*चंदना की करुण पुकार को सुना महावीर ने:गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि*

संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि जीवन में अविद्या अविनय और अविवेक का दूर होना जरूरी है। विद्या का मतलब आत्मिक ज्ञान से है।अज्ञान को दूर करके ही वितराग बना जा सकता है। नयसार के जीव ने भी जब अविध्या, अविनय व अविवेक को धारण किया तो आत्मा का पतन हो गया। और जब विद्या विनय और विवेक को धारण किया तो आत्मा का उत्थान हो गया। हमारी चर्चा चल रही थी कि भवनपति का इंद्र चमरेंद्र जिसने अपने ऊपर शकेंद्र को देखा तो शकेंद्र को हराने के लिए प्रभु की शरण लेकर सुधर्म सभा में पहुंच गया, और शकेंद्र को ललकारने लगा।शकेंद्र महाराज ने उसे समझाना चाहा मगर नहीं माना। तो शकेंद्र ने अपना व्रज उस पर फेंक दिया। उससे घबराकर,अपने प्राण बचाने के लिए प्रभु के चरणों के बीच अपना छोटा सा रूप बनाकर छुप गया। शकेंद्र ने अपना अवधि ज्ञान लगाकर देखा, कि इसके पीछे किसकी ताकत काम कर रही है। तब ध्यान आया कि प्रभु की शरण लेकर यह यहां आया था, तब विचार किया मेरे व्रज से कहीं प्रभु के शरीर को पीड़ा ना हो जाए, तो प्रभु से चार अंगुल की दूरी रहते उन्होंने वज्र को पकड़ लिया। तब चर्मेंद्र को आवाज़ लगाई, देखो मैं भी प्रभु का ही भक्त हूं ।हम दोनों गुरु भाई है। और प्रभु के सानिध्य में दोनों की मैत्री हो जाती है ।ऐसा होता है प्रभु का सानिध्य, जो वेरी को भी मित्र बना देता है।
अब प्रभु बिहार करके कौशांबी नगरी पधारते हैं।क्योंकि वहां पर भी एक घटनाक्रम चल रहा था। कौशांबी के राजा शतनिक ने अपने सगे साढू भाई चंपा के राजा दधीवाहन पर राज्य लिप्सा के खातिर आक्रमण कर दिया।तब एक सारथी रानी धारणी और उसकी पुत्री चंदनबाला को राजा जी का बहाना बनाकर जंगल में ले आता है। वहां उसकी गलत नियत को जानकर रानी धारिणी जीभ खींचकर प्राणों का त्याग कर देती है। क्योंकि भारतीय नारियां अपने प्राणों का त्याग कर देती है,मगर अपने धर्म का त्याग नहीं। चंदना भी जब यही प्रयास करने जा रही थी तब सारथी पैरों में गिरकर माफी मांगता है।उसे अपने घर ले जाता है। मगर पत्नी के झगड़ने पर, व चंदना के कहने पर बिना मन के उसे बाजार में बेचने आता है। जब चंद्ना को वेश्या खरीद कर ले जा रही थी तो उसने नवकार मंत्र का जाप किया। शीलरक्षक देवों ने बंदर के रूप में आकर चंद्ना की रक्षा की। तब एक धन्ना नामक सेठ ने उसे खरीदा ।अपनी बेटी बनाकर रखने लगा। मगर उसकी पत्नी मूला सेठानी शंका ग्रस्थ रहती।एक बार सेठ जी की अनुपस्थिति में उसने चंदनबाला के बालों को काटकर, हाथ पैरों में हथकड़ियां व बेड़िया डालकर तलघर में पटक दिया और पीहर चली गई। तीन दिन बाद सेठ जी आए और तलघर में जाकर चंदनबाला की हालत देखी, तो बड़ा दुख हुआ।तब उसको खाने के लिए एक सूपड़े में उड़द के बाकुले पड़े थे वह दिए और हथकड़ी बेडियो को काटने के लिए लोहार को बुलाने चले गए। इधर प्रभु महावीर भी 5 महीने 25 दिन की उग्र तपस्या में रत नित्य प्रति अभिग्रह धारण किए हुए विचरण करते हैं मगर कुछ ग्रहण नहीं करते। उस समय आहार के लिए और नारी जाति के उद्धार के लिए प्रभु चंदनबाला के द्वार पर आए और उसके हाथों से उड़द बाकुले का आहार ग्रहण किया। देवों ने आकाश में अहो दानम, अहो दानम की घोषणा करते हुए अपार धन आदि की वृष्टि की। स्वयं कष्ट सहकर भी प्रभु ने चंदनबाला की पुकार को सुना और उसके कष्ट दूर किया।
धर्म सभा को पूज्य श्री विरागदर्शन जी महारासा ने भी संबोधित किया।
धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेडा ने किया।
पदमचंद जैन

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