j k gargजननायक अटल बिहारी वाजपेयी ने खुद को आर एस एस के समर्पित कार्यकर्ता रहने के बावजूद खुद को किसी खास विचारधारा के पहरेदार के रूप में कभी भी स्थापित नहीं होने दिया। उनके प्रधानमंत्रित्व काल में कश्मीर से लेकर पाकिस्तान तक से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ था। अलगाववादियों से बातचीत के फैसले पर सवाल उठा कि क्या बातचीत संविधान के दायरे में होगी? तो उनका जवाब था, इंसानियत के दायरे में होगी। अटल जी वास्तव में शब्दों के जादूगर थे | आज के नेताओं की तरह उन्होंने कभी भी अपने विरोधियों पर व्यक्तिगत हमले किये और न ही किसी का चरित्र हनन किया और ना ही बदले की भावनाओं से जांच एजेंसी का दुरुपयोग किया । अटल बिहारी जी के राजनीतिक विरोधी भी उनकी वाकपटुता और अकाट्य तर्कों के कायल रहते थे | कई राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक आज की भारतीय जनता पार्टी अटल जी के जमाने की पार्टी से भिन्न होती दिखाई देती है इसके साथ साथ आज का ऍन डी ऐ भी उस समय के ऍन डी ऐ जैसा नहीं लग रहा है |
1994 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत का पक्ष रखने वाले प्रतिनिधिमंडल की नुमाइंदगी विपक्षी नेता अटल जी को सौंपी थी। किसी सरकार का विपक्षी नेता पर इस हद तक भरोसे को पूरी दुनिया में आश्चर्य से देखा गया था । काश: आज के माहोल में ऐसा हो पाता |