निरंकुश आततायी और असहिष्णु राज्य शक्ति पर प्रभु भक्ति सच्चाई और सद्दभाव की जीत का पर्व होली Part 1

dr. j k garg
हमारे मुल्क के अंदर पर्व मनाने के पीछे तर्क यही है कि जिंदगी को एक उत्सव के रूप में जिया जाये, जीवन का हर पल सुखमय और आनंदमय हो | प्रतेयक पर्वों का धार्मिक सामजिक और वैज्ञानिक महत्व होता है | होली के पर्व का सामाजिक पहलू भी है क्योंकि होली का पर्व परिवार, आस-पडोस,समाज, विभिन्न समुदाय और विभिन्न वर्ग के लोगो को स्नेह-सोहार्द सद्दभाव और भाईचारे के अटूट बंधन में बांधता है और उनके बीच में पनपे अविश्वास, शंका, विवादों को मिटाकर पारस्परिक रिस्तों को फेवीकोल के जोड़ जैसा मजबूत बनाता है । होली का पर्व आपसी संबंधों को पुन: जीवित करने और मजबूती के टॉनिक के रूप में भी कार्य करता है। |

असुर सम्राट हिरण्यकश्यप की बहन होलिका कोई साधारण स्त्री नहीं थी किन्तु वह तो मायावी असुर थी जो ईर्ष्या, राग-द्वेष, अनाचार तथा समस्त दुष्कर्मों की प्रतीमुर्ती एवं घोर नास्तिक थी | दस्युराज हिरण्यकश्यप की अपार शक्ति के आगे नन्हे-मासूम प्रहलाद की क्या बिसात थी ? नन्हे-मासूम प्रहलाद के पास भक्ति सत्य निष्ठा प्रभु के चरणों में सम्पूर्ण समर्पण की शक्ति थी | अंत में जीत तो भक्ति, विश्वास एवं सत्य की ही हुई |

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