छोटो की हिंसा और पंचेन्द्रिय जीवों की सुरक्षा के लिए एकेन्द्रिय प्राणीयों का हनन आचार्य भिक्षु की दृष्टि में आगम सम्मत नहीं था । अध्यात्म व व्यवहार की भूमिका भी उनकी भिन्न थी। उन्होंने कभी ओर किसी भी प्रसंग पर दोंनो को एक तुला से तोलने का प्रयत्न नहीं किया । उनके अभिमत से व्यवहार व अध्यात्म को सर्वत्र एक कर देना घी और तम्बाकू के सम्मिश्रण जैसा अनुपादय है । दान दया के विषय में लैकिक एवं लौकतर भेद रेखा प्रस्तुत कर आचार्य भिक्षु ने जैन समाज में प्रचलित मान्यता के समक्ष नया चिंतन प्रस्तुत किया। उस समय समाजिक समान का माप दण्ड दान दया पर अवलंबित था। सर्वर्गोपलब्धि और पुण्योपलब्धि की मान्यताएं भी दान दया के साथ जुडी हुई थी। आचार्य भिक्षु ने लौकिक दान दया की व्यवस्था को कर्तव्य व सहयोग बता कर मौलिक सत्य का उद्घाटन किया। साध्य साधन के विषय में भी उनका दृष्टिकोण सपष्ट था। उनके अभिमत से शुद्ध साधन के द्वारा ही शुद्ध साध्य की प्राप्ती सम्भव है। उन्होंने कहा रक्त से सना वस्त्र कभी रक्त से शुद्ध नहीं होता। वैसे ही हिंसा प्रधान प्रवृति कभी अध्यात्म के पावन लक्ष्य तक नहीं पहुंचा सकती।
आचार्य भिक्षु एक कुशल वक्ता होने के साथ साथ एक सहज कवि और महान साहित्यकार थे। उन्होंने राजस्थानी भाषा में लगभग ३८००० पद्यों की रचना कर जैन साहित्य को समर्ध किया। आचार्य भिक्षु की साहित्य रचना का प्रमुख विषय शुद्ध आचार का प्रतिपादन, तत्व दर्शन का विशलेषण एवं धर्म संघ की मौलिक मर्यादाओं का निरूपर्ण था। उनकी रचनाओं में प्राचीन वैराग्य में आख्यान भी है। आचार्य भिक्षु ने कभी कवि बनने का प्रयत्न नहीं किया और न कभी उन्होंने भाषा शास्त्र, छंद शास्त्र, अलंकार शास्त्र एवं रस शास्त्र का प्रशिक्षण ही प्राप्त किया पर उनके द्वारा रचे गये पद्यों में रस, अनुप्रयास और अलंकारों के प्रयोग पाठक को मंत्र मुगध कर देते हैं।
आचार्य भिक्षु जब तक जिए, ज्योति बनकर जिए। उनके जीवन का हर पृष्ठ पुरुषार्थ की गौरवमयी गाथाओं से भरा पड़ा है।आचार्य भिक्षु के शासन काल में ४९ साधु और ५६ साध्वियां दीक्षित हुई। वि.स. १८६० भाद्रव शुक्ला त्रयोदशी के दिन सिरियारी (मारवाड़) में उन्होंने समाधि मरण प्राप्त किया। उस समय उनकी आयु ७७ वर्ष की थी।
*तेरापन्थ के आद्य प्रवर्तक महामना आचार्य भिक्षु के 296 वें जन्मदिवस पर हार्दिक भावांजलि, विनयावनत वंदन एवं कोटि – कोटि नमन।*

आलेख प्रस्तुति
*बी एल सामरा नीलम*
पूर्व प्रबंध संपादक कल्पतरू हिन्दी साप्ताहिक एवं मगरे की आवाज़ पाक्षिक तथा
*सेवानिवृत्त शाखा प्रबंधक*
भारतीय जीवन बीमा निगम अजमेर

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