
31 जनवरी 1968 जयपुर से संवाद मिला कि राजस्थान विधानसभा में अणुव्रत प्रस्ताव पारित हो गया,लगभग ढाई घंटे की बहस मे राजस्थान विधानसभा का वातावरण अणुव्रत मय बन गया,
अणुव्रत के समर्थन में बोलने वाले वक्ताओ की उत्सुकता देखकर मुख्यमंत्री श्री मोहनलाल सुखाड़िया ने इस विषय को आगामी सत्र तक चालू रखने का सुझाव दिया, अध्यक्ष श्री निरंजन नाथ आचार्य ने मुख्यमंत्री के सुझाव पर सदन से राय मांगी, श्री भेरू सिंह जी शेखावत ने सदन का समय आधा घंटा बढ़ा कर इसी समय प्रस्ताव को पारित करने की बात पर बल दिया, सदन की स्वीकृति से अध्यक्ष ने कार्यवाही आगे बढ़ाई अणुव्रत प्रस्ताव पर हुई चर्चा के अंत में सदन के नेता मुख्यमंत्री श्री सुखाड़िया ने कहा
“अणुव्रत आंदोलन न तो पूंजीवाद का समर्थन है,नहीं किसी धर्म विशेष का प्रचारक ।इसके पीछे कोई उद्देश्य है तो यही कि व्यक्ति निर्दोष हो समाज निर्दोष हो और राष्ट्र का नैतिक धरातल ऊपर उठे अणुव्रत में हमारी संस्कृति प्रतिबिंबित है। इसमें सभी धर्म के आधारभूत तत्व प्रतिबिंबित हैं।”
मुख्यमंत्री महोदय ने अणुव्रत प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार विमर्श करके उसका संशोधित रूप सदन में प्रस्तुत किया, जो इस प्रकार है ।
सदन अचार्य श्री तुलसी द्वारा प्रवर्तित अणुव्रत अभियान की सराहना करता है ।
विधानसभा में अणुव्रत प्रस्ताव पारित होने से सारे राजस्थान में उसकी गूंज हो गई आकाशवाणी से उसके संवाद प्रसारित हुए, स्थानीय समाचार पत्रों के मुख्य पृष्ठ पर उसे विषय के समाचार प्रकाशित हुए कुछ पत्रों के संपादकीय इस विषय पर लिखे गए। दिल्ली के दैनिक पत्रों में भी उक्त संवाद छपे। अणुव्रत के दो दशक में वह ऐसा समय था,जब राजस्थान में जनप्रतिनिधियों ने अणुव्रत के कारण अपने प्रदेश को गौरवान्वित अनुभव किया ।अणुव्रत द्वारा राष्ट्रीय चरित्र के उन्नयन का हमारा संकल्प पुष्ट हुआ, अणुवर्ती कार्यकर्ताओं के मन में यह विश्वास जागा कि उनके कार्यों का समुचित मूल्यांकन होगा और अणुव्रत नैतिक मूल्यों का संवाहक बनकर लोग जीवन को प्रभावित करेगा ।
प्रस्तुति
बी. एल. सामरा
अध्यक्ष अणुव्रत समिति अजमेर